dukh ka karan
dukh ka karan

एक राजा के पास एक बेशकीमती हीरा था। वह उस हीरे को अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखता था। कई बार तो उसकी चिंता में उसे रातों को नींद तक नहीं आती थी। वह बूढ़ा हो चला था और अब उसे यह फिक्र सताने लगी थी कि उसके जाने के बाद हीरे की देखभाल कौन करेगा।

एक दिन किसी शातिर चोर ने उसका हीरा चुरा लिया और उसे लेकर अपने घर आ गया। घर आकर जब उसने हीरे को निकालकर हथेली पर रखा और उसे देखकर खुश हो रहा था कि तभी उसमें राजा का अक्स उभर आया, जो उससे बात कर रहा था।

उसने सुना राजा क्या कह रहा था। राजा ने पहले तो उसको धन्यवाद दिया कि उसने हीरा चुराकर राजा को चिंता से मुक्त कर दिया, क्योंकि हीरे की चिंता में वह जीवन की अन्य खुशियों का आनंद ही नहीं ले पा रहा था। अब यह बोझ तुम पर आ पड़ा है। यह इतना कीमती है कि तुम इसे किसी को बेच नहीं पाओगे और इतना शाही है कि तुम इसे पहनकर निकले तो कोई भी पहचान लेगा कि तुमने इसे कहीं से चुराया होगा। मेरी तरह तुम्हारा जीवन भी अब इसकी गुलामी में बीतेगा। इतना कहकर राजा का अक्स गायब हो गया।

सारः जरूरी नहीं कि बेशकीमती चीजें उपयोगी भी हों।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)