santa claus ke saath anokhee sair Motivational story
santa claus ke saath anokhee sair Motivational story

खुशी थी एक नन्ही सी बच्ची। नन्ही और नटखट। अपनी भोली बातों से वह सबको खुश कर देती थी। इसीलिए उसकी मम्मी ने उसका नाम खुशी रखा था। साथ ही उसे घूमना पसंद था। उसका मन करता था, जहाँ तक उसके पैर जाते हैं, वह चलती ही जाए। नदी, पहाड़, जंगल सब देख ले। और धरती ही क्यों, अपने नन्हे पैरों से आसमान तक को नाप आए! वह कहती मम्मी-पापा से तो वे हँसते। नील भैया और मीनू दीदी भी हँसते। फिर कहते, “अच्छा, चल खुशी, तुझे झूलों वाला अप्पूघर तो हम दिखा ही लाते हैं।” “ठीक है, चलो।” खुशी मजे में सिर हिला देती और झटपट अपने बालों में लाल रिबन बाँधना शुरू कर देती। लाल रिबन उसे पसंद था। फिर बाहर कहीं घूमने जाए तो थोड़ा अलग ठाट तो होना ही चाहिए। पर सिर्फ एक बार ही तो गई थी वह मम्मी- पापा और भैया, दीदी के साथ अप्पूघर।

फिर किसी को याद ही नहीं रहा कि खुशी की भी तो कहीं बाहर घूमने की इच्छा होती है न!…मम्मी को घर के बहुत सारे काम होते, भैया – दीदी को भी। और पापा तो रात को आते ही देर से थे। तो खुशी भला क्या करे? वह अकेले ही घूमने निकल पड़ती। अकसर शाम को वह घर के पास वाले हाथी पार्क में घूमने जाती थी। वहाँ पार्क के गेट पर ही पत्थर के दो बड़े-बड़े हाथी विराजमान थे। काले-काले, खूब बड़े से डील – डौल वाले। ऊपर हवा में सूँड़ उठाए हाथी! खुशी के हाथ उन विशाल हाथियों की बड़ी-बड़ी टाँगों तक ही जा पाते थे। वह उनकी सूँड़ को छूना चाहती थी, पर छू नहीं पाती थी। इसलिए पार्क में जाते ही वह सूँड़ उठाए हाथियों को दूर से ही आदाब करती और पास वाली फूलों की क्यारी के साथ-साथ घूमती – टहलती। सुंदर सुंदर फूलों के साथ बातें करती और उन पर कोई नन्ही- मुन्नी सी कविता बनाती। इस खेल में उसे वाकई मजा आता था। पर कहीं दूर, बहुत दूर घूमने जाने की बात तो मन से निकलती ही नहीं थी। एक दिन की बात, नन्ही खुशी शाम के समय घूमने के लिए घर के पास वाले हाथी पार्क में गई। वह कुछ उदास थी। इसलिए कि बड़े दिनों से वह कहीं दूर घूमने नहीं जा पाई थी। अप्पूघर में भी नहीं। उसने मन ही मन कहा, ओह, मैं कितनी बोर हो रही हूँ! कोई मुझे घुमाने ही नहीं ले जाता। सबके अपने-अपने काम हैं, पर मेरे लिए तो किसी के पास फुर्सत ही नहीं। तभी अचानक उसकी निगाह सामने फूलों की क्यारी की ओर गई। उसने देखा, गेंदे और गुलाब के फूलों की क्यारी में सुंदर सा लाल चोगा पहने, सफेद दाढ़ी वाला कोई शख्स टहल रहा है।

