manbai aur mansarovar
manbai aur mansarovar

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

पालनपुर शहर की एक ओर लम्बी होकर पडी एक सडक आज मानसरोवर रोड के नाम से जानी जाती है। मानसरोवर रोड के किनारे पर एक सरोवर भी है। पालनपुर में मुस्लिम राज की स्थापना से लेकर अर्वाचीन युग तक इतिहास के अनेक आरोह-अवरोह का साक्षी यह सरोवर आज तो अपनी रौनक गंवा बैठा है। लेकिन एक जमाने में इसकी महत्ता बहुत ही थी।

दीवान फीरोज खां जब जालोर की गद्दी पर थे। तब पालनपुर जालोर में था। लेकिन उनके जन्नतनशीन होने के बाद उनका पुत्र दीवान मुझाहिद खान गद्दी पर आया। उसने गद्दी पर आने के साथ ही ई.स.1628 में जालोर की गद्दी बदल कर पालनपुर रखी। उनके गद्दी पर आने के तुरंत बाद जालोर के जिन लोगों को इस लोहाणी राज परिवार के साथ गहरा संबंध था, वे सब राजकर्ता के साथ पालनपुर आकर बस गये। वैद, वडेरा, लूणआ, शाहुकार मेहता, सलाट, माली, जागरी, हलवाई और सुनार आदि यहां आकर बस गये। अभी भी इन लोगों के कुछ संबंध मारवाड के साथ है। उनके रीति-रिवाज, भाषा, पहनावा और लिखने की शैली गुजराती से ज्यादा मारवाड़ी लोगों के साथ ज्यादा मिलते-जलते हैं।

दीवान मुझाहिद खान की शादी सुणसर के रहसी जाडेजा की पुत्री मानबाई के साथ ई.स. 1628 को हुई थी। यह शादी हिंदु और मुस्लिम दोनों विधि के अनुसार हुई थी। जब यह शादी हुई तब चारणों को बहुत बडे दान दिए गये थे। मुझाहिद खान को अपनी अन्य बेगमों से ज्यादा मान बाई प्रिय थी। मानबाई की याद में उन्होंने तालाब बनवाया था और मानबाई के नाम से ही उसका नाम मानसरोवर रखा।

मानबाई का लगन हो जाने के बाद जब बारात को विदाई दी गई, तब कन्यादान में एक पेटी भूल से साथ आ गई थी। जिनमें जाडेजा राजपूतों की कुलदेवी नागणेजी माता की तस्वीरों की एक पुस्तक भी थी। दासी ने भूल से 139 तस्वीरों वाली पेटी अन्य पेटीओं के साथ गाड़ी में रख दी थी। मुझाहिद खान की माता धीरा बाई साचोरा चौहाण राजपूत सूरजमल की पुत्री थी। यह किताब देख कर वे बहुत खुश हुए। और इसे शुभ शगुन मान कर उसे वापिस भेजना उचित न मान कर उस किताब को राजगढ़ में पूजा के स्थान पर स्थापित किया। फिर इसकी पूजा का काम करवाने के लिए सिद्धपुर से एक ब्राह्मण को बुलाया गया और माताजी की नित्य पूजा शुरु हुई। हर नवरात्री को दरबार गढ में माताजी का हवन होता था। पुजारी माताजी के श्लोक बोलकर बाद में ही सभी को माताजी की तस्वीरों के दर्शन करवाता था। मुस्लिम राजा भाव से माताजी की उन तस्वीरों के आगे शीश झुकाते थे। उसके बाद नवरात्री के पहेले वाघेला जवेरा दशेरा की सवारी पर चढने से पहले पुजारी राज परिवार के हरेक सभ्य को देता था।

और नवरात्री का त्योहार बडी धामधूम से लोहाणी पठाण के यह परिवार में मनाया जाता था।

लगभग चार सौ वर्ष तक हिंदू और मुस्लिम कौमी अखलाख की भावना को प्रस्थापित करने वाली मानबाई की याद देता मानसरोवर और उस विस्तार का धमधमता मानसरोवर रोड…हमारी कौमी भावना का संदेश देता है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’