कई लोगों के लिए संतुलित भोजन करना और वजन कम करना असंभव होता है। यह जानते हुए भी कि बार- बार खाद्य पदार्थाें का सेवन करना उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है,पर फिर भी वे बार- बार अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थों के सेवन से खुद को रोक नहीं पाते हैं और अधिक खाने की लत के शिकार हो जाते हैं। खाने की लत एक बहुत ही गंभीर समस्या है और इसके मुख्य कारणों में से एक कारण यह है कि कुछ लोग कुछ खाद्य पदार्थों के सेवन से खुद को रोक नहीं सकते हैं, चाहे वह इसके सेवन से खुद को कितना भी रोकने की कोशिश क्यों न कर लें। विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक तेजी से बढ़ रही समस्या है। नौकरी के अधिक दबाव, मदद प्रदान करने के तरीकों का अभाव, रिश्तों में खटास आना और आरामतलब जीवनशैली के कारण काफी संख्या में लोग तनाव से निपटने के लिए भोजन का सहारा लेने लगते हैं, जिससे उनमें खाने की लत बढ़ती है, जो नशा से भी अधिक घातक साबित हो सकता है।
यह बात सही है कि पहले हमारे भोजन में इतनी अधिक विविधता नहीं होती थी, जो आज के समय में हैं। आज के समय में खुद को व्यंजनों के आकर्षण से रोक पाना वास्तव में कठिन है। इसके अलावा, हमारा खाद्य संस्कृति काफी समृद्ध रही है। हममें से ज्यादातर लोग ‘‘खाने के लिए ही जीते रहे” हैं। इससे खाने के प्रति लत को बढ़ावा मिलता है यह हमारे स्वास्थ्य के लिये खतरनाक साबित हो सकता है और इसका कारण यह है कि हम इस ओर कम ध्यान देते हैं और यह सबसे सामान्य प्रकार की लत है।

कौन हैं खाने के दीवाने?
खाने की लत से ग्रस्त व्यक्ति उस समय भी खाने से परहेज नहीं करते जब उनका पेट पूरा भरा होता है सिर्फ इतना ही नहीं वे अक्सर चुपके से खाना खाते हैं, भोजन को छिपाते हैं और वे यहां तक कि तब भी खा लेते हैं जब वे वास्तव में भूखे नहीं होते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि वे अधिक खाने के कारण अक्सर बीमार हो जाते हैं। यही नहीं वे जब कभी तनाव या डिप्रेषन में होते हैं, तो वे कुछ खाने लगते हैं। यह ऐसी स्थिति है जो धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। इसकी परिणति ताउम्र मोटापे या स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में होती है। इसके कारण मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ जाता है।

खाने की लत के आम लक्षण हैं:
– क्या खाना है, कब खाना है, कितना खाना है, और अधिक भोजन कैसे प्राप्त करना है, को लेकर लगातार जुनून
–  खाने के समय अधिक खाना लेना
– लगातार स्नैक्स का सेवन करना
– रात के मध्य में जैसे अजीबोगरीब समय में खाना
–  दोस्तों और परिवार से खाने की आदतों को छिपाना या गुप्त रूप से खाना
– अधिक खाना और उसके बाद भोजन को निकालना, व्यायाम करना या लैक्जेटिव गोली का सेवन करना
–  जब पेट पूरा भरा हो तब भी खाना
–  टीवी देखना या फोन पर बात करना जैसी सुखद गतिविधियों के साथ खाना
– खुद को दंड देने या पुरस्कृत करने के रूप में भोजन करना़
– अधिक भोजन करने या अधिक भोजन करने के बाद उसे निकालने का लगातार असफल प्रयास करना

क्या होता है परिणाम
खाने की लत कई नकारात्मक परिणाम निकलते हैं। अगर इसका उपचार नहीं हो तो इसकी लत के षिकार लोग मोटापे को झेलते रहते हैं। मोटापा और खराब पोषण के कारण हृदय रोग, टाइप 2 मधुमेह और अन्य रोग हो सकते हैं। खाने की लत से ग्रस्त लोगों में पाचन समस्यायें, गंभीर कब्ज जैसे समस्यायें आम है।

इलाज
खाने की लत के इलाज के दौरान खाने की षारीरिक इच्छा को नियंत्रण करने के साथ-साथ खान-पान की आदतों में बदलाव लाया जाता है। उपचार के निम्नलिखित विकल्प सहायक साबित हो सकते हैं।

संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (सीबीटी): खाने की लत के षिकार लोगों को खाने के प्रति अपनी इच्छाओं को नियंत्रण करने के बारे में सीखना चाहिये। सीबीटी के थेरेपी के तहत रोज-मर्रे की चुनौतियों के प्रति समुचित व्यवहार संबंधी प्रतिक्रियाओं को पहचानने में मदद मिलती है। इसके तहत खाने की लत से ग्रस्त लोगों को वैसी नाकारात्मक सोच को नियंत्रण करने के बारे में प्रषिक्षित किया जाता है, जिससे कारण लोग भोजन पर टूट पड़ते हैं।

मनोचिकित्सा: अक्सर, खाने की लत के षिकार लोग कष्टकारक भावनाओं से उबरने के लिये अथवा अन्य जटिल भावनात्मक मसलों को टालने के लिये भोजन करने लगते हैं। इस थिरेपी से बहुत अधिक खाने की लत की जड़ में जाने तथा भावनाओं का समाधान साकारात्मक तरीके से करने में मदद मिलती है।

पोषाहार चिकित्सा: अनेक मामलों में, गंभीर कुपोषण के षिकार लोगों अथवा षरीर में रासायनिक असंतुलन वाले लोगों में भी खाने की लत की समस्या होती है। ऐसी खाने की इच्छा को पोषाहार चिकित्सा के जरिये या तो नियंत्रित किया जा सकता है या खत्म किया जा सकता है।

संवाद थिरेपी (टाॅक थिरेपी)
अक्सर खाने की लत के षिकार लोग अपराध बोध या अपने ष्षारीरिक आकार को लेकर निराषा आदि से भी ग्रस्त होते हैं। संवाद थिरेपी (टाॅक थिरेपी) के जरिये ऐसी भावनाओं अथवा अन्य भावनात्मक समस्याओं का समाधान करने में मदद मिलती है।

(नयी दिल्ली के कास्मोस इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) के निदेशक डा. सुनील मिततल के साथ बातचीत पर आधारित)