पुदीना दीदी ने आखिर अपनी संगीतशाला शुरू कर ही दी। और देखते ही देखते पूरे सब्जीपुर में उसकी चर्चा होने लगी।
शुरू में लोग कहते थे कि क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरबा? यानी पुदीना दीदी की यह संगीतशाला चलेगी नहीं।
किसी-किसी का तो यह भी कहना था कि “पुदीना दीदी ही कौन ऐसी संगीतकार हैं? पहले खुद तो अच्छी तरह संगीत सीख लें, फिर शुरू करें संगीत पाठशाला।”
पर पुदीना दीदी थीं धुन की पक्की। गहरे हरे रंग की साड़ी पहन, बालों में क्लिप लगाए, वे रोज सुबह अपनी संगीतशाला में पहुँच जातीं और फिर शुरू हो जाता उनका कार्यक्रम। हवाओं में दूर-दूर तक सितार, बाँसुरी और जलतरंग का संगीत गूँजने लगता और आसपास का पूरा वातावरण संगीतमय हो जाता। रास्ता चलते लोगों के पैर ठिठक जाते और बहुत से तो भीतर आकर पुदीना दीदी को तल्लीन होकर गाते देखते और आनंद से भर जाते।
जिस-जिस ने भी पुदीना दीदी को इतने मन से छोटे बच्चों और बड़ों सभी को प्यार से सा-रे-गा-मा- सिखाते देखा, उसे लगने लगा कि नहीं-नहीं, पुदीना दीदी का स्कूल बंद नहीं हो सकता। इसलिए कि पुदीना दीदी आखिर तय कर चुकी हैं कि चाहे जो हो, वे पूरे सब्जीपुर को संगीत के भीने-भीने शीतल रस से भर देंगी।
पुदीना दीदी की पहले सिर्फ एक ही शिष्या थी, निक्की हरी मिर्च। पर वे उसे इतने प्यार और इतनी लगन से सिखातीं कि लोग हैरान होकर कहते, “पुदीना दीदी का जवाब नहीं। पर क्या सिर्फ एक विद्यार्थी से चलेगी संगीत की पाठशाला? यह तो कुछ मामला ही अजब है।”
और कुछ लोग तो इसी बात पर हँसते कि भला पुदीना दीदी को शिष्या मिली भी तो कैसी? निक्की हरी मिर्च!
धनिया देवी मजाक उड़ाने वालों में सबसे आगे थीं, क्योंकि उन्हें तो लगता था कि संगीत में सिर्फ उन्हीं का दखल है। उन्हें लगता, पुदीना दीदी ने आकर बेकार गड़बड़ कर दी। वरना वह तो न तीन में न तेरह में।
“मैं हूँ तो फिर किसी और की जरूरत क्या है?” धनिया देवी कहतीं, “सच तो यह है कि सब्जीपुर को पुदीना की इस मनहूस संगीत पाठशाला की कतई जरूरत नहीं है।”
“वाह, है क्यों नहीं?” कोई-कोई पुदीना दीदी का पक्ष लेकर कह उठता, “आखिर हर किसी के संगीत का अलग असर होता है, अलग जादू…? कुदरत ने सभी को यह अनमोल चीज बख्शी है, किसी एक को नहीं।”
“हाँ-हाँ।” निक्की हरी मिर्च कहती, “भई, बात तो एकदम ठीक है।”
“तो…तू भी हो गई न पुदीना दीदी की चमची, सिर्फ दो दिन में?” धनिया देवी तीखा व्यंग्य करतीं। तीर सँभालकर चोट।
सब हँसते। पर हरी मिर्च पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था। वह जानती थी कि पुदीना दीदी बच्चों और बड़ों को संगीत सिखाने के लिए कितनी मेहनत करती हैं।
वे कहा भी तो करती हैं, “संगीत की साधना में भले ही प्राण चले जाएँ, पर मैं अपने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ूँगी।”
खुद निक्की हरी मिर्च ने यह अनुभव किया था कि पुदीना दीदी की बातों से मन को ठंडक मिलती है। खुद वह भी तो बड़ी तीखी और गुस्सैल थी। पर पुदीना दीदी के साथ रहने से उसके स्वभाव में भी काफी बदलाव आया था। इसीलिए तो वह आनंदमग्न होकर कहती है, “सचमुच संगीत हमारे दिलों को बदल देता है। मैंने पुदीना दीदी के साथ रहकर देखा है कि संगीत सचमुच इस धरती पर अमृत है, जो सभी को सुख और आनंद देता है। मैं भी सोच रही हूँ, कैसे लोगों के दिल जलाने की बजाय उन्हें आनंदित करूँ?”