उसके होंठों पर बड़ी मीठी हँसी थी। फुर फुर फुरफुराती हँसी। सिर पर सुंदर फर वाली लाल टोपी पहने उस बूढ़े शख्स की दाढ़ी तेज हवा में हिलती तो लगता, वह भी मस्ती में किलक रही है। उसके दाएँ कंधे पर एक सफेद तितली आकर बैठ गई थी और वह हँसमुख बूढ़ा बड़े मजे में उससे बातें कर रहा था। खुशी को लगा, लाल चोगे वाले बूढ़े की मजेदार बातें सुनकर तितली को भी बड़े जोर की हँसी आ रही है और फूलों को भी। देखकर खुशी को भी हँसी आ गई। उसे लगा, “यह तो कोई बड़ा खुशमिजाज बूढ़ा है। हमेशा खुश रहने वाला बड़ा नेक और हँसमुख बूढ़ा। मगर… पहले तो इसे कभी देखा नहीं!” पास जाकर उसने देखा तो चौंक गई, “अरे, सांता…!” उसे लगा, लाल चोगा पहने, यह बूढ़ा और खुशमिजाज शख्स जरूर सांताक्लाज ही है। खुशी ने अपनी हिंदी की किताब में क्रिसमस की कविता के साथ सांताक्लाज का चित्र देखा था। यह सफेद दाढ़ी और लाल चोगे वाला बूढ़ा तो वैसा ही था। सिर पर वैसी ही लाल फर की टोपी। किनारों पर सफेद चाँदिया पट्टी। वह पता नहीं किस बात पर खूब खुश लग रहा था और मजे में ‘हा… हा…हा – हा’ करके हँस रहा था। हाथी पार्क में अचानक सांताक्लाज को देखकर नन्ही खुशी को बड़ी हैरानी हुई। वह हँसते हुए बोली, “अरे सांताक्लाज, तुम….? यहाँ…!” तभी सांताक्लाज ने अपना चेहरा थोड़ा घुमाया। अब तो वह साफ-साफ पहचान में आ रहा था। हाँ-हाँ, वही लंबी सफेद दाढ़ी और सुंदर सा लाल चोगा। सिर पर बड़ी ही खूबसूरत लाल कैप, जिस पर कुछ खूबसूरत रंग-बिरंगे पंख भी उसने खोंस लिए थे। बिल्कुल वैसा ही, जैसा खुशी ने अपनी हिंदी की किताब में क्रिसमस वाले पाठ में देखा था। “तुम… तुम सांताक्लाज हो न? तुम्हें देखकर मुझे बड़ी हैरानी हो रही है।” नन्ही खुशी ने कहा। सुनकर सांताक्लाज बड़े जोर से हा हा… हा हा हा करके हँसा। बोला, “तुम्हें हैरानी क्यों हो रही है खुशी? मैं सचमुच सांताक्लाज ही हूँ। तुम घूमने की शौकीन हो ना! अभी-अभी तुम कह रही थीं, मैं कितनी बोर हो रही हूँ। कोई मुझे घुमाने ही नहीं ले जाता। तो चलो, आज मैं तुम्हें घुमाकर लाता हूँ।” “पर… पर तुम मुझे कैसे घुमाओगे सांताक्लाज? क्या तुम्हारे पास कोई घोड़ागाड़ी या कार है? या फिर बस या रेलगाड़ी में…? या…या…?” सांताक्लाज हँसकर बोला, “अरे ओ नन्ही खुशी! मेरे पास घोड़ागाड़ी भी है, कार भी। और तुम कहो तो हम ऐसे ही हवा की तरंगों पर भी उड़कर जा सकते हैं।” खुशी सोचने लगी, यह सांताक्लाज तो वाकई जादूगर है।

इसे पता नहीं कैसे मेरा नाम भी पता चल गया।… पर मैं भला कैसे घूमने जा सकती हूँ? अभी शाम को सात बजे तो मेहता सर घर पर पढ़ाने के लिए आएँगे? और फिर मम्मी ने भी तो कहा था कि देख खुशी, अँधेरा होने से पहले ही पार्क से लौट आना। तो फिर…? खुशी के मन की बात शायद सांताक्लाज को भी पता चल गई थी। उसने कहा, “तुम कहो तो खुशी, मैं तुम्हें दो घंटे में सारी दुनिया की सैर करा लाता हूँ।” “अरे वाह! सच्ची – मुच्ची तुम मुझे सारी दुनिया घुमा सकते हो, सिर्फ दो घंटे में?” खुशी ने हैरानी से कहा। उसकी आँखें बुरी तरह फैल गई