jaasoos party jindaabaad Motivational story
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कुणाल परेशान सा अपने घर की छत पर घूम रहा था। वह सोच रहा था, क्या करे, क्या न करे? क्या वह पापा को बता दे उस नीली आँखों वाले लड़के के बारे में, जिसकी कुछ अजीब आदतें उसने नोट की थीं! नीली आँखों वाला वह कुछ अजीब सा लड़का मोहल्ले में पिछले कुछ ही दिनों से दिखाई पड़ा था। लंबा कद, गेहुआँ रंग, चेहरे पर काफी घनी दाढ़ी।

देखने-भालने में खूब अच्छा। पर अकसर उसका रास्ता चलते हुए अजीब ढंग से चौकन्ने होकर इधर-उधर देखना कुणाल के मन में कुछ शक पैदा करता था। कुछ दिनों से कुणाल लगातार उसी के बारे में सोच रहा था। उसे लग रहा था कि यह कुछ रहस्यपूर्ण सा लड़का है, जिसके साथ कोई विचित्र रहस्य जुड़ा है। पर कौन सा रहस्य, वह इसी गहरी उधेड़बुन में था। बाद में पता चला कि उसका नाम एन. राजन है और वह उसी गली के आखिरी छोर वाले मनचंदा अंकल के यहाँ रहता है। फिर कुछ दिन बाद कुणाल ने उसे घर के पास वाले हाथी बाग में देखा था। उसके साथ दो विदेशी भी थे। एक मोटा आदमी और एक सुंदर सी, गोरी और लंबी औरत। उनके दो-चार शब्द उसके कानों में पड़े थे और उन्हीं से वह चौंका था। वे पता नहीं कैसे नक्शे की बात कर रहे थे। और नीली आँखों वाला लड़का राजन बार – बार कह रहा था, “ठीक है, ठीक है सर, ओ.के., हो जाएगा। पर उसके लिए पैसा कम है, थोड़ा और बढ़ाना होगा।” शाम कब की ढल चुकी थी। हाथी बाग में अब घुप अँधेरा था और खासा सन्नाटा। हाथी बाग के सबसे पीछे वाली बेंच पर एकदम धीरे-धीरे फुसफुसाते हुए ये बातें हो रही थीं, पर कुणाल सतर्क था। लिहाजा उनकी बातें सुनने में उसे कोई मुश्किल नहीं आ रही थी। नीली आँखों वाला वह लड़का और उसके दोनों साथी शायद सोच ही न पाए हों कि रात के इस सन्नाटे में बारह बरस का एक लड़का, इतने ध्यान से उनकी सब बातें सुन रहा है। लिहाजा वे खुलकर बातें कर रहे थे और कुणाल के आगे एक ऐसा राज खुलता जा रहा था कि उसके भीतर तेज आँधी चल पड़ी थी। हालाँकि कुणाल तो सिर्फ यह जानने के लिए झाड़ी की ओट बैठा था कि ये विदेशी होते कैसे हैं और इनका बोलने – चालने का ढंग कैसा होता है।

पर जो कुछ उसने सुना, उससे वह बुरी तरह चौंक गया। सारी बातें उसकी समझ में नहीं आई थीं, फिर भी जितना वह समझ सका, उसी से उसके भीतर हलचल सी मच गई थी। वह समझ गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। कहीं कोई भारी गड़बड़, जिससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती थी। उसे उन विदेशियों के बोल-चाल के लहजे से यह भी समझ में आ गया था कि ये लोग एक पड़ोसी देश के हैं, और किसी भी कीमत पर कुछ जरूरी नक्शे हासिल करना चाहते हैं। उसने ध्यान से सुना तो समझ में आया कि बातें सेना के कुछ गोपनीय नक्शों के बारे में हो रही थीं। सोचकर उसे झुरझुरी सी हुई। इसके बाद नीली आँखों वाला राजन और दोनों विदेशी लोग उठे, और धीरे-धीरे चलते हुए हाथी बाग से बाहर चले गए। कुछ देर बाद कुणाल भी बाग से निकला। उसके कदम अपने घर की ओर मुड़ रहे थे कि अचानक उसका मन हुआ, जरा मनचंदा अंकल के घर के पास से होकर