थोड़े समय में ही निक्की हरी मिर्च की देखा-देखी और भी बहुत से लोग पुदीना दीदी की पाठशाला में संगीत सीखने आने लगे।
और एक दिन तो पालकी पर सवार हो, खुद गाजरदेवी चली आईं। आते ही पुदीना दीदी को बाँहों में भर लिया। फिर बोलीं, “तू तो मेरी बेटी के बराबर है पुदीना। पर मैं तुझसे जलतरंग सीखने आई हूँ, तो मैं हूँ शिष्या और तू मेरी गुरु है। जो भी आदेश देगी, मैं मानूँगी। और डाँटेगी, फटकारेगी, तो डाँट भी खा लूँगी। पर मैं तुझसे जलतरंग तो जरूर सीखकर रहूँगी।”
जिस समय गाजरी साड़ी में लिपटी गाजरदेवी यह बात कह रही थीं, पुदीना दीदी की आँखों में आँसू झलमल-झलमल कर रहे थे। बोलीं, “चाची, आज यहाँ आकर आपने मुझे जो आशीर्वाद दिया है, मैं कभी भूलूँगी नहीं। आप बड़ी हैं, आप ही बड़ी रहेंगी। फिर मेरे लिए तो यह एक परीक्षा है कि मैं आपको जलतरंग सिखाने में सफल हो पाती हूँ कि नहीं? और जहाँ तक डाँटने-फटकारने का सवाल है, संगीत में भला उसका क्या काम? यह तो मुझे आपने ही सिखाया है। खुद मेरे गुरु आचार्य श्री करमकल्लाराम ने मुझे इतना हँस-हँसकर और प्यार से संगीत सिखाया है कि मैं समझ गई कि यह तो धरती पर स्वर्ग की विद्या है। इसे बहुत नाजुकी से सीखना और सिखाना चाहिए।”
गाजरदेवी पुदीना दीदी की बातों से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने आगे बढ़कर उसके माथे को चूम लिया। बोलीं, “तेरी मैंने बहुत बड़ाई सुनी थी पुदीना। पर तूने तो साबित कर दिया कि जितनी तेरी लोग प्रशंसा करते हैं, तू उनसे दस गुनी ज्यादा अच्छी है।”
निक्की हरी मिर्च यह देख रही थी और जीवन में पहली बार उसकी आँखों से आँसू बरसे थे। वह सोचने लगी, ‘यह क्या चमत्कार है? मेरी वजह से लोगों की आँखों में आँसू निकला करते हैं, पर पहली बार खुद मेरी आँखें गीली हो आईं। यह संगीत है ही ऐसी अलौकिक चीज कि मन की सारी बंद खिड़कियाँ-दरवाजे खोल देता है…!’
