Hindi Short Story: भीड़ भरी दिल्ली मेट्रो की उस शाम, सब कुछ रोज़ जैसा था—हर चेहरा व्यस्त, हर नज़र गुम, और हर दिल अपनी उलझनों में डूबा हुआ। लेकिन उस दिन… कुछ अलग था। शायद हवा में कोई पुरानी रूमानियत थी, या फिर समय ने कुछ देर को थमने की ज़िद कर ली थी।
वो लड़की—सफेद दुपट्टा, बैग, और आंखों में कुछ ऐसा ठहरा हुआ सूनापन जैसे बरसों से किसी को ढूंढ रही हो। उसका नाम इरा था। रोज़ की तरह ऑफिस से घर लौट रही थी।
तभी, अगला स्टेशन आया—राजीव चौक। भीड़ और तेज़ हो गई। और उसी भीड़ में, एक चेहरा जैसे वक्त के किसी पुराने पन्ने से उतर आया हो।
विनीत…वही मुस्कान, वही शांत चेहरा और आंखों में वही ठहरा हुआ अपनापन..
छह साल पहले… लखनऊ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में शुरू हुई उनकी कहानी, किसी पुराने खत की तरह अधूरी रह गई थी। दोनों ने अपने-अपने सपनों की राह चुनी थी—वक़्त को जिम्मेदार ठहराकर।
“इरा?”
“विनीत?”
एक पल को भीड़ जैसे ठहर गई। मेट्रो की खड़खड़ाहट पिघल गई। और दो दिलों के बीच एक पुरानी धड़कन फिर से ज़िंदा हो गई।
“कैसी हो?”
“ठीक… और तुम?”
“तुम्हें देखकर लगा… शायद सब कुछ वैसा का वैसा है।”
“पर सब कुछ वैसा नहीं रहा, विनीत… सिर्फ यादें वैसी रह गई हैं।”
दोनों कुछ देर तक एक ही पोल को पकड़कर खड़े रहे—बगल में, लेकिन सालों की दूरी के साथ। फिर अचानक इरा ने पूछा, “अब कहां हो? क्या करते हो?”
“यहीं, दिल्ली में। आर्ट गैलरी में क्यूरेटर हूं। और तुम?”
“यहीं… एक NGO में काम करती हूं। और… अभी भी कविता लिखती हूं।”
विनीत की आंखों में चमक लौट आई। “तुम्हारी कविताएं अब भी मेरे पास हैं… ईमेल में… जैसे तुमने कहा था—‘कुछ शब्द कभी नहीं मिटते।’”

इरा की आंखें नम हो गईं। वो स्टेशन आ गया जहां उसे उतरना था।
“मुझे उतरना है,” उसने कहा।
“एक सवाल पूछूं?” विनीत ने धीमे से कहा।
“पूछो।”
“अगर मेट्रो की तरह ज़िंदगी भी एक और चांस देती… क्या तुम फिर से साथ चलना चाहोगी?”
इरा ने अपनी गुलाबी डायरी दी और मुस्कराई—एक ऐसी मुस्कान जिसमें अधूरेपन की ख़ूबसूरती थी, और एक पुराने प्रेम की स्वीकृति।
वो उतर गई। दरवाज़े बंद हो गए। विनीत ने इरा, की दी हुई डायरी का, पहला पन्ना खुला तो उसमें लिखा था.. मेरे शब्द अब भी तुम्हारा नाम लेते हैं..

मेट्रो फिर चल पड़ी। और साथ ही… एक कहानी फिर से सांस लेने लगी—दिल्ली की उस भीड़ में, जहां हर दिन कोई ‘इरा’ किसी ‘विनीत’ से टकरा जाती है… और फिर कुछ अधूरी मुस्कानें मेट्रो की रफ्तार में पीछे छूट जाती है या कुछ , मुसाफिरों को, उनकी मंजिल तक पहुंचा देती है।
