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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

उखड़े फर्श पर पोंछा लगाते हुए मालतू ने फर्श पर पड़े लाल धब्बों को जोर से पोंछे के साथ घिसते हुए सोचा- “कैसा लहू है मेरा जहाँ गिरता है वहीं जम जाता है। लाख कोशिश करने पर भी जमीन को नहीं छोड़ रहा है। वैसे भी सर्दियों में सब कुछ जम जाता है और हमारे रिश्तों पर से जाड़ा कभी गया ही नहीं। चील की शलाकाएँ जलाकर आँच देने का हर यत्न असफल रहा, इसके विपरीत धुआँ ही पड़ा, कालख ही छाई। धुआँ आँखों को लगा और आँख का पानी कभी सूखा ही नहीं। पास पड़े टीन के टुकड़े से लहू के धब्बों को रगड़ा। ‘खरड-खड’ की आवाज सुन नंगी खाट पर सोया उसका पति चिल्लाया, आधी रात को क्या उखाड़ रही है।”

“तू सोया हुआ न उठे तो उजाला नहीं होगा। आँखें मीच कर दिन को रात न समझ” मालतू बोली। उसके पति ने फटी रजाई ऊपर खींचते हुए कहा, “इस रजाई की सारी सिलाइयाँ निकल गई हैं। जगह-जगह रुई की गाँठे बन गई हैं। अब यह सर्दी कम ही रोकती है।”

“दोष रजाई का नहीं, तेरा है। तान दे-देकर सिलाइयाँ निकाल लीं। रुई बेचारी क्या करती। कपड़े के अंदर ही उसकी एक सीमा होती है। बेचारा सिलाई के किसी टाँके के सहारे इकट्ठा होकर बैठ जाता है।” मालतू ने उत्तर दिया और पोंछे को कसकर निचोड़ा। उसमें से निकली पानी की बूंदों को जमे हुए रक्त के धब्बों पर डाला। सोचने लगी किसी दिन उसको भी निचोड़ने पर बिरली-बिरली ही रक्त की बूंदे निकलेंगी। रक्त बनने वाली व्यवस्था कब से खत्म हो गयी है। उसने फिर टीन के टुकड़े से रगड़ने की कोशिश की जैसे वह अपना कोई भी अता-पता नहीं छोड़ा चाहती हो। उजाला होने से पहले उजाने की तरह बिलकुल साफ-सुथरी, नई-नवेली और तरो-ताजा होना चाहती थी। बाकी पूरा दिन चारों ओर छाए प्रदूषण से कोई कैसे बच सकता है?

उसके पति ने रजाई की बुक्कल में बैठते चिल्ला कर कहा, “तू मुझे सोने देगी या नहीं?” कितना अन्धेरा है अभी।

“जाड़ों में उजाला देर से और अंधेरा जल्दी घिर जाता है। जब सूरज का सफर कम हो जाता है तो गर्मियां छोड़ जाड़ा आ जाता है। घड़ी की गति सदियों से ऐसी ही है।” मालत ने कहा।

चार जमातें क्या पढ़ लीं कि ताने ही देती रहती है। कर क्या रही हो? पति ने कहा।

रात को जब तूने थप्पड़ मारा था न तो मेरा कमजोर शरीर ताकतवर लहू को अंदर नहीं रख सका तो कुछ बूंदे फर्श पर पड़ी थीं।” उन्हीं को मिटाने की कोशिश कर रही हूँ। कोई आएगा तो क्या देखेगा। भले ही जानते सभी हैं। अपने और आपके साथ-साथ उनके सच को भी झूठ का आवरण ओढ़ा रही हूँ, जैसे कभी पीतल के बरतन कलई किए जाते थे ताकि उसका कसैलापन न रहे। कसैलापन लगने से सब कुछ कसैला हो जाता है।

उसके पति ने चौंक कर खटिया से यूँ छलाँग लगाई जैसे किसी विस्फोट की आवाज सुन दरख्त से पक्षी उड़ जाते हैं। उसने हैरान होकर पूछा, “रात मैंने तुझे मारा था? बच्चों की कसम मुझे कुछ पता नहीं।”