गुजरा जाए। देखें, क्या ये तीनों भी वहाँ पहुँचे हैं या…? उसका अनुमान सही था। राजन और उसके दोनों साथी वहीं राजन के कमरे पर ही थे। लगता था, राजन ने कमरे पर पहुँचते ही फौरन दरवाजे बंद कर लिए थे। तो भी अंदर से आती आवाजें कुछ-कुछ सुनी जा सकती थीं। और इससे अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि मामला अब हद से आगे बढ़ गया है। कुणाल उस दिन घर आया तो बुरी तरह परेशान था। उसके मन में तरह-तरह के खयाल आ रहे थे। वह पूरी रात उसने जागते हुए गुजारी। आखिर उसने सोचा, ‘अपनी बच्चा जासूस पार्टी की ही मदद ली जाए।’ अगले दिन सुबह-सुबह कुणाल अपने दोस्त नीटू के पास पहुँचा। बच्चों की जासूस पार्टी का वह प्रमुख सदस्य था। सारी बात सुनकर नीटू भी परेशान हुआ। कुछ सोचकर बोला, “तुम अपने पापा से क्यों नहीं कहते? वे तो बड़े पुलिस अधिकारी हैं। चाहें तो…!” कुणाल के पापा डी.आई.जी. थे। वह जानता था कि अगर उन्हें बताया जाए, तो कुछ ही देर में राजन जेल की सलाखों के अंदर होगा। पर सवाल तो उसके पूरे नेटवर्क को खँगालने का था। यह काम बच्चों की जासूस पार्टी बखूबी कर सकती थी। लिहाजा कुणाल कुछ गंभीर होकर बोला, “पर नीटू, मुझे लगता है, यह मामला हमारी बच्चा जासूस पार्टी को निबटाना चाहिए।” “हाँ-हाँ, क्यों नहीं?” नीटू को भी जोश आ गया। बोला, “तुम कहो, तो मैं निक्की और टिल्लन से बात करूँ?” “हाँ, जरूर। तभी बात बनेगी।” कुणाल ने कहा। टिल्लन और निक्की भाई-बहन थे, बेहद हिम्मती और समझदार। बच्चों की जासूस पार्टी में वे भी कुछ बड़े कारनामे कर चुके थे। आखिर चारों दोस्त कुणाल, नीटू, टिल्लन और निक्की शहर के बाहर वाले खँडहर में मिले। वही इस जासूस पार्टी का अस्थायी ऑफिस था। चारों ने खूब सोचा, योजनाओं पर योजनाएँ बनने लगीं। “तो अब सब लोग बताएँ कि असली अपराधी को पकड़ने के लिए आप क्या-क्या कमाल कर सकते हैं?” नीटू ने पूछा। कुणाल बोला, “मुझे लग रहा है कि हमें राजन के चारों और शिकंजा कसना चाहिए। उसके साथ ही सभी षड्यंत्रकारी पकड़ में आ जाएँगे।” फिर कुछ सोचकर बोला, “मैंने सोचा है, मैं सेल्स बॉय बनूँगा। खाने-पीने का सामान और घर की जरूरी चीजें लेकर उसके घर जाऊँगा। शायद मेरा जादू चल जाए।” “और मैं अगर खाना पकाने वाली बन जाऊँ तो…? अभी तो गरमी की छुट्टियाँ हैं, इसलिए समय भी है।” निक्की ने कहा। “मैं चूरन वाला बनूँगा। राजन के घर के सामने वाले पार्क में चूरन, टॉफी और खटमिट्ठी गोलियाँ बेचा करूँगा। और नजर रहेगी राजन के बँगले पर! क्या खयाल है?” नीटू ने मंद-मंद मुसकराते हुए कहा, तो झट से उसका प्रस्ताव पारित हो गया। टिल्लन से पूछा गया, तो उसने कहा, “मैं बीच-बीच में निक्की दीदी के साथ जाया करूँगा। और वहाँ क्या करूंगा, यह मुझ पर ही छोड़ दिया जाए।” चारों ने तालियाँ बजाकर एक-दूसरे के आइडियाज को दाद दी। वे इस कदर खुश और रोमांचित थे, जैसे किसी जबरदस्त नाटक की तैयारी कर रहे हों। * अगले दिन से ‘ऑपरेशन यंग स्टार्स’ शुरू हुआ। सबसे पहले कुणाल को ही अपनी प्रभावशाली भूमिका में उतरना था। इसलिए सुबह से ही वह व्यस्त था। उसने अपने घर की फिजूल सामान वाली कोठरी में से एक बड़ा सा पुराना