दो दिन शादी की धूमधाम के रहे। तीसरे दिन बुधना काम पर जाने लगा तो साथ ही निम्मा भी चल पड़ी। बुधना बोला, “अरे, यह क्या? अभी परसों ही तो हमारी शादी हुई है…!”
निम्मा बोली, “क्यों, तुम मेहनत कर सकते हो, तो मैं क्यों नहीं?”
“पहले की बात अलग है। पर अब तुम इतना भारी वजन उठाओगी तो…? जानती हो न, मजदूरी में कितनी मेहनत करनी पड़ती है!” बुधना ने समझाया।
“तुम्हारे साथ रहूँगी तो सब कर लूँगी। भारी से भारी वजन उठा लूँगी। तुम साथ तो होगे ही, बस थोड़ी मदद कर देना।…और फिर तुम तो कहते हो, मेहनत करना तपस्या है। तो क्या मैं निठल्ली बैठी अच्छी लगूँगी?” निम्मा परी ने कहा।
और फिर निम्मा ने भी बुधना के साथ-साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। दोनों साथ काम करते, साथ-साथ दोपहर का खाना खा लेते। लौटते तो खेतों के बीच घूमते हुए घर पहुँचते। निम्मा रात के खाने में अम्माँ जी की मदद करती। और फिर रात को सोने से पहले निम्मा होंठों पर बाँसुरी रखकर बजाती तो सिर्फ बुधना ही खुश नहीं होता था, बल्कि पूरे फागुन गाँव में संगीत की लहर छा जाती।
बुधना काला था, खूब काला, और निम्मा गोरी-चिट्टी, एकदम चाँदनी सी उजली। लेकिन फागुन गाँव के लोग कहते कि इससे प्यारी जोड़ी हमने आज तक नहीं देखी।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
