एक बार संत व्यंकटेश अपने शिष्य के साथ बीहड़ वन से गुजर रहे थे। तभी उनके ध्यान का वक्त हुआ। वे दोनों ध्यान के लिए बैठे ही थे कि उनको एक शेर की गर्जना सुनाई दी। दोनों ने देखा कि शेर उनकी तरफ ही आ रहा है। शिष्य शेर को देखकर इतना घबरा गया कि वह जान बचाने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गया, किंतु संत व्यंकटेश खामोशी से ध्यान लगाते रहे। शेर वहाँ आया और चुपचाप आगे निकल गया।
शेर जब चला गया तो शिष्य पेड़ पर से उतरा और दोनों आगे बढ़े। थोड़ी देर बाद जब संत व्यंकटेश को मच्छर ने काटा तो उसको मारने के लिए उन्होंने अपने गाल पर चपत लगाई, यह देखकर शिष्य बोला, ‘गुरुदेव क्षमा करें, मेरे मन में एक शंका है, उसका समाधान करें। अभी थोड़ी देर पहले जब एक शेर आपके समीप आया तो आप बिल्कुल नहीं घबराए, किंतु एक मच्छर के काटने पर आपको गुस्सा आ गया।’
संत व्यंकटेश ने जवाब दिया, ‘तुम ठीक कहते हो, लेकिन तुम भूल रहे हो, तब मैं ईश्वर के साथ था इसलिए मुझे डर नहीं लगा और न गुस्सा आया, जबकि मच्छर के काटते वक्त मैं एक इंसान के साथ था। यही वजह है कि जब शेर मेरे पास आया तो मुझे उसकी खबर तक नहीं हुई, जबकि मच्छर के काटने पर मैं बुरी तरह बौखला गया और उसको मारने के लिए मैंने अपने ही गाल पर चपत लगा दी। इंसान का साथ दुनियादारी सिखाता है, जबकि ईश्वर का साथ दुनिया से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।’
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