थीं। “हाँ-हाँ, क्यों नहीं… क्यों नहीं! बैठो मेरी नन्ही मित्र, मेरे कंधे पर और चलो मेरे साथ-साथ दुनिया की सैर करने।” कहते-कहते सांताक्लाज ने हँसते हुए खुशी को उठाकर अपने कंधे पर बैठा लिया। खुशी बैठी तो सांताक्लाज उड़ चला। उड़ते हुए तेज हवाओं में उसकी सफेद दाढ़ी मस्ती से लहरा रही थी और हवा की तरंगों में एक मधुर संगीत गूँज रहा था। खुशी को यह सब बड़ा अनोखा और जादुई लग रहा था। वह सोच रही थी, क्या ऐसे ही मैं सारी दुनिया घूमकर आऊँगी? … सिर्फ दो घंटे में पूरी दुनिया की सैर! कुछ देर बाद उसने देखा, सांताक्लाज की घोड़ागाड़ी कहीं से उड़ती हुई आई। पहले वह छोटी थी, बहुत छोटी खिलौना गाड़ी। फिर होते-होते खासी बड़ी हो गई और साथ ही साथ उड़ने लगी। सांताक्लाज बोला, “आओ खुशी, बैठो। यह तुम्हारे लिए ही है।” खुशी मजे में उसमें बैठी और सांताक्लाज की उस घोड़ागाड़ी की सैर का आनंद लेने लगी। घोड़ागाड़ी कभी सड़क पर दौड़ती, कभी हवा में उड़ती। सांताक्लाज ने झटपट खुशी को इंग्लैंड, अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, रूस, चीन, जापान समेत दुनिया के सारे बड़े-बड़े देश दिखा दिए। उसने हर जगह नदियाँ, पहाड़ और जंगल दिखाए। जर्मनी का कई अजूबों वाला भव्य टेक्नोपार्क, फ्रांस की एफिल टॉवर और अमरीका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी भी। खुशी हर जगह थोड़ा घूमती टहलती और वहाँ के लोगों से मिलती। उनसे हाथ मिलाती। सारी दुनिया के बच्चों से मिलने का अपना मजा था। और एक जगह तो बिल्कुल झूलालैंड जैसी थी। अनोखा झूलालैंड। वहाँ दूर-दूर तक झूले ही झूले थे। किस्म-किस्म के हजारों झूले। … उनके नाम भी अजीब थे। एक कोलंबस था, एक वास्कोडिगामा। एक ह्वेनसांग… और एक इब्नबतूता भी! वही ‘इब्नबतूता पहन के जूता’ वाला इब्नबतूता, जिसे बच्चे प्यार करते हैं।…सबका अलग-अलग स्टाइल और रोमांच। कुछ तो इतने बड़े झूले थे कि एक ही झूले पर एक साथ सैकड़ों लोग झूलते। हजारों बच्चे और बड़े लोग भी मजे में झूल रहे थे। सांताक्लाज के साथ खुशी पहुँची तो सब उन्हें देखने के लिए खड़े हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर दोनों का स्वागत किया। सब चाहते थे कि खुशी और सांताक्लाज उनके साथ झूलें। उस अनोखे झूलालैंड में जहाँ भी वे जाते, बच्चे सांताक्लाज को देखते ही उछल-उछलकर अपनी खुशी प्रकट करते। और फिर एकाएक चिल्ला पड़ते, “सांता, सांता…! सांता … मेरा दोस्त!” फिर सांताक्लाज और खुशी से हाथ मिलाने के लिए बच्चों में होड़ लग जाती। देख-देखकर खुशी किलक उठती और उसके नन्हे, उजले दाँत चमकते। उसे सच में बहुत अच्छा लग रहा था। वह हैरान थी, “अरे, सांता को बच्चे कितना चाहते हैं, कितना प्यार करते हैं…? सारी दुनिया के बच्चे!” फिर उसने सोचा, सांताक्लाज भी तो बच्चों को