Short Funny Story: होली का नाम लेते ही स्मृतियों के आकाश में रंगों की इंद्रधनुषी छटा फैल जाती है। यह केवल अबीर-गुलाल का पर्व नहीं, बल्कि बचपन की चंचल हँसी, शरारती ठिठोली और निश्छल आनंद का जीवंत उत्सव है। मेरे लिए होली, जीवन की उस निश्छल अवस्था का प्रतीक है, जहाँ रंग केवल चेहरे नहीं, संबंधों को भी रँग देते थे।
होली के एक दिन पूर्व से ही हमारे मोहल्ले में उत्सव की आहट सुनाई देने लगती थी। बाल मन उत्साह से भर उठता। हम बच्चे मिलकर रंग घोलते, गुब्बारे भरते और पिचकारियों की क्षमता जाँचते। किसकी पिचकारी सबसे दूर तक जाएगी, किसका निशाना अचूक होगा-इन्हीं छोटी-छोटी बातों में हमारी दुनिया सिमटी रहती। वह प्रतिस्पर्धा नहीं, बालसुलभ उल्लास का उत्सव था।
प्रातःकाल होते-होते गली में स्वर गूँज उठते-“होली है!” और फिर आरंभ होता रंगों का उन्मुक्त उत्सव। कोई गुलाल लगता, कोई पीछे से रंग उड़ेल देता, तो कोई छत से गुब्बारे बरसाता।
थोड़ी ही देर में सभी चेहरे एक समान हो जाते। सच ही है, होली सामाजिक भेद मिटाकर समता का संदेश देती है।
इन्हीं रंगों के बीच एक घटना आज भी स्मृतियों में सजीव है। हमारे पड़ोसी सिन्हा अंकल, जो पुलिस विभाग में कार्यरत थे, अनुशासनप्रिय और गंभीर स्वभाव के कारण बच्चों के लिए थोड़े भय का कारण थे। होली की उस सुबह वे ड्यूटी पर जाने को तैयार हो रहे थे। मुझे ज्ञात था कि वे रंगों से दूर रहते हैं। बालमन ने इसे चुनौती मान लिया। और मैंने टोली तैयार कर ली।
जैसे ही वे अपनी सुसज्जित वर्दी में बाहर आए, हमने एक स्वर में पुकारा-“होली है!” और रंगों की बौछार कर दी। क्षणभर में उनकी खाकी वर्दी इंद्रधनुष बन गई। उनकी कड़क आवाज़ गूँजी- यह क्या किया? मुझे ड्यूटी पर जाना है।उस पल चंचलता सहम गई और मैं शर्म से लाल हो गयी। पहली बार अनुभव हुआ कि उल्लास की भी एक सीमा होती है। वर्दी केवल वस्त्र नहीं, कर्तव्य और सम्मान का प्रतीक है-यह सीख उसी दिन मिली।
कुछ क्षणों बाद उनका स्वर कोमल हुआ-बच्चों, त्योहार मनाओ, पर मर्यादा का ध्यान रखो। कर्तव्य सर्वोपरि होता है। उनकी बात ने बालमन पर अमिट छाप छोड़ दी। हमने क्षमा याचना की। वे मुस्कुराए शाम को आऊँगा, तब खेलेंगे।
संध्या को वे सचमुच साधारण वस्त्रों में लौटे। इस बार उन्होंने स्वयं हमारे चेहरे पर गुलाल लगाया। उस दिन होली ने हमें केवल आनंद नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान का पाठ भी पढ़ाया।
आज समय बदल गया है।
त्योहारों का स्वरूप भी आधुनिकता में कहीं सिमट-सा गया है। पर जब भी “होली है!” की पुकार सुनाई देती है, मन अनायास ही बचपन की उन्हीं गलियों में लौट जाता है।
होली का वह हुड़दंग सिखा गया कि जीवन में आनंद और प्रेम के साथ मर्यादा का रंग भी आवश्यक है। क्योंकि सच्चे रंग वही होते हैं, जो केवल तन को नहीं, मन को भी आलोकित कर दें।

