भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
सुकांत एक साधारण गायक का पुत्र था। पिता की मंडली के लोग अक्सर अभ्यास के लिए उसके यहाँ एकत्र होते। इस मौके पर उसे बड़ा आनन्द आता था। वह ध्यान से पूरे समय तक गाना-बजाना सुनता। खासकर सारंगी से निकलने वाली धुन उसे बड़ी प्यारी लगती थी।
खाली समय में वह भी सारंगी बजाने की कोशिश करता। उसकी लगन देख पिता और मंडली का सारंगीवादक बीच-बीच में उसे सुर ताल की कुछ सीख दे देते थे। धीरे-धीरे वह सारंगी पर हल्की-फुल्की धुन बजा लेने लगा। इसी बीच गाँव में महामारी फैल गई। जिसकी चपेट में आकर मंडली का सारंगी और उसके माँ-बाप मर गये।
सुकांत दुनिया में अकेला रह गया। अपना पेट पालने के लिए वह गांव वालों की गाय-भैंस चराने लगा। मगर सारंगी बजाने की शौक बनी रही। गांव के जानवरों को लेकर जंगल की तरफ जाने लगता तो अपनी सारंगी भी साथ ले जाता। जंगल में घंटों अभ्यास करता। समय के साथ वह सारंगी बजाने में निपुण हो गया। एक वक्त ऐसा भी आया, जब उसकी निकाली धुन इतनी जादू भरी और मीठी होने लगी कि पशु-पक्षी तक मुग्ध होकर सुनने लगते थे।
एक दोपहर की बात है। सुकांत के जानवर पेड़ों की छाया में बैठे जुगाली कर रहे थे और वह तन्मय होकर सारंगी बजा रहा था। तभी उधर से यात्रियों का एक दल आ निकला। यात्री मुग्ध होकर उसका संगीत सुनने लगे। जब उसने बजाना बन्द किया तो एक यात्री ने विस्मय के साथ शाबाशी दी- “भाई, कमाल के कलाकार हो। तुम यहाँ जंगल में क्या कर रहे हो? तुम्हें तो किसी राजा-महाराजा की संगीत-सभा में होना चाहिये।”
“प्रशंसा के लिए धन्यवाद भाई, राजाओं की संगीत सभा में मुझे कौन पूछेगा?” कहते हुए वह यात्रियों के पास आ गया और बताया- “पिछले दिनों यहाँ आस-पास दो-तीन संगीत समारोह हुए थे। मैं इसमें अपनी कला के प्रदर्शन की कोशिश की, लेकिन आयोजकों ने अनुमति नहीं दी।”
“ऐसा क्यों?” यात्री ने आश्चर्य से पूछा।
“भाई, मैने सारंगी बजाना खुद के अभ्यास से सीखा है। किसी आचार्य से इसकी शिक्षा नहीं ली है।’ सुकांत ने जवाब दिया- “जबकि संगीत समारोह में आयोजक प्रसिद्ध गुरुओं के शिष्यों के अतिरिक्त किसी अन्य को अवसर देने को राजी ही नहीं होते।”
“हाँ, यह बात तो है। मगर कला की पहचान होकर ही रहती है।” यात्री ने उसे समझाया- “तुम अगले माह पूर्णिमा के दिन होने वाले राजा पुलकेशिन के संगीत समारोह में जरूर जाओ। वहाँ जाने-अनजाने सभी संगीतज्ञ को अपनी कला दिखाने का मौका मिलता है। अच्छे प्रदर्शन पर महाराज ढेरों पुरस्कार भी देते हैं।”
सुकांत के मन में उमंग जाग गयी। पुरस्कार भले ही न मिले, पर हजारों लोगों के सामने सारंगी बजाने की मन की मुराद तो पूरी हो ही जायेगी। यह कोई गांव-कस्बे के मेले-ठेले का समारोह नहीं था। राजा का आयोजन था। इसमें भाग लेने के लिए एक ढंग की पोशाक तो जरूरी ही थी। उसने पिछले दिनों अपनी कमाई से जो बचत की थी, उससे अपने लिए कपड़े सिलवाये और जूतियाँ खरीद लीं। उसके पास राह खर्च के लिए कुछ भी नहीं बचा। मगर वह निराश नहीं हुआ। उसने अपनी यात्रा पैदल ही आरम्भ कर दी। मुख्य मार्ग अधिक लम्बा था, इसलिए वह पगडण्डियों के छोटे रास्ते से सफर कर रहा था।
काफी फासला तय करने के बाद एक निर्जन इलाके में उसे एक घोड़े की बेचैनी से हिनहिनाने की आवाज सुनाई पड़ी। वह आवाज की दिशा में मुड़ गया। थोड़ा आगे जाने पर उसे एक काला घोड़ा दिखा। उसके पास जमीन पर पड़ा एक नौजवान छाती दबाये दर्द से तड़प रहा था। सुकांत दौड़कर उसके पास पहुंच गया। उसने नौजवान को सीधा बैठाया और अपने पात्र से निकालकर पानी पिलाया। किन्तु देखते-देखते वह दोबारा दर्द से बेहाल होकर चल बसा। सुकांत ने दूर-दूर तक नजर दौड़ाई, लेकिन कहीं कोई बस्ती न दिखी। ऐसी स्थिति में मृतक के अन्तिम संस्कार की जिम्मेदारी अकेले उसी पर आ पड़ी थी। जबकि उसके पास कफन खरीदने के लिए भी पैसा नहीं था। हारकर उसने मृतक के थैले की तलाशी ली। थैले में एक सारंगी, कुछ कपड़े और काफी पैसे थे। सुकांत ने मृतक को घनी झाड़ियों के बीच छिपाकर चादर से ढंक दिया और उसके थैले से कुछ रूपये लेकर बाजार चला गया। करीब दो घंटे बाद वह फावड़ा और अन्त्येष्टि के लिए जरूरी वस्तुओं के साथ लौट आया । उसने एक कब्र तैयार की। मृतक को कफन में लपेटा। मुँह पर कपूर रखकर जलाया और फिर मृतक को उसके सारे सामान सहित कब्र में उतार दिया। अन्त में कब्र को मिट्टी से ढंक कर उसने नौजवान की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की।