थैला ढूँढ़ा। फिर अपने दोस्त रफीक की जनरल मर्चेंट की दुकान से रोजाना घर में काम आने वाली अच्छे ब्रांड की कुछ चीजें लेकर बैग भर लिया। कुणाल का खूब बड़ा सा बैग किस्म-किस्म के बिस्कुट, नमकीन, सर्फ, डिटरजेंट पाउडर, रोटी रैपर जैसी चीजों से भर गया था। उसने पैंट भी थोड़ी पुरानी, घिसी हुई पहनी। सिर पर एक बड़ी सी नीली कैंप लगा ली, जिससे उसके घुँघराले बाल छिप गए और चेहरा काफी बदला हुआ सा लगने लगा। और फिर बड़े स्टाइल से वह राजन के कमरे पर पहुँचा और दरवाजे की घंटी बजा दी। राजन ने दरवाजा खोला तो सामने एक अजनबी बच्चे को देखकर कुछ चिढ़ सा गया। पर कुणाल का बात करने का अंदाज इतना शानदार था कि राजन उससे प्रभावित न होता, यह हो ही नहीं सकता था। उसने कुणाल से रोजमर्रा की जरूरत का सामान दिखाने के लिए कहा, तो कुणाल बड़ी विनम्रता से कहा, “सर, सामान देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आप पैसा एक भी न दें, पहले मेरी चीजें तो इस्तेमाल करें। मैं अगले हफ्ते आऊँगा। अगर आपको सामान ठीक लगे, तभी पैसे दीजिएगा।” इस पर राजन ने कई बिस्कुट, नमकीन के पैकेट के साथ रोटी रैपर, सर्फ और डिटरजेंट भी खरीदा। फिर खुद ही आग्रह करके पैसे भी दिए। जल्दी ही कुणाल से उसकी दोस्ती हो गई। हर दूसरे-तीसरे दिन वह राजन के कमरे पर दिखाई देता। अब तो कुणाल के जल्दी-जल्दी चक्कर लगने लगे। राजन से उसकी खूब खुलकर बातें होतीं। एक दिन बातों-बातों में राजन ने कुणाल से कहा, “यार कुणाल, क्या तुम किसी ऐसे रिटायर्ड फौजी को जानते हो, जो सेना के बारे में कुछ जरूरी जानकारी दे सके। तुम जगह-जगह घूमते हो। अगर कुछ पता चले तो बताना।” “सेना के बारे में जानकारी, किसलिए?” कुणाल ने मासूमियत से पूछा।

“कुछ नहीं, अ… अ… कुछ नहीं। असल में मैं… अ… कुछ रिसर्च करना चाहता था!” राजन ने बात बनाने की बहुत कोशिश की, पर उसका झूठ छिपाए छिप नहीं रहा था। उसकी घबराहट से कुणाल को पता चल गया कि मामला संगीन है। फिर भी उसने बात बनाते हुए कहा, “इस मोहल्ले में एक मिलिटरी के रिटायर्ड अफसर रहते तो हैं, मि. खोसला। पर… वे ऐसे देशभक्त हैं कि एक बार किसी ने सेना के कुछ भेद जानने के लिए उनसे संपर्क किया और लाखों रुपए की रिश्वत देनी चाही, पर उन्होंने उलटा उसी जासूस को पकड़वा दिया। अखबार में छपी थी यह खबर पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुनकर राजन की आँखें झुक गईं। बोला, “ऐसा है, तो उन्हें रहने दो… रहने ही दो।” इसी तरह कुछ दिन बीते। एक दिन कुणाल ने नीली आँखों वाले राजन से पूछा, “आपको खाना बनाने के लिए तो किसी की जरूरत नहीं है? असल में हमारे पड़ोस में एक लड़की रहती है। वह गरीब घर की है, थोड़ी जरूरतमंद है। पर काम-काज में होशियार है। खाना तो इतना अच्छा बनाती है कि आप उँगलियाँ चाटते रह जाएँगे।” राजन खुश होकर बोला, “ठीक है, फिर तो मिलवाना। बल्कि कह दो, कल ही से काम शुरू कर दे।” निक्की गरमी की छुट्टियों में बोर हो रही थी। उसे बच्चों की जासूस पार्टी की ओर से किए जा रहे ‘ऑपरेशन यंग स्टार्स’ का यह रोमांचक काम सौंपा गया, तो बड़ी खुश हुई। अपने पुराने कपड़ों की गठरी निकालकर खासकर ऐसे कपड़े चुन लिए, जिनके रंग धुँधला गए थे। मुसकराकर सोचने लगी, ‘कपड़े तो हो गए। लेकिन घर में काम करने वाली महरी कैसे बात करती है, यह अंदाज भी सीखना होगा।’ अगले दिन निक्की कुणाल के साथ राजन के घर गई। बोली, “मैं सुबह-शाम खाना बना दिया करूँगी। पैसे जो आप ठीक समझें, दे दें।” और फिर जैसा होना था, बड़ी जल्दी निक्की भी अपनी रसोईदारिन की भूमिका में पास हो गई। उसे थोड़ा-बहुत खाना बनाना आता था, पर बड़ी जल्दी उसने सब तरह की चीजें बनाना सीख लिया था। राजन उसके बनाए खाने की अकसर तारीफ करता। वह अकसर राजन के घर आते-जाते हुए नीटू से बात करके जाती। नीटू कुर्ता-पाजामा पहने, ठेठ चूरन वाला बनकर अपना जलवा दिखा रहा था। मोहल्ले के ढेर सारे बच्चे उसे घेरे रहते। उनसे उसे राजन और उसके घर आने-जाने वालों की पूरी जानकारी मिल जाती। निक्की नीटू से सारी जानकारी लेकर कुणाल तक पहुँचाती। अब तो राजन के सारे करतब रोज के रोज सभी को पता चलने लगे। वह किन-किन से मिलता है, फोन पर किस-किस से क्या बातें होती हैं, निक्की को सबकी खबर रहती। फिर ये बातें जासूस बच्चा पार्टी की डायरी में दर्ज हो जातीं। टिल्लन था जासूस बच्चा पार्टी का सबसे छोटा सदस्य…! वह जब-तब निक्की के साथ जाने लगा। यों बच्चों की जासूस पार्टी के चारों सदस्य अब सही मोरचे पर डट गए थे। ऑपरेशन यंग स्टार्स के चारों साथी काम करने के दौरान जो बातें देखते, वे कोड भाषा में एक-दूसरे को बताते। फिर समय तय करके उसी खँडहर में दिन में एक बार जरूर मिलते। आगे की योजनाएँ बनतीं। टिल्लन सबसे छोटा था, मगर सबसे ज्यादा वही बेसब्र हो रहा था। वह बार-बार कहता, “अब हमें जल्दी से दुश्मन को पकड़ना चाहिए।” पर कुणाल और नीटू का कहना था कि अभी सही मौका नहीं है, थोड़ा और इंतजार करना ठीक रहेगा। फिर वह मौका भी आ गया। एक दिन राजन ने निक्की से कहा, “कल मेरे कई दोस्त खाने पर आ रहे हैं। खाना बहुत अच्छा और लजीज बनना चाहिए। कोई आठ-दस लोग आएँगे।” निक्की बोली, “आप चिंता न करें। खाना ऐसा बनेगा कि लोग याद करेंगे। मैं अपने छोटे भाई टिल्लन को भी साथ ले आऊँगी। बड़ा चुस्त है। वह काफी मदद कर सकता है।” * अगले दिन पार्टी थी। निक्की और टिल्लन ने खूब मेहनत से खाना बनाया। परोसने का जिम्मा टिल्लन और कुणाल का था। कुणाल बिस्कुट – नमकीन के कुछ बढ़िया पैकेट्स के साथ पहुँच गया था और राजन ने उसे भी रोक लिया था। यों पूरी ऑपरेशन यंग स्टार्स मंडली एकदम चौकस थी और उत्सुकता से आने वालों का इंतजार हो रहा था। कुछ देर में एक-एक करके आठ लोग आ गए। अपनी-अपनी आलीशान गाड़ियों से उतरकर वे भीतर आए, तो कुणाल ने पहचाना कि इनमें दो तो वे ही विदेशी हैं, जिन्हें उसने हाथी बाग में देखा था। बाकी लोगों में दो सेना के रिटायर्ड मेजर थे। कुणाल की बच्चा पार्टी अब ऑपरेशन यंग स्टार्स के लिए पूरी तरह तैयार थी। सबसे ज्यादा दारोमदार कुणाल और टिल्लन पर था। टिल्लन ने अपनी शर्ट पर कैमरा फिट किया हुआ था, जबकि कुणाल की जेब में छिपा हुआ टेप रिकार्डर अपना काम कर रहा था। सबके चेहरे ही नहीं, बातें भी रिकार्ड हो रही थीं। नीटू को आने-जाने वालों पर निगाह रखने वाले वाचमैन