और गाजरदेवी एकदम मंत्रमुग्ध। जैसे किसी फ्रेम में जड़ दी गई हों। यों भी किसी सजी-सँवरी और प्यारी फिल्मी अभिनेत्री की तरह लग रही थीं गाजर देवी। उसकी हर बात में एक राजसी शान थी। उनके समय में गाजरपुर की जो धाक थी, उसे भला कोई कैसे भूल सकता है? सब्जीपुर के इतिहास में वह समय सोने के अक्षरों में खुदा है।
और महाराजा गाजरदेव तो इतने बलवान और खुशमिजाज थे कि उनके राज्य में हर कोई खुश था। खुद जनता ने उन्हें बलवर्धन पदवी दी थी। और जब हजारों लोग मिलकर बलवर्धन महाराज गाजरदेव की जय का नारा लगाते थे, तो आकाश गूँज उठता था।
उसके बाद और भी लोग आते गए पुदीना दीदी की संगीतशाला में। और यों सिलसिला चल निकला।
यहाँ तक कि एक दिन तो टहलते-टहलते महामंत्री आलूराम भी आ गए पुदीना दीदी की संगीतशाला में। देखकर पुदीना दीदी चकराईं, “ऐं आलू जी, आप…?” उन्हें जैसे यकीन नहीं हो रहा था।
“हाँ, सोचा कि देखूँ तो पुदीना ने कौन सा जादू जगाया है अपनी इस अनोखी पाठशाला में कि जिसे देखो, वही तारीफ कर रहा है। भई, बड़ी दूर-दूर तक चर्चा है तुम्हारी संगीत पाठशाला की और कुछ लोग तो कहने लगे हैं कि पुदीना दीदी ने संकल्प लिया है कि वे सब्जीपुर की गली-गली और हवाओं को मधुर संगीत से भर देंगी।”
“आपने ठीक सुना है आलू जी, और ऐसा होगा, जल्दी होगा। भला जब इतने प्यारे-प्यारे शिष्य मिल जाएँ, जैसे मुझे आजकल मिल रहे हैं, तो फिजा तो बदलेगी ही। आप देखिएगा कि सब्जीपुर में भी जल्दी ही नई बहार आएगी। हँसी-खुशी और आनंद की बहार!”
पुदीना दीदी आनंदमग्न होकर कह रही थीं तो उनकी दोनों आँखों में मानो खुशियों के दीये जल रहे थे।
महामंत्री आलूराम इससे प्रभावित हुए बिना न रहे और वचन देकर गए कि वे जल्दी ही महाराज बैंगनदेव को भी यहाँ लाएँगे, ताकि वे भी खुद अपनी आँखों से देख लें कि अकेली पुदीना दीदी कैसे सब्जीपुर में स्वर्ग की खुशियाँ उतारने की तैयारी कर रही हैं।
आलूराम के आने से मंत्री से लेकर संतरी तक हर कोई पुदीना दीदी का मुरीद। फिर तो तेजी से चल पड़ी पुदीना दीदी की पाठशाला।
किसी-किसी ने आकर कहा, “अरे पुदीना दीदी, हम तो समझते थे कि खाली लड़कियों के लिए ही है आपकी यह पाठशाला। वरना हम तो कब के आ जाते।”
“चलो, देर आयद दुरुस्त आयद।” पुदीना दीदी हँसकर कहतीं। फिर समझातीं, “देखो भाई, संगीत तो कुदरत का अनोखा वरदान है। लड़के-लड़की का फर्क यहाँ नहीं है। सच्ची पूछो तो संगीत ईश्वर की इबादत है। इसीलिए तो धरती और प्रकृति के रोएँ-रोएँ से संगीत फूटता है।”
उसके बाद तो पुदीना दीदी ने सब्जीपुर के सभी लोगों के लिए संगीत के एक ग्रैंड कार्यक्रम की योजना बनानी शुरू कर दी। एक ऐसा कार्यक्रम, जिसमें भाषण नहीं, बस शुरू से अंत तक संगीत और नृत्य का ही आनंद बिखरा हो। इसके लिए पूरे सब्जीपुर को न्योता दिया जाना था।
इधर बहुत छोटे-छोटे बच्चे भी पुदीना दीदी के पास कथक सीखने के लिए आने लगे थे। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि इस कार्यक्रम में छोटे बच्चों को ही सबसे ज्यादा महत्त्व देना है, ताकि लोग समझ जाएँ कि संगीत तो कुदरत का सहज वरदान है, किसी की बपौती नहीं।
नन्हे-मुन्नों को संगीत और नृत्य सीखते देख, उनके मम्मी-पापा की आँखों मे खुशी झलमल करने लगती।
सचमुच पुदीना दीदी की संगीत पाठशाला का रंग जमने लगा था।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
