Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “लाइफ़ बिल्कुल बोरिंग हो गई है यार।” उसने कहा। आमतौर पर मुझे उसकी इस बात से नफ़रत है। कई बार ऐसा लगता है जैसे इसके लिए मुझे ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है।

“लाइफ़ इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए कथक कर के दिखाऊँ तुम्हें?” मज़ाक में मेरी चिढ़ भी घुली हुई थी।

“दिखा दो प्लीज़!”

“दिखा दूँगा; पहले श्योर तो कर लो कि, इससे तुम्हारी लाइफ़ इंट्रेस्टिंग हो जाएगी।”

“मज़ाक छोड़ो। चलो ना कहीं घूमने चलते हैं। दो-चार दिन किसी शांत पहाड़ी जगह पर।” कहते हुए ऐसे आँखें मूँदी, जैसे यहीं समाधि को उपलब्ध हो जाएगी।

“अपनी फैमिली के साथ अभी दो महीने पहले ही तो गई थीं न तुम।” यूँ मुझे पता है, उसकी किसी भी आउटिंग को टाइम फ्रेम में दिखाना उसे चिढ़ाता है।

“लग रहा है कितना टाइम हो गया।” उसने नहीं मुस्कुराने जैसे मुस्कुराते हुए कहा।

“डियर! हर महीने पहाड़ियों पर चले जाने से क्या लाइफ़ इंट्रेस्टिंग हो जाएगी?” मुझे पता है ज़िंदगी की दिलचस्पी दो-चार दिनों के सैर-सपाटे के बाद आख़िरकार मृगमरीचिका साबित होती है।

“थोड़ा चेन्ज तो मिलेगा।”

निहायत फ़ालतूपने ने मेरी चिढ़ बढ़ा दी-“तुम ना, अपने कैलेन्डर में मार्क किया करो, साल में कितने दिन तुमने चेन्ज के लिए दिए और क्या चेन्ज मिल पाया। सुखों की चाहत में तो ज़िंदगी नहीं निकली जा रही? जब जाती हो, तब कौन सा बहुत पॉजिटीव होती हो? और आने के दो-तीन दिन बाद, फिर वही रोना ही शुरू होता है।”

“सीधे बोलो ना जाना नहीं है तुम्हें, बेकार की बहस करनी है बस।” उसके होंठ टेढ़े हुए। उसे वही सुनना होता है, जो सुनना उसके जी में हो; बाकी बातें तो धूल-मिट्टी की परतें होती हैं, जिन्हें झाड़ दिया जाना चाहिए।

वैसे मुझे पता यह भी है कि, टेढ़े होठों और ऐसी ही नज़रों ने दुनिया के अतीत से कितनी खिलवाड़ की है। इतिहास पीड़ित है। आख़िरकार ताक़तवारों से मुकाबले को भी खेल समझ कर झेल जाने वाले योद्धा के ललाट पर ही विजय तिलक सजता है।

“मैं क्या सोचता हूँ; ऐसी सिचुएशन में हमें कहीं और ना जाकर ख़ुद के अंदर या कह लो मेडिटेशन में जाना चाहिए। वरना तो ये सब चेन्ज-वेन्ज और ख़ुद को बोरियत के स्टेटस में समझना ज़िंदगी भर चलता ही रहेगा।”

“तुम करो ये सब बेकार के काम। उसके लिए भी तो माइंड सेट वैसा होना चाहिए ना?”

अब और क्या ही फ़रेब रचूँ कि, माइंड सेट बना सकूँ- “और जिस माइंड का सेटअप हर दिन गड़बड़ाता रहे?” मज़ाक के रास्ते बच निकलना, बेदाग़ होता है।

“तो हर दिन ठीक करते रहो…ही…ही…ही…”

उसकी सहजता कभी-कभी मुझे हैरत में डाल देती है। सहजता और बोरडम; दोनों में से कोई एक तो पूरी नहीं ही थी। अधूरेपनों को जीने की जगह उसे भर देने का ज़ोर लगाना, जन्नत की हक़ीक़त मालूम होना ही है।