gyan ka deepak
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Hindi Motivational Story: ब्रह्मदेश के राजा थिंबा महान ज्ञानयोगी थे। कई बार एक भिक्षुक उनके पास आकर बोला, राजन, मैं अनेक वर्षों से अखंड जप ध्यान करता आ रहा हूँ, लेकिन मुझे आज तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। जबकि राजवैभव में लिप्त होने के बावजूद आपको ज्ञान की प्राप्ति हुई है।

इसका क्या कारण है? थिंबा बोले, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं उचित समय पर दूँगा। फिलहाल यह दीपक लेकर तुम मेरे महल के अंतःपुर में निस्संकोच प्रवेश करो और जो-जो चीज़ें चाहते हो, वह हासिल कर लो। तुम्हारे लिए कोई रोक-टोक नहीं है। लेकिन ध्यान रहे, यह दीपक बुझने न पाए, अन्यथा तुम्हें पाप का भागी होना पड़ेगा। वह भिक्षुक दीपक लेकर महल के अंतःपुर में गया और कुछ समय बाद लौट आया। थिंबा ने उससे पूछा, कहो बंधु, तुम्हें मेरे अंतःपुर में आनंद प्राप्त हुआ? खाद्य, पकवान, मदिरा आदि तो तुम्हें आसानी से हासिल हो गए होंगे। भिक्षुक ने कहा, राजन, मेरा अहोभाग्य कि आपने मेरे लिए राजभवन के द्वार खुले छोड़ दिए। लेकिन खाद्य, मदिरा और नृत्य-संगीत का आस्वाद लेने के बावजूद मेरे मन को तृप्ति नहीं मिली, क्योंकि मेरा पूरा ध्यान तो आपके दिए हुए दीपक की ओर था कि इसे बुझने नहीं देना है। थिंबा बोले, ज्ञान की प्राप्ति भी ऐसे ही होती है मित्र। सुखोपभोग के बीच भी अगर हम अपने अंदर के दीये को बुझने ना दें, तो लक्ष्य प्राप्ति अवश्य होती है।

ये कहानी ‘नए दौर की प्रेरक कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंNaye Dore ki Prerak Kahaniyan(नए दौर की प्रेरक कहानियाँ)