मानवी शरीर में असाधारण कोशिकाओं के तेजी से और आम तौर पर उनकी सीमाओं से ज्यादा बढ़ने से कैंसर होता है। कैंसर शरीर के दूसरे अंगों में फैलकर उन पर आक्रमण कर सकता है। अभी तक ज्यादातर मामलों में कैंसर को आनुवंशिक माना गया था, नए अनुसंधानों में पता चला है कि कैंसर के कारण काफी हद तक अस्वस्थ जीवनशैली और असंतुलित आहार में होते हैं। भारत में कैंसर केसेस बढ़ रही हैं, खास कर महिलाओं में कैंसर के कुछ प्रकार काफी आम तौर पर पाए जाते हैं।

स्तन कैंसर

भारत में महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले कैंसर्स में से एक है स्तन कैंसर। स्तन कोशिकाओं को संक्रमित करते हुए यह कैंसर स्तनों के लोब्यूल्स या नलिकाओं में तैयार होता है, साथ ही स्तन में किसी फैटी टिश्यू या कनेक्टीव टिश्यू में भी कैंसर बन सकता है। हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र की महिला को हो सकती है लेकिन 40 से ज्यादा उम्र की महिलाओं को इसका खतरा अधिक होता है। काफी सारी केसेस में अगर परिवार में पहले किसी को यह बीमारी हुई हो तो यह बीमारी होने की आशंका ज्यादा होती है। इलाज के अच्छे परिणामों के लिए बीमारी की जल्द से जल्द पहचान होना जरुरी है और उसके लिए नियमित रूप से जांच और मैमोग्राम टेस्ट्स करवाना आवश्यक है। जिनके परिवार में पहले किसी को यह बीमारी हुई है उन्हें रक्त की जांच करने से जीन में किसी प्रकार का उत्परिवर्तन है या नहीं यह जानने में मदद  मिल सकती है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने शरीर के बारे में सतर्क रहना। यहां तक कि भले ही हाल ही में किए गए  मैमोग्राम में सब कुछ सुरक्षित दिख रहा हो, अगर आपको लगता है कि कोई अजीब, असाधारण गांठ या दर्द है तो तुरंत अपनी जांच करवाए। साथ ही संतुलित आहार, हर दिन व्यायाम और शराब के सेवन को सीमित रखते हुए स्वस्थ जीवनशैली का होना बहुत जरुरी है।

सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा में होने वाला कैंसर)

भारत में महिलाओं में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है सर्वाइकल कैंसर, गर्भाशय के सबसे निचले हिस्से में सर्विक्स में कोशिकाओं में बदलाव की वजह से यह कैंसर होता है। यह गर्भाशय के गहरे टिश्यूज को प्रभावित करता है और फेफड़े, यकृत, मूत्राशय, योनि और मलाशय जैसे अन्य अंगों में फैल सकता है। सर्वाइकल कैंसर के कई कारण और खतरें होते हैं जिनमें ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) संक्रमण, कई अलग-अलग लोगों के साथ यौन संबंध, धूम्रपान, गर्भ नियंत्रक गोलियां लेना और कम उम्र में यौन संबंध करना आदि शामिल हैं। कई केसेस में एचपीवी संक्रमण यह कारण होता है और इसे वैक्सीन से रोका जा सकता है। यह कैंसर बहुत ही धीरे बढ़ता है इसलिए जल्द से जल्द पहचान होने पर इसका प्रभावी इलाज करने में मदद मिल सकती है। लक्षणों के बारे में जागरूकता, मेडिकल सलाह के अनुसार एचपीवी वैक्सीन लेना, नियमित रूप से पीएपी  टेस्ट्स और एसटीडीज् को रोकने के लिए सक्रीय उपायों से इस कैंसर को रोका जा सकता है और उसका जल्दी पता लगाया जा सकता है। साथ ही धूम्रपान और तंबाकू के सेवन से बचना भी लाभकारी है।  ज्यादातर मामलों में  बीमारी का पता काफी देर से लगने की वजह से मरीज को जान गवानी पड़ती है।

फेफड़ों का कैंसर

कैंसर के सबसे घातक प्रकारों में से एक है फेफड़ों का कैंसर, फेफड़ों में शुरू होकर यह कैंसर लिम्फ नोड्स और शरीर के मस्तिष्क जैसे अन्य अंगों में फ़ैल सकता है। फेफड़ों के कैंसर के लक्षणों में  असामान्य प्रकार की, तीन हफ़्तों तक लगातार आ रही खांसी, अलग प्रकार की खांसी, खांसी में खून निकलना, छाती में ऐसा संक्रमण जो ठीक नहीं हो रहा है, छाती में दर्द, कंधों में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, आवाज में बदलाव, वजन कम होना, भूक न लगाना आदि शामिल हैं।  फेफड़ों के कैंसर के लक्षण अक्सर अस्पष्ट होते हैं और अन्य बिमारियों के लक्षणों की तरह दिखते हैं, जिससे बीमारी का पता लगाने में देरी हो सकती है।  इसके कारण कई केसेस में बीमारी का पता लगाए जाने तक कैंसर शरीर के अन्य अंगों में फ़ैल चूका होता है। फेफड़ों के कैंसर के 90% केसेस में बीमारी का कारण धूम्रपान होता है।  धूम्रपान न करने वाले जिन लोगों को यह  बीमारी होती है उनमें आम तौर पर कम उम्र में बीमारी होती है और उनकी बीमारी तम्बाकू से संबंधित कैंसर से जैविक रूप से अलग होती है। ख़राब, अस्वच्छ, अस्वस्थ जीवन शैली भी इस बीमारी का कारण हो सकता है। फेफड़ों के कैंसर का पता लगाने के लिए एक्सरे, सिटी स्कैन जैसी इमेजिंग टेस्ट्स, स्पुटम साइटोलॉजी और टिश्यू बायोप्सी आदि टेस्ट्स किए जाते हैं।

कोलोरेक्टल कैंसर

कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत में (कोलन) शुरू होता है और पाचन तंत्र के निचले छोर पर स्थित होता है। हालांकि आम तौर पर यह बीमारी वयस्कों को प्रभावित करती है लेकिन किसी भी आयु के व्यक्ति को भी हो सकती है। आम तौर पर कोशिकाओं के छोटे, सौम्य गुच्छों के रूप में इसकी शुरूआत होती है जिन्हें पॉलीप्स कहा जाता है, यह कोलन के अंदर होते हैं, समय के साथ इनमें से कुछ पॉलीप्स कैंसर बन जाते हैं। यदि परिवार में पहले किसी को पेट के कैंसर की बीमारी हुई है या अगर आपकी उम्र 50 वर्ष से अधिक है तो कलोन की जांच से इस बीमारी का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

खतरे को कम करने के लिए आप क्या कर सकते हैं? खतरों के कारणों की रोकथाम, प्रतिबंध नीतियों को लागू करने से मदद मिल सकती है।  ज्यादातर मामलों में तंबाकू सेवन और अस्वस्थ जीवनशैली से शरीर पर कई बुरे असर पड़ते हैं और इसीसे कैंसर की जड़ें बनने लगती हैं।  स्वस्थ जीवन के लिए जागरूकतापूर्वक प्रयास, शराब के सेवन को सीमित रखना  और सबसे महत्वपूर्ण कि नियमित रूप से जांच करवाने से कैंसर का खतरा लक्षणीय मात्रा में कम हो सकता है।