वह जब भी मालतू को मारता, दूसरे दिन इसी प्रकार दूध में धुला होने की कोशिश करता। मालतू मौसम देख अपने टूटे घोंसले से निकल कर कुछ तीलिएँ, तिनके खोजने उड़ने लगती। पर आज मालतू ने कहा, “मैंने शादी तो एक मर्द से की थी, पर निपटना कइयों के साथ पड़ता है। उसकी असली शकल मैंने कभी नहीं देखी। पल में असली और पल में नकली लगता है। फिर और दूसरा और दूसरा, फिर और…।”

मालतू के पति की स्थिति उस पात्र की सी समझो जो मंच पर पहुँचते ही अपना पार्ट भूल जाए, मंच पर खड़े होना भी मुश्कल और मंच छोड़ना उससे भी कठिन, पर कलाकारी इतनी ऊँची कि लोग उसके मुख के हावभाव देख उसे बहरा या गूंगा समझ तालिणं मारें।

मालतू के कानों में तालियाँ गूंजतीं और आंखों के सामने भ्रम नाच तैरने लगता। न जाने क्यों मालतू आज तिनकों की तलाश में उड़ी नहीं। उसके पंखों ने उसे आकाश नहीं दिखाया उसने हाथों में पकड़े कनस्तर के टुकड़े को दूर फेंका और उसके जमीन पर गिरने की आवाज को धमाका समझ कर डर गई। आदमी जब गहरी सोच में उलझा हो तो प्रायः छोटी-सी आवाज भी उसके मस्तिष्क के खाली वातावरण में बड़ी बनकर देर तक गूंजती रहती है। अब मालतू बिना आवाज रक्त के धब्बे साफ करने लगी। गहरे पानी में आवाज नहीं, पर गति तेज बहुत होती है।

मालतू के पति ने उसके पाँवों को हाथ लगाकर हाथ जोड़कर माफी माँगी। पीछे वाले पानी की टूटी बाल्टी उठाकर जाते हुए मालतू ने पूछा, “हाथ जोड़कर पिछले गुनाह की माफी माँग रहा है या अगले गुनाह की अनुमति ले रहा है।”

“बात तो सुन। कहाँ जा रही है?”

“खून वाले पानी को पोंछा हर जगह तो नहीं लगाना है। पानी बदल आती हूँ ताकि इधर की खबर उधर न पहुँचे, नहीं तो वे-हुरमती है क्योंकि कई बार यह बगावत को जन्म देती है।”

“तू मेरे विरुद्ध बगावत करेगी?”

“अत्याचार की अति हो जाने पर भी जो विद्रोह नहीं करता वह न आदमी है, न पशु और न ही मशीन क्योंकि ये सब बगावत नहीं करते। दसवीं में हमारे हिंदी के अध्यापक ये बातें पढ़ाते तब कुछ भी समझ नहीं आता था, तब अंबर छूने का साहस था। अब सब कुछ समझ में आता है, पर सिर्फ समझ में ही आता है। एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर वह बाहर चली गई। उसका पति भी उसके पीछे-पीछे गया।” तो विद्रोह आपको मास्टर जी ने सिखाया?”

मालतू ने मैले पानी को बाहर फेंका और बाल्टी भी उसके हाथ से छूटकर ऐसे चिल्लाई, जैसे कुत्ता सोटी मारने पर चिल्लाता है। बाल्टी में उसे अपना आप दिखा। झट से बाल्टी और फिर उससे अलग हुए हैंडल को उठाया। उसे लगा, वह अपनी बिखरी जिंदगी चुन रही हो। परन्तु पौधे से टूटे फूलों, पत्तों और फलों को आदमी चुन तो सकता है, पर उनको पौधे के साथ जोड़ना संभव नहीं। अजीब बात तो यह है कि यह पौधा भी उनकी सुध नहीं लेता और नए फूल-पत्ते बनाने की प्रक्रिया में व्यस्त हो जाता है। पुराने का परित्याग कर देता है, जैसे जानवर अपना मल त्यागते है। पर मालत ने हैण्डल को बाल्टी से जोड़ा-फिर टूटे-ड्रम से टूटे मग के साथ बाल्टी में पानी डाला और अंदर चली गई। उसका पति भी उसके पीछे-पीछे आया और दरवाजे को बंद करते हुए पूछा, “और क्या कहते थे तेरे मास्टर जी।”

“दुनिया की हर वस्तु में विद्रोह का बीज होता है, जो हालात और समय की गर्मी से फूटता है। पहले अंकुर फिर वृक्ष बनता है। यदि वह बीज अंकुरित न हो, आदमी ब्रायलर अंडा समझो जिसमें से बच्चा नहीं निकलता।” इतना कहकर मातू ने बिस्तर लपेटे और खाट दालान में खड़ी कर दी।

“बच्चों को आज स्कूल नहीं जाना है? बात बदलते हुए मालतू के पति ने पूछा।” मालतू ने उसकी ओर घूर कर देखा, ‘तू तो रविवार को भी स्कूल भेजेगा। पहले कभी न पूछा। वह खिसियाना हो गया था। बात बदली, तेरी भी छुट्टी है?”

