main sir nahin jhukaoonga
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Hindi Immortal Story: “बेटा, ये अंग्रेज किसी भी तरह भरोसे के काबिल नहीं हैं। मेरे सामने तो इनका बस चल नहीं पाया क्योंकि मैं इनके छल-कपट और तौर-तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ हूँ। पर इन्होंने अपनी चालबाजी छोड़ी नहीं है। इनकी योजना जैसे भी हो, यहाँ अपनी सत्ता कायम करना है। तुम इनकी बातों में मत आना और इन पर कतई भरोसा मत करना। इन्हें यहाँ किसी भी सूरत में किले बनाने और पैर टिकाने की इजाजत मत देना। मैं अगर कुछ और जीता, तो तुम्हारा रास्ता बिल्कुल निष्कंटक बना देता। पर अब मेरे बाद तुम्हें शासन सँभालना है, इसलिए खूब होशियार रहना। अल्लाह, तुम्हारी मदद करेगा।”

ये थे वे आखिरी शब्द जो नाना नवाब अलीवर्दी खाँ ने सिराज से कहे थे। उनके बाद उनका नाती सिराजुद्दौला ही राजगद्दी सँभालने वाला था। और वे जाने से पहले उसे खूब अच्छी तरह सावधान कर देना चाहते थे। अपने आखिरी शब्दों में उन्होंने जो कुछ कहा, उसमें उनकी जिंदगी का पूरा निचोड़ था।

और युवक सिराजुद्दौला ने अपने शेर सरीखे बहादुर नाना की बातों को गाँठ में बाँध लिया था। वह चाहता था कि जिस तरह अलीवर्दी खाँ के समय में बंगाल एक बड़ी ताकत बन चुका था और किसी की उस ओर आँख उठाने की हिम्मत नहीं होती थी, उसी तरह बंगाल का नाम ऊँचा रहे। बल्कि वह और भी शक्तिशाली और अजेय बने।

और सचमुच अलीवर्दी खाँ की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला ने इतनी होशियारी और पराक्रम से राजगद्दी सँभाली कि अंग्रेज हक्के-बक्के रह गए। वे सोचते थे कि सिराज नया और अनुभवहीन है, इसलिए उसे आसानी से अपनी चालों में फँसाया जा सकता है। उन्होंने जब देखा कि सिराजुद्दौला किसी भी तरह उनकी चालों में फँसने वाला नहीं है, तो उसे यहाँ-वहाँ से घेरने और परेशान करने की कोशिशें शुरू कर दीं। उन्होंने उसे तरह-तरह से परेशान करना शुरू किया। पर बहादुर सिराजुद्दौला ने उनकी हर चाल को काट दिया। अंग्रेजों से जहाँ-जहाँ मुठभेड़ें हुईं, सिराजुद्दौला ने उन्हें ऐसा छकाया कि वे आतंकित हो गए। सोचने लगे कि यह बहादुर युवक तो पूरी तरह अपने पैर जमाता जा रहा है। इसके होते हम कभी अपनी चालों में कामयाब नहीं हो सकते। यहाँ तक कि उन्होंने जिस कपटनीति से उसे घेरने और फँसाने की कोशिश की, सिराज को उसकी असलियत पता चल गई और उसने उनकी बातों को मानने से इनकार कर दिया।

अब अंग्रेज समझ गए कि यहाँ उनकी दाल नहीं गल सकती। किसी और तरह से सिराजुद्दौला को खत्म करना होगा। आखिर उन्होंने उस समय के बड़े सेठ अमीचंद को अपने साथ मिला लिया और उसे गद्दारी के लिए उकसाया। सेठ अमीचंद के पास बहुत धन था और रसूख भी। अंग्रेजों ने उसे सिराजुद्दौला के खिलाफ साथ देने के बदले बहुत से प्रलोभन दिए। अमीचंद उनकी बातों में आ गया तो अंग्रेजों की बाँछें खिल गईं। उन्होंने सिराजुद्दौला को घेरने के लिए व्यूह-रचना शुरू कर दी। और फिर प्लासी का विकट युद्ध हुआ, जिसकी करुण कहानी भारतीय इतिहास के पन्नों से कभी मिटाई नहीं जा सकती।

इसलिए कि भारत के इतिहास में प्लासी के युद्ध को अंग्रेजों के भारत-विजय अभियान का पहला महत्त्वपूर्ण चरण माना जाता है। उस समय सिराजुद्दौला का प्रधान सेनापति था मीरजाफर, जो सिराजुद्दौला का करीबी रिश्तेदार भी था। पर अंग्रेजों ने उसे लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया। यह एक ऐसी घटना थी, जिसे भारतीय इतिहास में बड़ी शर्म और लज्जा के साथ याद किया जाता है। पर सिराजुद्दौला ने इसके बावजूद जिस हिम्मत से अंग्रेजों का सामना किया और फिर अपना बलिदान दिया, वह खुद भी सच्ची वीरता की एक मिसाल है।

