सुमित्रा काकी ! जैसा नाम वैसा धैर्य। भरी जवानी में ही पति दूसरी औरत की खातिर छोड़कर चला गया, पर इसका लेशमात्र भी शिकन उनके चेहरे से न झलक पाता। उन्होंने जीवन के हर पहलू को सकारात्मकता के साथ लिया था | मचाने को तो वह हाय तौबा मचा सकती थी, घर-परिवारवालों से सहानुभूति के चंद सौगातें बटोर सकती थी, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और न ही अपनी इस कमजोरी को किसी के सामने उजागर किया।

परिवार का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जिससे बातें करके वह अपने दुःख को हल्का करती। वह जानती थी कि लोग सामने तो चिकनी-चुपड़ी बातें करके उसके मन का टोह लेंगे फिर भरी बिरादरी में उसकी बखिया उधेड़ेंगे। पिछले कई सालों से उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, और आज जब अचानक उनके पति वापस लौट आये तो उन्हें थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ। पर उन्होंने अपने मन में उठने वाली हलचल को कभी उजागर नहीं होने दिया और न ही कभी ये जाहिर किया कि उनकी कभी कमी भी खली। शायद यही सच भी था, उन्होंने कभी उनकी प्रतीक्षा नहीं की और न ही कोई शिकवा -शिकायत ही किया। हां कभी-कभी वह ये जरूर सोचती कि मुझमें ही कोई कमी होगी तभी तो मेरा पति मुझे छोड़कर दूसरी जनानी के पीछे मतवाला है।

राघव काका लौट आये हैं, यह खबर गांव में जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। गांव-टोले की औरतें -मर्द, बच्चे सब ख़ुशी-ख़ुशी सुमित्रा काकी को बधाई देने पहुंचने लगे। हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से उनका मनोबल बंधा  रहा था और उनके भाग्य का गुणगान कर रहा था | पर काकी निर्निमेष शून्य को निहार रही थी और सोच रही थी …….हाय रे विधि का विधान ! लोग तो न उसे दुःख में अकेला छोड़ते हैं और न ही सुख में ही चैन लेने देते हैं | जिधर देखो हर तरफ बस सुमित्रा काकी के भाग्य की पोथी खुली पड़ी थी और यदा-कदा हर शख्स अपनी कथा बांचने में मशगूल था ,, पर सुमित्रा काकी के मन में कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे। क्या होती है परित्यक्ता…? कहीं उसकी ही छवि तो नहीं ..? पूछूं तो क़िस्से ,,हर शख्स तो उसी कतार में खड़ा दिख रहा है।


मन के भीतर एक अजीब सी हलचल मची थी, गांव में लोगों से सुना था, जिन औरतों की जुबान ज्यादा सक्रिय होती हैं उनके पति उन्हें छोड़ देते हैं पर यह बात तो उनके ऊपर लागू ही नहीं होती क्योंकि खुद राघव कई बार उनके धैर्य और सहज रूप की प्रशंसा कर चुके थे। सुमित्रा अपने मन में उठनेवाले  ऐसे ही अनगिनत सवालों से घंटों मंथन करती और जब कोई सार्थक हल न मिलता तब फिर लौट पड़ती उसी उबाऊ जिन्दगी के दहलीज पर। इधर जब से राघव की वापसी हुई है, मिलने वालों का तो जैसे तांता ही लग गया है और उस स्थिति में सबसे ज्यादा आहत होता है सुमित्रा का मन ! जो न चाहते हुए भी लोगों के अनर्गल सवालों के इर्द-गिर्द घूमता रहता है।

दिन तो इसी उधेड़बुन में बीत जाता, पर रात के अंधियारे में जब वह बिस्तर पर अकेली होती तो सोचती, क्या यही जीवन है …..? क्या हर कोई इस भीड़ भरी दुनिया में मेरी तरह ही अकेला है …? स्त्री क्या सच में मर्द के हाथ की कठपुतली है ,,जिसे जब चाहा नचाया और मन भरते ही परे कर दिया | यही सब सोचते-सोचते उसने अपने जीवन की अनगिनत रातें जाग-जागकर बिताई। घर में, पास-पड़ोस में सब उसे तिरस्कृत नजरों से देखते हैं,,फिर उसमें गलत भी क्या है …? जिस स्त्री का पति ही उसे त्याग दे तो करीब-करीब हर स्त्री की मनोदशा यही होती है।

घर में हमेशा बोझिल सा माहौल बना रहता और बाहर निकलें तो समाज की भूखी-नंगी नजरें हमेशा टकटकी लगाये खड़ी हैं …इन सबसे बचने का सबसे सरल तरीका है कि झूठे रिश्तों को निभाते चलो ताकि बाहर किसी को भनक भी न हो कि परित्यक्ता है नहीं तो हजार ऑखें मटरगश्ती करती मिलेंगी। जिन देवरों को गोद में खिलाया, उनका लिवनी-बिछौना साफ़ किया, वो भी गाहे-बगाहे अपनी भूख का इशारा कर देते, पर सुमित्रा ने अपने आप को एक कड़े ताबूत में कैद कर रखा था, जहां शरीर जिन्दा था पर मन निष्प्राण हो चुका था। अब जब राघव लौट आये हैं तो एक विचार जो हमेशा डराता रहता है कि न जाने अब कौन सा पहाड़ टूटने वाला है, अब कौन सा नया वज्रपात होने वाला है। उन्हें लौटे हुए करीब महीना भर बीत गया पर न उन्होंने कुछ बोला, न सुमित्रा ने ही कुछ  पूछा, सब यंत्रवत चलता रहा।