की भूमिका दी गई थी और निक्की संदेशवाहिका बनी थी। जिस समय लजीज खाना खाने के बाद राजन और मेहमानों के बीच लेन-देन की बातें हो रही थीं और मिलिटरी के जरूरी नक्शों के लिए पूरे दस लाख में सौदा हो रहा था, कुणाल और टिल्लन किसी बहाने से बिल्कुल पास आ गए थे, ताकि सारी चीजें साफ-साफ दर्ज हो जाएँ। आगे के लिए कुछ और सौदों की बात विदेशियों ने की थी और उसके लिए दोगुनी रकम देने की बात की थी। यह भी कुणाल और टिल्लन के रिकार्ड में आ चुका था। अब राजन का सारा खेल खत्म हो चुका था और सबके सबूत भी हासिल हो गए थे। विदेशी लोगों का भीषण षड्यंत्र भी। इस कमरे में देश की इज्जत ही नहीं, देश की आजादी का भी सौदा हो रहा था। कुणाल इस कदर उत्तेजित था कि उसका मन हुआ, वह चिल्ला पड़े, “देश के दुश्मनो, तुम्हारी यह मजाल…!” पर यह वक्त सावधानी से काम करने का था, वरना सारी योजना मिट्टी में मिल सकती थी। आखिर कुणाल चुपके से निकला। उसने दूसरे कमरे में जाकर पापा को फोन किया, “पापा, आपको यहाँ पहुँचना है अभी, जल्दी, एकदम जल्दी, वरना खेल खराब हो सकता है!” कुणाल के पापा पहले तो सारी बात सुनकर हक्के-बक्के रह गए। पर जल्दी ही वे सँभले। बोले, “ठीक है, बेटे। बिल्कुल फिक्र न करना, हम जल्दी ही पहुँच रहे हैं।” थोड़ी देर में ही कुणाल के पापा, डी.आई.जी. समरेश दास के नेतृत्व में पुलिस बल ने राजन के मकान को चारों ओर से घेर लिया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की छाया थी। राजन ने भागने की कोशिश की, पर नीटू उसके घर के आगे एकदम चौकन्ना खड़ा था। उसने कसकर उसे पकड़ा और पुलिस वालों को सौंप दिया। नीटू को राजन और उसके घर आने-जाने की पहचान थी। लिहाजा उसके इशारे पर दूसरे अपराधी भी पुलिस के जाल में आ फँसे। वे छिपे हुए गद्दार भी पकड़े गए, जो कुछ पैसों के लालच में देश की सुरक्षा का सौदा कर रहे थे। जब सभी को पकड़कर पुलिस जीप में बैठाया जा रहा था, तो राजन को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से हुई कि उन्हें पकड़वाने वालों में कुणाल, निक्की, टिल्लन और नीटू सबसे आगे थे। पापा ने कुणाल और उसके दोस्तों की पीठ थपथपाकर कहा, “अरे, ये तो ऐसे खतरनाक लोग हैं, जिनकी हमें बरसों से तलाश थी। तुम्हें इनका कैसे पता चला? तुमने मुझे बताया क्यों नहीं! अगर कुछ हो जाता तो….?” “असल में पापा, पहले हम लोग खुद कोशिश करके देखना चाहते थे!” कुणाल ने कुछ शरमाते हुए कहा। उसके दोस्त भी मंद-मंद मुसकरा रहे थे। कुणाल के पापा ने कुणाल, नीटू, निक्की और टिल्लन सबकी खूब पीठ ठोंकी। खासकर टिल्लन की सबसे ज्यादा तारीफ हुई, क्योंकि उम्र में वह सबसे छोटा था, पर काम उसने बड़ा किया था। अगले दिन अखबार में ‘ऑपरेशन यंग स्टार्स’ की पूरी रिपोर्ट छपी थी। उसे पढ़ने के लिए लोग टूट पड़े थे। दूर-दूर तक कुणाल और उसके बहादुर साथियों की चर्चा थी। आखिर जासूस बच्चा पार्टी ने अपनी समझदारी से ऐसा कारनामा कर दिखाया था, जिसे पढ़कर बड़े भी दंग थे। अलबत्ता ऑपरेशन यंग स्टार्स के बाद हुआ यह कि बच्चों की जासूस पार्टी का नाम पड़ा ‘जासूस पार्टी नं. 1’ और आज भी शहर के लोग उसे यही कहकर बुलाते हैं।