Neet Exam News: देश में आयोजित हुई नीट यूजी की परीक्षा ने इस बार देशभर में तहलका मचा रखा है। इस साल टॉपर छात्रों की इतनी संख्या है कि इसने न सिर्फ परीक्षा की सुचिता पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी पर भी सवाल खड़े हुए हैं। इसमें टॉपर्स की संख्या 67 होना, एक ही सेंटर के अधिकतम टॉपर्स का होना, साथ ही साथ ग्रेस मार्क्स को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। ऐसे में देशभर में छात्र-छात्राओं ने प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। साथ ही साथ इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी लेकर गए हैं, जिसमें परिणाम वापस लेने के साथ ही कई मांगें की गई हैं।
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नीट यूजी को लेकर क्यों चल रहा है बवाल
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने नीट यूजी की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के बाद से अब आने वाले परिणामों को लेकर विरोध शुरू हो गया है। इस साल लगभग 13 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने नीट यूजी की परीक्षा पास की है। परिणाम को लेकर बवाल तब बढ़ा जब पास उम्मीदवारों में से 67 उम्मीदवारों ने नंबर वन रैंक हासिल कर ली। सवाल ये उठने लगे कि आखिर इतनी संख्या में रैंक वन पर इतने छात्रों ने कैसे जगह बना ली। परिणामों पर सवाल उठने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कुछ छात्रों ने 720 अंक के पेपर में से 718-719 अंक हासिल किया है। ऐसे में 67 छात्रों ने टॉप किया है। विषय विश्लेषकों का कहना है कि इस परीक्षा में हर प्रश्न पर 4 अंक मिलते हैं। अगर छात्र ने सही जवाब दिया है तो 4 अंक मिलेंगे और गलत जवाब दिया है तो एक अंक निगेटिव माॄकग होती है। अगर कोई सभी सवाल हल करता है तो उसे 716 अंक मिलते हैं और अगर एक सवाल का गलत जवाब देता है तो 715 अंक मिलते हैं। ऐसे में सवाल यही है कि छात्रों को 718-719 अंक कैसे मिल गए हैं। नीट यूजी के परिणामों पर सवाल उठाते हुए ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। इसमें विसंगतियों को लेकर परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी के साथ ही सरकार पर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं। कोर्ट में नीट यूजी 2024 के परिणाम वापस लेने के साथ ही नई परीक्षा आयोजित करने की मांग की गई है।
पूरे नंबर के बाद भी एम्स में सीट के लिए मारामारी
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दाखिला पाना आसान नहीं होता है। इसके लिए छात्रों को बेहतर रैंक लाना होता है। अधिकतर नीट परीक्षा में टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्रों को ही इसमें एडमिशन मिलता है या कहें कि अगर आपके नंबर 700 से अधिक हैं तो आपको एडमिशन मिल सकता है। मगर इस बार एम्स में सीट के लिए मारामारी की स्थिति बनती हुई दिख रही है। इस साल हाई स्कोर हासिल करने वाले छात्रों की संख्या पिछली बार से कहीं अधिक है। 67 छात्र तो रैंक वन होल्डर हैं। ऐसे में यह भी निर्भर करता है कि छात्रों ने हाई स्कोर तो पा लिया है, लेकिन कॉलेज में उतनी संख्या में सीट का होना भी जरूरी है। कट ऑफ के अनुसार अगर कॉलेजों के पास सीट हुई तो छात्रों को सीट मिल सकती है।
नीट परीक्षा में टॉप-10 में एक भी छात्रा नहीं
इस बार नीट यूजी 2024 की परीक्षा 23,33,297 उम्मीदवारों ने दी थी, जिसमें 13,16,268 छात्र-छात्राओं ने सफलता हासिल की है। इस बार की परीक्षा में 67 अभ्यर्थियों ने पहली रैंक हासिल की है। पहली रैंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों ने 99.997 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं। टॉप रैंक हासिल करने वाले कुल 67 अभ्यर्थियों में से 20 लड़कियां हैं। मगर नीट यूजी टॉप 10 लिस्ट में इनमें से किसी का भी नाम नहीं है यानी इस लिस्ट में एक भी लड़की ने टॉप नहीं किया है। अगर टॉप 20 की बात करें तो इसमें भी सिर्फ 3 लड़कियों का नाम है।
बच्चों को डॉक्टर क्यों बनाना चाहते हैं माता-पिता
