एक था साधु सेवादास। वह दूसरे साधुओं से अलग था। सारा दिन ईश्वर की पूजा करने की बजाय, उसे मुसीबत में पड़े लोगों की मदद करना अच्छा लगता था। इसी को वह ईश्वर की सच्ची पूजा कहा करता था।
दूसरे साधु यह पसंद नहीं करते थे कि सेवादास दौड़-दौड़कर लोगों के काम करे। उन्होंने उसे अपनी मंडली से अलग कर दिया। पर सेवादास पर कोई असर नहीं पड़ा। वह नदी किनारे एक कुटिया बनाकर रहने लगा। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक जितना वह लोगों की मदद कर सकता था, करता था।
इसी कारण हर कोई साधु सेवादास का नाम आदर और प्यार से लेता था। पर दूसरे साधु-संन्यासी फिर भी उससे चिढ़ते थे। वे कहते, ”सेवादास दुनियादारी की माया में फँस गया है।”
इस पर सेवादास हँस देता। या फिर मुसकराते हुए बड़ी सरलता से जवाब देता, ”दीन-दुखियों की सेवा करके ही मुझे सच्चा सुख मिलता है। फिर इसे क्यों छोड़ूँ?”
एक दिन की बात, सेवादास पूरे दिन एक बीमार बुढ़िया की सेवा करता रहा। बुढ़िया अकेली थी। दुनिया में उसका कोई और न था। रात होते-होते सेवादास के जड़ी-बूटियों के इलाज से बुढ़िया का बुखार उतरा। बुढ़िया को चैन पड़ा तो उसने गद्गद होकर आशीर्वाद दिया, ”जा बेटा, ईश्वर तेरा भला करेगा!”
सेवादास लौटकर अपनी कुटिया में आया। अभी वह सोने ही वाला था कि अचानक कुटिया में एक तरफ उसे उजाला दिखाई दिया। धीरे-धीरे उस उजाले में एक सुंदर अलौकिक पुरुष दिखाई देने लगा। वह बोला, ”सेवादास, मैं ईश्वर के सबसे सच्चे भक्तों का नाम लिख रहा हूँ। खुद ईश्वर ने मुझसे कहा है, सेवादास के पास जाकर पूछो, वह सही-सही बता देगा।”
सुनकर सेवादास को अच्छा लगा। वह ईश्वर के जिन सच्चे भक्तों को जानता था, उन सबके नाम एक-एक कर लिखवाने लगा। नाम लिखने के बाद वह अलौकिक पुरुष जाने लगा, पर चलते-चलते उसने पूछा, ”अरे सेवादास, तुमने अपना नाम तो लिखाया ही नहीं?”
इस पर सेवादास झिझकते हुए बोला, ”प्यारे भाई, सच कहूँ तो मैं तो लोगों की सेवा करने में ही लगा रहता हूँ। इसी में इतना समय लग जाता है कि ईश्वर की पूजा और भजन करने की फुर्सत ही नहीं मिलती।”
”ठीक है!” कहकर वह अलौकिक पुरुष गायब हो गया।
अगले दिन वह फिर आया। उसने कहा, ”ईश्वर के सच्चे भक्तों की मेरी सूची पूरी हो गई है। क्या तुम उसे देखना चाहोगे?”
सेवादास ने देखा तो चौक पड़ा। उस सूची में उसका नाम सबसे ऊपर था और सुनहले अक्षरों में लिखा था।
सेवादास को हैरान देखकर उस अलौकिक पुरुष ने कहा, ”जब मैं ईश्वर के सच्चे भक्तों की सूची बनाकर ले गया, तो ईश्वर ने खुद अपने हाथों से तुम्हारा नाम सबसे ऊपर लिख दिया। और कहा, कल जाकर यह सेवादास को जरूर दिखा देना। साथ ही उससे यह भी कहना कि सुनो सेवादास, जो मेरी बनाई सृष्टि को प्यार करता है, वही मेरा सबसे सच्चा भक्त है।”
सुनकर सेवादास का सिर आनंद और कृतज्ञता से झुक गया। जब उसने सिर उठाया तो देखा, वह अलौकिक पुरुष गायब हो चुका था।
