choree by munshi premchand
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हलधर – ‘अम्मा, बिलकुल झूठ है।’

चची – झूठ नहीं, सच है। झूठा तो तू है, और तो सारा संसार सच्चा है, तेरा नाम निकल गया है न। तेरा बाप नौकरी करता, बाहर से रुपये कमा लाता, चार जने उसे भला आदमी कहते, तो तू भी सच्चा होता। अब तो तू ही झूठा है। जिसके भाग में मिठाई लिखी थी, उसने मिठाई खायी। तेरे भाग में तो लात खाना ही लिखा है।’

यह कहते हुए चची ने हलधर को खोल दिया और हाथ पकड़कर भीतर ले गयी। मेरे विषय में स्नेहपूर्ण आलोचना करके अम्मा ने पांसा पलट दिया था, नहीं तो अभी बेचारे पर न-जाने कितनी मार पड़ती। मैंने अम्मा के पास बैठकर अपनी निर्दोषिता का राग खूब अलापा। मेरी सरल-हृदय माता मुझे सत्य का अवतार समझती थी। उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि सारा अपराध हलधर का है। एक क्षण बाद मैं गुड़ चबेना लिये कोठरी से बाहर निकला। हलधर भी उसी वक्त चिउड़ा खाते हुए बाहर निकले। हम दोनों साथ-साथ बाहर आये और अपनी-अपनी बीती सुनाने लगे। मेरी कथा सुखमय थी, हलधर की दुःखमयी, पर अंत दोनों का एक था — गुड और चबेना।