यह सब काम निपटाने में सुकांत ने भरसक शीघ्रता की। किन्तु पूरा दिन इसमें लग गया। थकान भी इतनी अधिक हो गयी थी कि सारी रात सोने के बाद भी आगे की यात्रा में वह पहले जैसी तेजी न ला सका। इसके बाद भी वह चलता गया और ऐन समारोह वाले दिन पुलकेशिन की राजधानी में पहुँचकर दम लिया। मगर समारोह नगर से दूर राजकीय उद्यान में आयोजित था। वहाँ तक पहुँचने में उसे दोपहर हो गयी। उसने देखा, प्रतियोगियों का प्रदर्शन प्रारम्भ हो चुका था। देर से आने के कारण उसे समारोह में सारंगी वादन की अनुमति नहीं मिली। उसे बड़ी निराशा हुई।
समारोह समाप्त होने पर वह अपने घर चल पड़ा। कुछ दूर आने पर उसे अपने आस-पास चलता मृतक नौजवान का काला घोड़ा दिखायी पड़ा। आगे बढ़कर सुकांत ने घोड़े की लगाम थाम ली और उस पर सवार हो गया। शुरू में घोड़ा सुकांत की इच्छानुसार दौड़ता रहा, लेकिन आगे चलकर वह बेकाबू हो गया। सुकांत ने घोड़े को मनचाही राह पर लाने की बड़ी कोशिश की, पर वह काबू में न आया। सरपट दौड़ता रहा और एक हवेली के सामने पहुंचकर ही दम लिया।
हवेली के सामने कई नई उम्र के लड़के ढोल, सारंगी, मृदंग वगैरह बजाने का अभ्यास कर रहे थे। घोड़े की आहट पाते ही सब आश्चर्य से उसकी तरफ देखने लगे। पहले हवेली के नौकर, फिर बूढ़े आचार्य उसके पास आ गये। आचार्य ने उसकी तरफ अंगुली दिखाते हुए विस्मय से पूछा- “तुम…! तुम इस घोड़े पर कैसे आये? शेखर कहाँ है?”
इस बीच संगीत का अभ्यास छोड़कर नौजवान लड़के भी उसके पास आ गये थे। सबकी आँखों में कौतूहल और जिज्ञासा थी। सुकांत की समझ में आ गया कि इस घोडे का सवार शेखर था और उसकी जगह उसे आया देख सब चकित हैं। वह घोड़े की पीठ से नीचे आ गया और उसने सारी घटना सच-सच बता दिया। एक नौकर ने शंका प्रकट की “शेखर के पास कीमती कपडे और काफी धन था। क्या पता लालच में आकर तुमने ही उसे मार दिया हो ?”
“अगर मुझे लालच होती तो मैं उसका सारा सामान ले लेता। पर मैने सब उसकी कब्र में रख छोड़ा है।” सुकांत ने सफाई दी।
मगर फिर भी सब की आँखों में सन्देह बना रहा। वह आग्रहपूर्वक सबको लेकर शेखर की कब्र के पास आया। नौकरों ने मिट्टी हटाई तो उसकी बात सच निकली। इकलौते पुत्र की लाश देखकर बूढ़े आचार्य दुःख से विह्वल हो गये। सुकांत और संगीत सीखने वाले लड़कों ने मिलकर उनको सम्भाला। नौकरों ने कब्र को फिर से मिट्टी से ढंक दिया। सब वहाँ से चलने की तैयारी करने लगे। सुकांत ने आचार्य से आज्ञा माँगी- “गुरू जी, अब मुझे घर जाने की अनुमति दें।”
बूढ़े आचार्य ने उसे गले लगा लिया। भर्राये स्वर में बोले- “शेखर के बाद अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं बचा है। अपनी जायदाद और संगीत विद्यालय के लिए मुझे एक उत्तराधिकारी चाहिये । तुम ईमानदार और कर्तव्यपरायण होने के साथ-साथ संगीत प्रेमी भी हो। इसलिए तुम मेरे लिए सबसे उपयुक्त उत्तराधिकारी हो। शायद यही सोचकर ईश्चर ने शेखर के बदले तुम्हें मेरे पास भेजा है। तुम मेरे पास ही रुक जाओ।”
आचार्य के इस निर्णय को उनके नौकरों और शिष्यों ने भी स्वागत किया। आखिर सुकांत ने आचार्य का आग्रह स्वीकार कर लिया। आगे चलकर उसने आचार्य के संगीत विद्यालय को अपनी लगन, सूझबूझ और मेहनत से प्रसिद्धियों की बुलन्दियों पर पहुंचा दिया।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