“मालतू ने हँसते हुए उत्तर दिया, “मेरी छुट्टी हुई तो पूरे घर की छुट्टी हो जाएगी। मैं कोई सरकारी कर्मचारी थोड़े हूँ। सरकारी छुट्टी वाले दिन मुझे लोगों का घर झाड़-बुहार कर चमकाना होता है। सारा कूड़ा बाहर फेंकना होता है। एक घर में ज्यादा समय लगे तो दूसरे में पहुँचकर पहले डाँट खानी पड़ती है।”

मालतू के पति को यूँ लग रहा था, मानो उसे सर्दी में भी पसीना आ रहा है। उसे यह भी समझ नहीं आ रहा था कि यह मौसम का प्रभाव है या शर्म उस पर कब्जा जमा रही है। आज तक उसने शर्म को अपने घर पर काबिज नहीं होने दिया था। ध्यान बटाने के लिए उसने बीड़ी सुलगाई।

मालतू लगभग दस घरों में काम करती थी। कम-अज-कम चालसी छोटे-बड़ों की बातें रोज सुनती थी। किसी के कपड़े ठीक नहीं धुले, किसी के बरतनों में चिकनाई रह गई, कहीं पोछा ठीक नहीं लगा और कहीं कूड़ा रह गया। मन कभी नकाब नहीं ओढ़ता, पर मुख पर कभी घृष्ठता और कभी कागजों का नकाब चढ़ाना पड़ता है।

मालतू को रसोई की ओर जाते देख उसने कहा, ‘जल्दी जगा दिया तो चाय का घूट ही पिला दे।”

“देसी चाय का कहवा उबाल कर रखा है। दूध दुकान से लाना पड़ेगा और कहवा ही पीना है तो गर्म कर ले।” मालतू ने कहा।

कितनी बार मैंने तुझे कहा कि किलो दूध की लाग लगवा ले, पर तू मानती ही नहीं। “तू वेदी में किए गये उन वचनों को भी भूल गया कि मैं तुझे भर पेट रोटी खिलाऊँगा। मुझे रोटी कमानी भी पड़ती है और पकानी भी पड़ती है।”

“कल रात को भी तूने ऐसी ही बात कही थी क्या?” उसके पति ने पूछा।

मैंने कहा था कि अगर तू घर का खर्च चलाए तो मुझे लोगों के घरों में काम करने से छूट हो जाए। पेट में रोटी और तन पर कपड़ा। इतनी ही जरूरत है मेरी। वैसे पेट आधा खाली भी रहेगा तो भी गुजारा हो जाएगा। घर-घर झाँकना, उतरन पहननी और जूठन खानी ऐसे ही है, जैसे प्यास मिटाने के लिए समुन्दर का नमकीन पानी पीना।”

उसका पति कछ गस्से से बोला, “काम करना कोई पाप थोडे है। त देह तो नहीं बेचती। आकाश में हवा जग गई। पक्षियों के पंखों की लचक खत्म हो गई। छोटा-सा आकाश असीम हो गया। चुप रहना अपना अस्तित्व समाप्त करना था।”

“देह तो नहीं बेचती, पर अपने आपको मैं रोज किसी मंडी का सौदा अवश्य महसूसती हूँ। कीमतें भी कई पड़ती है। स्याने लोग कहते हैं जब किसी वस्तु की कीमत बद दी जाती है तो वह रहती नहीं है। लोगों की आँखों और बातों से मन पर खरोंचों के नीले निशान अवश्य पड़ते हैं। इतना कहकर मालतू फिर से दूसरे कक्ष में चली गई क्योंकि वह जानती थी कि यह धरती कभी नम नहीं होगी।”