एक सुबह जब नींद खुली तो देखा किवाड़ खुले पड़े हैं तो सोचा कि यहीं कहीं बाहर गये होंगे पर जब चलकर दुसरे कमरे तक आई तो आंख खुली की खुली रह गईं | गृहस्थी का सारा सामान बक्सा, गहने यहां तक कि बुरे दिन के लिए बचाए गुल्लक के पैसे तक गायब थे और साथ ही राघव के जो दो-चार कपडे थे, वो भी गायब थे और साथ ही गायब थी राघव की परछाई ! उसे समझते देर न लगी कि माजरा क्या है।

राघव काका के गायब होने की खबर जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। हर कोई अपनी-अपनी मनगढ़ंत विवेचना से सुमित्रा काकी के सीने को छलनी किये जा रहा था। लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि जरूर राघव काका को सुमित्रा काकी के चरित्र पर संदेह हो गया होगा, तभी तो बेचारे बिना कुछ कहे-सुने अचानक गायब हो गए। सच ही तो है, यह समाज है ही कोरी मनगढ़ंत! जहां किसी की भावनाओं के लिए किसी के पास शब्द नहीं हैं, पर जैसे ही कोई कमजोर कड़ी मिली, उसके चरित्र की बखिया उधेड़ने को हर शख्स तैयार बैठा है।

आज तक हर सुख-दुःख -तकलीफ को सहज स्वीकार करती समित्रा यही सोचती कि आरोप -प्रत्यारोप, अवहेलना-तिरस्कार सब भाग्य की धरोहर है, जिस डोर के सहारे उसने जीवन -पथ पर अग्रसर होने के सपने देखे थे, वह डोर ही कच्ची थी। वह खुद को लाख समझाती और कोई सार्थक हल तलाशने की कोशिश करती ,, लेकिन एक सत्य यह भी  है कि नारी का कोमल मन जब आहत होता है तो सब कुछ बिखर कर रह जाता है। कहां गलत थी सुमित्रा यही सोचते-समझते जीवन का एक महत्वपूर्ण समय बीत गया। और आज जब वह राघव के छल से आहत हुई तो न चाहते हुए भी अतीत के पन्ने खुद-ब-खुद खुलते गए। अपने नजदीकी रिश्तेदार की शादी में वह पहली बार राघव से मिली और राघव के दिल में उतर गई। शादी का प्रस्ताव राघव ने ही भेजा था, पर वह तस्वीर का विपरीत रुख था जिसका आभास सुमित्रा को बखूबी था, पर कहते हैं न ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ ……!


यह महज एक आकर्षण था यह सब कुछ जानते हुए भी सुमित्रा ने शादी के लिए हाँ कर दी | सुमित्रा की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी क्या थी, बिन माँ-बाप की बच्ची जो अपने मामा-मामी की बदौलत पल रही थी, सोचा शायद यहीं से भाग्य का कोई दूसरा अध्याय खुले। अध्याय खुला तो जरूर पर पहले से भी बदतर …..! शुरुआत से ही राघव का व्यवहार कुछ ज्यादा अच्छा नहीं था जिसका एक कारण सुमित्रा का बिन दान-दहेज़ के आना था। समय-समय पर उसे अनाथ और भाग्यहीन होने का ताना मिला जिसे उसने सहज स्वीकार किया। पर भाग्य के लेख को मेटना नामुमकिन था,वह जितना भी सहज होने की कोशिश करती राघव उसे उसकी कमजोरी समझता। झूठे-प्यार और आकर्षण से पूरित विवाह का भयानक सच आज सुमित्रा के सामने था। राघव बात-बात पर मीन-मेख निकालता,छोटी सी बात पर भी बेहिसाब जली-कटी सुनाता। और जब कभी राघव के व्यवहार से उसका मन आहत हो आंखों के रास्ते बाहर निकलता। सास की कटाक्षपूर्ण बातें अन्दर तक भेद जाती ”आखिर ऐसा क्या कह दिया मेरे बेटे ने……? बिन दान-दहेज़ के घर में जगह मिल गया इतना ही बहुत है ”।

