Close-up of an Indian person speaking with digital sound wave overlays, symbolizing voice frequency analysis and emotional state detection
Close-up of an Indian person speaking with digital sound wave overlays, symbolizing voice frequency analysis and emotional state detection

Overview: एम्स की स्टडी में सामने आए आवाज से जुड़े डिप्रेशन के संकेत

एम्स की रिसर्च के अनुसार, बोलने का अंदाज, आवाज की पिच और टोन डिप्रेशन के शुरुआती संकेत बता सकते हैं।

Speech Patterns and Mental Health: जब भी हम किसी से मिलते हैं तो सबसे पहले यही पूछते हैं कि कैसे हो। अमूमन हर कोई जवाब में यही कहता है कि ठीक हूं। लेकिन हर व्यक्ति अंदर से ठीक ही हो, यह जरूरी नहीं है। व्यक्ति के शब्द चाहे जो भी कहें, लेकिन उनकी आवाज से उनके भीतर क्या चल रहा है, यह आसानी से पहचाना जा सकता है। 

जी हां, सुनने में आपको शायद यह अजीब लगे, लेकिन यही सच है। हाल ही में एम्स मतलब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के रिसर्चर्स ने इस बात को पुख्ता किया है। इस स्टडी में यह पाया गया कि हमारे बोलने का अंदाज़, हमारी आवाज़ की पिच और टोन यह बता सकते हैं कि कहीं हम डिप्रेशन के शिकार तो नहीं बन रहे हैं। तो चलिए जानते हैं इसके बारे में –

Indian researcher analyzing voice patterns on a computer screen, representing AI-based mental health technology.
The frequency of the sound reveals the truth

अमूमन लोग दुनिया के सामने अपनी भावनाओं व सच्चाई को छिपाने के लिए झूठ बोलते हैं, लेकिन रिसर्च बताती है कि हमारी आवाज की फ्रीक्वेंसी सारी सच्चाई बयां कर देती है। एम्स की स्पीच हेल्थ लैब में की गई रिसर्च के अुनसार, डिप्रेशन न केवल हमारे मूड को प्रभावित करता है, बल्कि यह हमारी बोलने की क्षमता और लहजे में भी बदलाव लाता है।

धीमी रफ्तार, जिसमें व्यक्ति बातों में अटकता है या फिर शब्दों के बीच लंबा गैप लेने लगता है।

नीरस टोन, जिसमें आवाज़ में उतार-चढ़ाव नहीं होती। व्यक्ति की आवाज़ फ्लैट और बेजान लगने लगती है।

आवाज में एनर्जी की कमी महसूस होती है और ऐसा लगता है कि जैसे बोलने में बहुत ज्यादा थकावट महसूस हो रही हो।

शब्दों में खुशी, उत्साह या दुख के सही भावों का न मिल पाना भी एक संकेत है।

Young people are at greater risk
Young people are at greater risk

एम्स में की गई यह रिसर्च मुख्य रूप से 18 से 30 साल के युवाओं पर आधारित थी। इस रिसर्च के आंकड़े यह जाहिर करते हैं कि आज के दौर में कॉलेज जाने वाले छात्र सबसे ज्यादा तनाव और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। स्टडी के अनुसार, लगभग 33.6 प्रतिशत छात्रों में मीडियम से गंभीर डिप्रेशन पाया गया। यहां तक कि करीबन 18.8 प्रतिशत छात्रों ने जीवन में कभी न कभी सुसाइडल थॉट्स की बात स्वीकार की।

एम्स का स्पीच एनालिसिस टूल लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह टूल 60 से 75 प्रतिशत तक सटीक नतीजे देता है। अगर आवाज का नमूना लंबा हो तो यह सटीकता 78 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इस तरह, इस टूल की मदद से अब बिना किसी भारी-भरकम टेस्ट के, सिर्फ बातचीत के जरिए डिप्रेशन की शुरुआती जांच की जा सकेगी। यह तकनीक आने वाले समय में उन क्षेत्रों के लिए वरदान साबित होगी, जहां मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है।

याद रखें कि आज के समय में लाइफस्टाइल में बदलाव और बढ़ते कॉम्पिटिशन के बीच हम अक्सर अपने मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन एम्स की यह रिसर्च बताती है कि जल्द पहचान ही इलाज है। अगर आवाज में बदलाव को समय रहते पहचान लिया जाए, तो डिप्रेशन को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

मैं मिताली जैन, स्वतंत्र लेखिका हूं और मुझे 16 वर्षों से लेखन में सक्रिय हूं। मुझे डिजिटल मीडिया में 9 साल से अधिक का एक्सपीरियंस है। मैं हेल्थ,फिटनेस, ब्यूटी स्किन केयर, किचन, लाइफस्टाइल आदि विषयों पर लिखती हूं। मेरे लेख कई प्रतिष्ठित...