इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जल-संक्रमण की वजह से हर साल भारत में करीब 9 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं। बच्चों के लिए ये बीमारियां कहीं अधिक जानलेवा ही हैं और इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से केवल एक बीमारी अतिसार से ही हर साल 5 साल से कम उम्र के 20 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। ये आंकड़े दुखद इसलिए भी हैं कि पेयजल संक्रमण के बारे में मामूली-सी जागृति पैदा कर इन मौतों को रोका नहीं, तो काफी कम जरुर किया जा सकता है।

तब प्रश्न यह उठता है कि जल संक्रमण से होने वाली प्रमुख बीमारियां कौन-सी हैं ? इनसे क्या नुकसान होता है? इन्हें रोका या इसका उपचार कैसे किया जा सकता है? प्रस्तुत है इस विषय पर उपयोगी जानकारी-

जल-संक्रमण का आशयः- दरअसल कोई भी पानी शत-प्रतिशत शुद्ध तो न कभी होता है और न ही उसे बचाया जा सकता हैं। मगर पेयजल में यदि हानिकारक विषाणु, जीवाणु (बैक्टीरिया) या अन्य पदार्थ मिले हों, तो वह स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक और संक्रमित माना जाता है। सुरक्षित पेयजल वह है जिसमें ई-कोलाई, कोलीफोर्म या अन्य हानिकारक संक्रमण न हो।

जल संक्रमित है या नहीं :- कल्चर परीक्षण से पानी में संक्रमण होने का पता लगाया जा सकता है। मगर यह काम व्यक्तिगत स्तर पर कर पाना संभव नहीं है, क्योंकि यह काफी मंहगा पड़ता है। हर 10-15 दिनों में पानी की एक बार जांच जरुरी है। यह काम पेयजल की आपूर्ति करने वाली संस्थाएं या निजी स्वयं सेवी संगठन कर सकते हैं। मगर यहां एक बात पर ध्यान देना जरुरी है। पेयजल को साफ करने के बाद भी सप्लाई लाइनों का रख-रखाव ठीक तरह से न होने या घर में स्टोरेज टैंक का ढक्कन खुला रहने पर वह पुनः संक्रमित हो सकता है।

बचाव के उपाय:- पेयजल-संक्रमण से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि घर में ही उसे विषाणु और जीवाणु मुक्त बनाया जाए। इसके लिए पहले तो उसे फिल्टर कर लेना चाहिए। बाजार में कई प्रकार के फिल्टर उपलब्ध हैं। अगर ये न उपलब्ध हों, तो छन्नापत्र या साफ कपड़े का उपयोग किया जा सकता है। इसके बाद पानी को 10 से 15 मिनट तक खौलाकर उबालना चाहिए। इस तरह का पानी 5-6 घंटे तक काम में लाया जा सकता है। पानी को साफ करने के लिए रासायनिक उपायों मसलन ब्लीचिंग पाउडर, हाई टेस्ट हाइपोक्लोराइड या एच. टी. एच., क्लोरीन टैबलट या आयोडीन आदि का उपयोग किया जा सकता है। पोटैशियम परमैंट या लाल पोटाश से भी पानी संक्रमण मुक्त हो सकता है।

जल-संक्रमण से बच्चों को होने वाली प्रमुख बीमारियां:-यों तो जल संक्रमण से कई प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं, मगर इनमें वाइरल हेपाटाइटिस पीलिया, पोलियो, टाइफाइड, हैजा, अतिसार, रोटा वायरस, डायरिया, अमीबायसिस, जियार डियासिस और कृमि प्रमुख हैं।

हेपाटाइटिस के लक्षणः- वाइरल हेपाटाइटिस बच्चों को होने वाली एक प्रमुख बीमारी है। इसे आम बोलचाल की भाषा में पीलिया, कामला रोग, पाण्डु रोग या जांडिस के नाम से भी पुकारा जाता है। वायरल हेपाटाइटिस दो प्रकार का होता है-हेपाटाइटिस ‘ए’ और हेपाटाइटिस ‘बी’। इसमें पानी से हेपाटाइटिस ‘ए’ होता है। हेपाटाइटिस ‘बी रक्त संक्रमण से होता है। 

हेपाटाइटिस ‘ए’ बीमारी संक्रमण से फैलने वाली बीमारी है। यह एंटेरो वायरस-72 (7) नामक विषाणु से होती है। इसमें लीवर में सूजन आ जाती है। रोगी की भूख गिरने लगती है। उसे बुखार आ सकता है या ठंड लगने, सिरदर्द, थकान, कमजोरी, दर्द आदि की शिकायत हो सकती है। रोग बढ़ जाता है, तो उसे वमन और सिर में चक्कर आने शुरु हो जाते हैं। आंखों और पेशाब का रंग पीला पड़ जाता है। इस बीमारी में मौत का खतरा कम हो जाता है। 