कई बार सुमित्रा अपने आत्मसम्मान के बारे में सोचती फिर अगले ही पल इसे अपने भाग्य का खेल समझ समझौता कर लेती। झुकना ही औरत की नियति है,ऐसा सत्य उसने अपने जीवन-चरित्र में समाहित कर लिया। सामाजिक मर्यादा ने पावों में बेड़ियां डाल रखी थी , वरना इतना सब-कुछ सहन करना इतना आसान कहां था। फिर इसकी क्या गारंटी कि नया जीवन इस जीवन से बेहतर होगा ……! यही सोचकर खुद को इशारे पर चलने वाली कठपुतली बना लिया ,,जिसका कोई वजूद ,कोई उद्देश्य नहीं होता। फिर लोगों से सुना था , बेटी ससुराल में ही अच्छी लगती है या फिर स्वर्ग में .अब जीते जी स्वर्ग तो जा नहीं सकती। भूले से भी कभी सुमित्रा ने दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा, क्योंकि उसे पता था कि तलाक के बाद एक स्त्री का समाज में क्या इज्जत रहती है सो उसने खुद को समाज की नजरों में गिराने से राघव की नजरों से गिरना ही ज्यादा बेहतर समझा। कम-से -कम राघव के नाम का झूठा आवरण ही साथ था और आज जब राघव एक बार फिर वापस चले गए तो दुनियां की भीड़ में वह खुद को बिलकुल अकेला व निरीह पा रही थी। सुमित्रा ने जिस धैर्य और अडिगता से खुद को संभाला वह सब एक ही क्षण में रेत सा भरभरा गया और वह मूकदर्शक बने अपने संसार को लुटते देखते रही।

विचारों की आंधी जब थोड़ी थमती तो शरीर की कमजोरी उसे विवश कर देती। लोगों की उलाहना बदस्तूर जारी थी, कभी -कभी वह सोचती हाय रे विधाता..! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ……? पति का सुख न सही कम-से-कम जिन्दगी के कुछ क्षण तो इत्मिनान से जी लेती ,पर नहीं….! वह भी तुझसे देखा न गया। इधर कई दिनों से उसकी तबियत ख़राब रह रही थी और बिस्तर पर पड़े-पड़े बस अपने खालीपन को टटोलने के सिवा कोई दूसरा काम शेष नहीं बचा था।

एक दिन जब सुमित्रा अर्धनिद्रा में थी उसे महसूस हुआ कि जैसे उसके पास कोई है , जब ऑंखें खोलकर देखी तो सामने उनका देवर मदन खड़ा था। अचानक उसे सामने देख सुमित्रा थोड़ी अचभित हुई और बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगी तो मदन ने झट उसे सहारा देकर उसे वापस उसी स्थिति में सुला दिया और बोला, देखो भाभी तुम्हारी हालत अब मुझसे देखी नहीं जाती। फिर देखो न …! कैसा कमजोर बना लिया है आपने खुद को, मैं तो कहता हूं कि तुम भी अब अपने बारे में कुछ सोचो, आखिर अकेले कब तक तड़पती रहोगी …..? सो मेरा ये प्रस्ताव मान लो और बन जाओ मेरे सपनों की रानी… आखिर कब तक मातम मानती रहोगी …..? और तुम्हारे मातम मनाने से भईया तो वापस आने से रहे, सो उतार फेंको इस झूठे आवरण को। यही सही भी रहेगा तुम्हारे लिए, घर की बात घर में ही रह जाएगी।

इतना सुनते ही सुमित्रा के शरीर में न जाने कहां से इतनी ताकत आ गई और उसने एक झन्नाटेदार तमाचा मदन के गाल पर जड़ दिया और चीखती हुई बोली….दूर हो जा मेरी नजरों से, तूने ऐसा सोच भी कैसे लिया ……? चड्डी में घूमते थे, जब मैं ब्याहकर इस घर में आई थी, ये सब कहते हुए तनिक शर्म भी नहीं आई …..? मैं मां समान हूं तुम्हारी, और तुम हो कि अपनी वहशी नजर मुझपे टिकाये हो | क्या इस संसार में एक औरत को अकेले रहने का कोई हक़ नहीं है, क्यों उसे किसी के सहारे की जरूरत पड़ती है, क्यों ये सारे अधिकार सिर्फ पुरुष वर्ग के लिए ही आरक्षित है ….???

यह कहते हुए अचानक वह दहाड़ने की स्थिति में बोली …….आओ गांव वालों.. देखो एक औरत की लुटती हुई लाज को, कर लो तुम सब भी अपनी-अपनी मुरादें पूरी। शायद जब बिस्तर पर अपनी पत्नी के साथ होते होगे तो न जाने कितनी बार अपने सच्चाई की दुहाई देते होगे कि मैं सिर्फ तुम्हारा हूं, पर असली सच्चाई तो यह है कि तुम्हारी कौम ही ऐसी हो, जिधर देखी अकेली और बेबस औरत उधर लपक पड़े। अरे थूकती हूं मैं ऐसे समाज पर, जो तुम जैसे पुरुषों से बनकर खड़ा है, और बोलते-बोलते अचानक उसका पूरा शरीर ऐंठ गया और वहीँ जमीन पर गिर पड़ी। उसका शरीर निष्प्राण हो चुका था पर शायद, उसकी आत्मा ने यह महसूस कर लिया था कि जो वर्षों से अपने अन्दर एक ज्वाला को दबाये थी, उसका निकलना जरूरी था, नहीं तो फिर कोई सुमित्रा क्यों समाज में फैले घिनौने मदन की दरिंदी सोच की आहुति दे रही होती।

 

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