समाज के बदलते परिवेश को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आजकल के पैरेंट्स अपने बच्चों पर अपने सपने थोप देते हैं। बच्चा आगे चलकर इंजीनियरिंग करेगा या फिर डॉक्टरी की पढ़ाई करेगा। अधिकतर फैसला माता-पिता का होता है। हालांकि कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं कि वे अपने मन से ऐसे विषयों का चुनाव करते हैं और मेहनत करते रहते हैं। मगर वे बच्चे जिनकी इच्छा इस विषय की पढ़ाई करने की नहीं होती है वे इसमें जल्दी हार मान जाते हैं।
अब सवाल ये आता है कि माता-पिता आखिर अपने बच्चों को डॉक्टर क्यों बनाना चाहते हैं? इसमें भी सामाजिक तनाव देखने को मिलता है या फिर उनके खुद के सपने होते हैं। जब माता-पिता स्वयं इस पेशे से जुड़े होते हैं तो उनकी कोशिश होती है कि उनका बच्चा भी इसी से जुड़ जाए। वहीं जो माता-पिता इस पेशे से जुड़े नहीं होते हैं मगर फिर भी अपने बच्चों को डॉक्टर बनाना चाहते हैं इसके पीछे उनके पास कई कारण होते हैं। पहला कि यह एक प्रतिष्ठित और अधिक आय वाला पेशा माना जाता है। वहीं इस पेशे में रिस्क कम माना जाता है।
कितना मुश्किल होता है नीट क्वालीफाई करना
नीट की परीक्षा पास कर लेना हर छात्र के लिए आसान नहीं होता है। इसके लिए कड़ी मेहनत और घंटों की पढ़ाई लगती है। जब अभ्यर्थियों को यह यकीन हो जाता है कि वे कुछ हद तक परीक्षा पास कर ले जाएंगे तो वे इसमें हिस्सा लेते हैं। मगर यहां पर ये प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती है। इस परीक्षा में हर साल तीन से चार लाख परीक्षार्थी जुड़ते चले जाते हैं। साल दर साल यह संख्या बढ़ती ही रहती है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगभग 55 हजार है तो वहीं परीक्षा देने वालों की संख्या हर साल लगभग 4 लाख की दर से बढ़ रही है। जितनी संख्या में परीक्षार्थी बढ़ रहे हैं उतनी ही सफलता के मौके कम होते जा रहे हैं। ऐसे में नीट की परीक्षा पास करना सभी के लिए आसान नहीं होता है। हर साल ऐसे भी परीक्षार्थी होते हैं फिर से नीट की परीक्षा दे रहे होते हैं।
परीक्षार्थियों का हौंसला तोड़ रही हैं गड़बड़ियां
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने नीट यूजी परीक्षा की घोषणा जब से की है, परीक्षा कराने वाली एजेंसी पर सवाल उठने लगे हैं। इतनी बड़ी संख्या में परीक्षार्थियों के पहली रैंक हासिल करने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विषय विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी संख्या में किस तरह के परीक्षार्थियों को 720 अंक हासिल हुए हैं। अगर नियमों के अनुसार भी देखा जाए तो किसी भी छात्र को इतना अंक नहीं दिया जा सकता है। ऐसे में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है और अलग-अलग मांगें इस परीक्षा परिणाम के खिलाफ रखी गई हैं। जिस तरह से हर साल देश में परीक्षार्थियों की संख्या लगभग 4 लाख की दर से बढ़ती जा रही है, ऐसे में नीट की परीक्षा में बैठने वाले छात्र-छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। परीक्षाओं में इस तरह की गड़बड़ियां परीक्षार्थियों का हौंसला तोड़ दे रही हैं।
परीक्षार्थियों ने कही ये बात
नीट की परीक्षा दिए हुए एक छात्र ने कहा, ‘पिछले साल 640 नंबर लाने पर मुझे 10,000 तक की रैंक मिली थी, वहीं इस बार इतने ही नंबर पर मेरी रैंक 38 हजार से भी ज्यादा है, जबकि पिछले साल की अपेक्षा इस साल सिर्फ 4 प्रतिशत बच्चे ही ज्यादा परीक्षा दिए हैं, ऐसे में मेरी रैंक में 20 प्रतिशत तक का इजाफा कैसे हो गया मुझे समझ नहीं आ रहा है।’ वहीं इस पर बातचीत करते हुए डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कार्यरत डॉ. शशांक तिवारी ने कहा, ‘नीट का पेपर वैसे भी सभी विद्यार्थियों के लिए बेहद ही कठिन होता है, देश के कुल 15 लाख से भी अधिक विद्यार्थी नीट का एग्जाम देते हैं। जबकि देशभर में मेडिकल की कुल सीटें 1 लाख से भी कम होती हैं, ऐसे में एग्जाम ज्यादा कठिन होता है। अगर पारदर्शिता नहीं रहेगी तो बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। सरकार और एनटीए को एक बार परीक्षा फिर से कराने पर पुनर्विचार करना चाहिए।’