रोकथाम और उपचार:- एक बार हेपाटाइटिस ‘ए’ हो जाए, तो इसकी कोई दवा नहीं है। इसकी रोकथाम का कोई प्रभावी टीका अभी नहीं बना है। अलबत्ता हेपाटाइटिस ‘बी को वैक्सीन से रोका जा सकता है। इसकी तीन खुराके एक साल की उम्र के बाद चार से छह हफ्ते के अंतर पर दी जाती हैं। हर पांच साल बाद टीके फिर से लगवाने चाहिए। हेपाटाइटिस चार से छह सप्ताह में खुद ठीक हो जाता है। मगर रोगी को पूरा आराम देना और कार्बोहाइड्रेट युक्त और सुपाच्य भोजन देना जरुरी है। तली चीजें न दें, मगर चीनी अन्य चीजें खूब दें। बाहरी चीजें न खाने-पीने से इस बीमारी से बचा जा सकता है। 

पोलियो के लक्षण:- दूसरी बीमारी है पोलियो। यह भी एक प्रकार के वायरस से फैलता है, जो पानी में मौजूद होता है। इसका सर्वाधिक खतरा छह माह की उम्र से 3 वर्ष की उम्र तक होता है। पोलियो से बच्चा स्थाई रुप से विकलांग हो सकता है। यहां एक बात जान लेना जरुरी है। आमतौर पर लोग यही समझते हैं कि पोलियो हाथ-पैर में होता है मगर यह सच नहीं है। यह स्नायुतंत्र की बीमारी है और शरीर के किसी भी अंग में हो सकती है। यह हृदय और दिमाग, गले आदि में भी हो सकता है। पोलियो के असर से बच्चे को लकवा मार सकता है। वह बहरा, अंधा या गूंगा भी हो सकता है। 

पोलियो से बचावः- इससे बचाव के लिए ऑरल पोलियो वैक्सीन आता है। इसे जन्म के छह सप्ताह बाद शुरु किया जा सकता है और हर चार-छह हफ्ते पर इसकी एक खुराक दी जाती है। इसकी कम से कम तीन खुराकें और अधिकतम सात खुराकें देने से 98 प्रतिशत मामलों में पोलियो से बचा जा सकता है। एक बार हो जाए, तो आमतौर पर इसकी कोई औषधि नहीं होती। 

टाइफाइड के लक्षण:- यह वैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। इसके जीवाणु को एस टाई फाई वैक्टीरिया कहते हैं। पहले यह बीमारी 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नहीं होती थी। अब तो दो वर्ष से कम से ही इस बीमारी का खतरा रहता है। इसमें रोगी को तेज बुखार सहता है, परंतु मुश्किल यह है कि तेज बुखार अन्य कारणों से भी हो सकता है। इसलिए टाइफाइड की पहचान तीन से पांच दिन के पहले नहीं हो सकती। 

टाइफाइड से आंतों में सुजन आ जाती है। इस बीमारी से न्यूमोनिया अथवा दिल या दिमाग की कोई अन्य बीमारी भी हो सकती है। इसमें आंतों या दिमाग की नसें फट सकती है। 

टाइफाइड से बचावः- शत-प्रतिशत सुरक्षित तो कोई वैक्सीन नहीं, मगर टाइफाइड के टीके लगवाकर इसका खतरा 50-60 प्रतिशत कम किया जा सकता है। दो वर्ष की उम्र में बच्चे को टीका लगवाया जाता है। एक-एक माह के अंतर पर दो टीके लगवाए जाते हैं और हर दो तीन साल पर उसे दुहराया जाता है। 12 से 16 वर्ष की उम्र तक टीके लगवाते रहने चाहिए। बुखार तेज हो तो भी रोगी को ठंडे पानी से नहाना बंद नहीं करना चाहिए। उसे कंबल से ढके और खूब पानी पिलाएं।

हैजाः- हैजा बैक्टीरिया से होने वाली जानलेवा बीमारी है। दूषित खानपान से यह बीमारी होती और फैलती है। इसलिए फुटपाथ पर बिकने वाली चीजें, कटे फल, बासी भोजन, गन्ने का जूस, रेहड़ी का पानी आदि नहीं लेना चाहिए। पानी उबालकर और विसंक्रमित कर ही पीना चाहिए। इस बीमारी में जल्दी-जल्दी और बहुत पतले दस्त काफी मात्रा में होते हैं। दस्त का रंग मांड की तरह सफेद होता है। इस बीमारी में मौत निर्जलीकरण के कारण होती है। इसलिए रोगी का जल स्तर बनाए रखें। हर दस्त पर एक डेढ़ गिलास ओ. आर. एस. और काफी मात्रा में पानी दें। तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। 

इसलिए  गौर करें कि बच्चा सामान्य अवस्था में जितना पेशाब करता है, उतना पेशाब कर रहा है या नहीं। अगर पेशाब कम हो रहा हो रहा है या बच्चा सुस्त दिख रहा हो, तो उसे तुरंत ओ. आर. एस. दें और खूब पानी पिलाएं उसका खाना पानी बंद न करें रोकथाम के लिए नाखून, घर, पेयजल और भोजन की सफाई पर ज्यादा ध्यान दें। शौचालय की उचित व्यवस्था भी जरुरी है। ये थोड़ी सावधानियां बरत कर आप अपने लाडले को कई जानलेवा बीमारियों से बचा सकते हैं।