मुर्शिदाबाद से 20 मील दूर प्लासी के मैदान में, जहाँ चारों ओर पलाश के वन थे, सिराजुद्दौला और अंग्रेजी सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। इसे प्लासी वन इसलिए कहा जाता है कि यहाँ दूर-दूर तक पलाश के घने पेड़ों का जंगल था। पलाश यानी टेसू के लाल-लाल फूल, इस बात के गवाह थे कि अपनों की ही गद्दारी के बावजूद सच्चे वीर सिराजुद्दौला ने कैसे साबित किया कि भारत के वीर अपनी बहादुरी और बलिदान में किसी से पीछे नहीं हैं।

इस युद्ध में सिराजुद्दौला का पलड़ा भारी था और अंग्रेज किसी भी तरह उसके सामने टिक नहीं सकते थे। पर मीर जाफर के लालच ने खेल बिगाड़ दिया। लड़ाई के दौरान सिराजुद्दौला को खबर मिली कि मीरजाफर के इरादे कुछ ठीक नहीं लगते। इस पर उसने मीरजाफर को बुलाकर अपनी पगड़ी पैरों पर रख दी। कहा, “इस पगड़ी की लाज अब आपको ही रखनी है। आप चाहें तो इसे ठोकर मारें और चाहें तो बचा लें। मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूँ और आपको अपना दाहिना हाथ समझता हूँ। इस समय आप पर ही सबकी निगाहें हैं।

हमारा मुल्क खतरे में है। अंग्रेज चालाकी से इसे हड़पना चाहते हैं। अगर अभी इनके दाँत खट्टे नहीं किए, तो आगे इनके लिए रास्ता खुल जाएगा। और मेरा नहीं तो आप मेरे नाना नवाब अलीवर्दी खाँ का तो जरूर खयाल करें, जो आप पर इतना भरोसा करते थे।”

इस पर मीरजाफर ने कहा, “आपको शायद किसी ने गलत खबर दे दी है। मैं भला अपने मुल्क के साथ गद्दारी क्यों करूँगा? नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता। आप मेरा यकीन करें और बिल्कुल बेफिक्र रहें। मैं कसम खाता हूँ कि आपके साथ कभी गद्दारी नहीं करूँगा।”

यों मीरजाफर ने स्वामिभक्ति की कसम खाई और बड़े आदर से सिर झुकाकर चला गया। पर वह तो कभी का बिक चुका था। बिके हुए आदमी का क्या वचन और क्या दीन-इमान? उसने जाकर अंग्रेजों को सब कुछ बता दिया। इससे अंग्रेजी सेना की हिम्मत और बढ़ गई। सिराजुद्दौला घिर गया, पर फिर भी वीरता से लड़ता रहा। उसकी बहादुरी को देखकर अंग्रेज भौचक्के थे। उन्होंने भारत के सच्चे सपूत का साहस देख लिया था, जो किसी भी मुसीबत से नहीं घबराता।

पर आखिर सिराजुद्दौला को रणभूमि से जान बचाकर भागना पड़ा। उसने सोचा कि फिर से अपनी शक्ति बढ़ाकर अंग्रेजों को टक्कर दी जा सकती है।

जगह-जगह उसने सहायता के लिए लोगों रके दिल को टटोला। पर विपत्ति के समय सबने आँखें फेर लीं। सिराजुद्दौला छिपकर जान बचता हुआ यहाँ से वहाँ भाग रहा था। पर मीरजाफर की गद्दारी ने अंग्रेजों को इतना तारकवर बना दिया था कि उसका छिपकर रह पाना भी मुश्किल था। सिर पर हमेशा संकट की तलवार लटकती रहती।

मीरजाफर को सिराजुद्दौला की जगह नवाब बनाया गया। पर वह इतना डरा हुआ था कि जब क्लाइव ने उसे नवाब कहकर पुकारा और गद्दी पर बैठाना चाहा, तो उसके पैर काँप रहे थे और डरते हुए पीछे हट गया।

देश के वीर सपूत सिराजुद्दौला को आखिर अंग्रेजों ने पकड़वा ही लिया। जिस समय उसका वध किया जा रहा था, उस समय भी उस निर्भीक योद्धा की आँखों में देशभक्ति और सच्चे स्वाभिमान की आग थी। जो मानो कह रही थी, सिराजुद्दौला जैसे वीर मरते हैं पर मरकर भी अमर रहते हैं। और मीरजाफर जैसे गद्दार जिंदा रहकर भी मरे हुए से बदतर होते हैं, जिन्हें लोग हमेशा वीरता के इतिहास में एक बदनुमा कलंक के रूप में याद करते हैं।

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)