“कौन-सी खरोचों की बात कर रही है तू। मुझे कभी दिखी नहीं।” उसके पति ने ऊँचे स्वर में कहा। कुछ देर के लिए सूर्य के सामने जैसे बादल का टुकड़ा आ गया हो, पर उसके कान मालतू की ओर ही थे। क्या कहती वह। मालतू बाहर आई। उसके हाथ में मैले कपड़े थे। कपड़े बाल्टी में डाले और उत्तर दिया, “तुझे खरोंचे और नीले दाग दिखते तो वे पड़ते ही क्यों। मालतू ने आंगन में खड़े होकर सामने की ओर देखा। मद्धम-सा उजाला फैल रहा था। अपने आप में उसने कहा, “सर्दी में उजाला होने में ही नहीं आता।”

मालतू ने पति से कहा, “रोटियाँ बनाकर रख दी है। अचार की डली चपाती पर रखकर बच्चों को चाय के साथ दे देना। दूध के लिए दस रुपए पूजा की तख्ती पर रखे हैं।” कुछ चुप रह कर फिर कहा, “देखना बीड़ी का बंडल नहीं ले आना कि बच्चों को कहवा ही पीना पड़े।”

वह कमरे में चला गया था।

मालतू टूटे ड्रम के पास पड़े चौड़े से पत्थर पर कपड़े धोने लगी। ठंडे पानी से उसकी मैत्री थी। उससे उसे कभी ठंड नहीं लगी। जब भी मिलता ठंड छिपा कर ही मिलता। मालतू सोच रही थी कि कितनी बार ही अपने पति को शराब छोड़ने के लिए कह चुकी हूँ।” रोज दिहाड़ी लगाने जाया कर पर जितनी देर तक उसके पास साँझ का प्रबंध होता है वह दिहाड़ी लगाने नहीं जाता। मालतू ने जब कभी भी कहा कि “तू घर में जो भी थोड़ा बहुत लाएगा मैं उसी में गुजारा कर लूंगी, मैं घर में ही रहना चाहती हूँ।” तो वह कहता है, “तू पिंजरे में बन्द होने को कह रही है। पंछी बनकर आकाश में उड़ना अच्छा नहीं लगता? उस समय मालतू का भी एक ही उत्तर होता, पंछियों को पूछा किसी ने कभी कि आकाश में ‘क्या-क्या है? अपने शरीर के एक-एक कोने को संभालना पड़ता है। कौए, गिद्ध, बाज पैनी चोंचे खोलकर उड़ते रहते हैं। किसी को छुओ तो बुरे, न छुओ तो बुरे।

मैले कपड़ों पर उसकी थपकी चल रही थी और मैल धीरे-धीरे निकल रही थी, पर समय की थपकी वह भी सदियों से सहती जा रही थी। उसकी मैल ऐसी जम गई थी कि हिलने का नाम नहीं ले रही थी। घास काटने वाले का बेटा घास ही काटेगा, फूलों के पौधों में फूल ही आएंगे। गरीबी से गरीबी ही जन्म लेती है। भांति-भांति के विचार उसके मन में ऐसे ही आ रहे थे, जैसे कपड़ों पर थपकी पड़ते ही उससे छींटे निकलते हैं और इधर-उधर बूंदे बिखर जाती है।

सूर्य की पतली किरण उसी की प्रतीक्षा में थी। ज्यूँ ही उसने कपड़े धोकर खत्म किए, त्यों ही ड्योढ़ी की दरार से होती अन्दर आ गई। मालतू ने कपडे तार पर डाले और ड्योढी खोलकर पूरे सूरज का स्वागत किया। सूरज का सफर उसे अपनी तरह ही लगता है। सूरज पहाड़ के पीछे से निकलता है। मालतू अपनी डयोढ़ी से निकलती हैं। जाड़ों में यहीं उनकी मुलाकात होती है। फिर दोनों अपनी अन्धी दौड़ पर निकलते हैं। सूरज बेचारा साँझ पूरे दिन की थकन में अपना सुनहरी पन गंवा कर लाल सुर्ख हुआ अपनी दिशा और दशा बदल कर पहाड़ों के पीछे छिप कर धरती पर अन्धेरा कर लेता है और उस अन्धेरे में मालतू थकी हारी, ठोकरें खाती डयोढ़ी तलाशती घर आती है। मालतू समझती है कि पर्वत के पीछे सूरज विश्राम कर रहा होगा, पर उसका सफल अभी कुछ और शेष होता है। अभी-अभी संध्या है। उसे तो रात के अन्धेरे में भी चलना है उजाला होने तक और फिर उजाले में दौड़ना है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’