कितना प्यार करता है। तभी तो वह हर बच्चे का दोस्त है …! थोड़ी देर वहाँ झूलने के बाद सांताक्लाज और खुशी सबसे विदा लेकर आगे चले तो सांता की घोड़गाड़ी दक्षिणी ध्रुव जा पहुँची। वहाँ हर ओर बर्फ ही बर्फ थी। दूर-दूर तक बर्फ की चादर। बर्फ के सिवा कुछ नहीं। या फिर थे तो खूबसूरत पेंग्विन। … असंख्य पेंग्विन, कतार की कतार! अपनी एक अलग दुनिया बसाए हुए। खुशी को लगा, वह भी यहाँ बर्फीले इलाके में आकर एक पेंग्विन बन गई है। खूब सारी बर्फ उसके कपड़ों पर जमा हो गई थी और वह मजे में बर्फ पर दौड़ लगा रही थी। सांताक्लाज ने कहा, “खुशी, स्केटिंग सीख लो, तो तुम्हें और भी अच्छा लगेगा।” सांता ने स्केटिंग सिखाई तो खुशी उस बर्फीले इलाके में मजे में स्केटिंग करते हुए इतनी तेज दौड़ी, इतनी तेज के हजारों पेंग्विन उसे हैरानी से देख रहे थे और उसके साथ – साथ दौड़ रहे थे। खुशी को इतने मजे आ रहे थे, जैसे वह परी बन गई हो और दोनों पंख फैलाए आसमान में उड़ रही हो। यों सांताक्लाज का अंदाज भी तो निराला था। हर जगह वह थोड़ी देर रुकता, फिर धीरे से चुटकी बजाता। हवा उसी ओर बहने लगती, जिधर उसे जाना था। बस, फिर सांताक्लाज की घोड़ागाड़ी दौड़ने लगती और झटपट – झटपट मीलों दूर निकल जाती। उसने खुशी को अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में घुमाया तो लंका, नेपाल, भूटान, मारीशस और इंडोनेशिया की भी सैर कराई। सांताक्लाज बोला, “खुशी, अभी कुल डेढ़ घंटा बीता है और अब हम कोलंबो में हैं। बोलो, क्या अब वापस चलें?” “कोलंबो!” खुशी बुदबुदाई। बोली, “सांताक्लाज, अभी कितनी देर और लगेगी वापस पहुँचने में?” “बस, आधा घंटा। मैंने प्रॉमिस किया था न!” सांताक्लाज हँसते हुए बोला। “सच्ची!” खुशी के मारे खुशी की चीख निकल गई। “हाँ, क्यों नहीं!” सांताक्लाज हँसने लगा। बोला, “तुम कहो तो हम पंद्रह मिनट में भी वापस पहुँच सकते हैं।” “कैसे?” खुशी ने पूछा। “एक प्यारी – सी खिलौना कार से।” सांताक्लाज ने कहा। “कार …! कहाँ है वह कार?” खुशी ने बड़े अचरज से भरकर पूछा। सुनकर सांताक्लाज ने अपने लाल चोगे की लंबी जेब में हाथ डाला और देखते ही देखते एक छोटी-सी लाल खिलौना कार उसके हाथ में नजर आने लगी। खुशी को हँसी आ गई। बोली, “यह तुम्हारी जेब क्या अजायबघर है सांताक्लाज कि तुमने इसमें अपनी खिलौना कार छिपाकर रखी है। और फिर इतनी छोटी-सी तो कार है, इसमें मैं बैठूंगी कैसे?” “अभी तुम देखती जाओ।” सांताक्लाज हँसा। उसी समय सांताक्लाज ने उस खिलौना कार पर अपनी हथेली फिराई, तो देखते ही देखते कार बड़ी हो गई और होते-होते पूरे आकार की कार नजर आने लगी। सांताक्लाज ने कार का दरवाजा खोलकर कहा, “आओ खुशी, बैठो।” खुशी ने सोचा, सांताक्लाज ही कार चलाएगा और वह तो पास वाली सीट पर आराम से बैठेगी। पर नहीं, सांताक्लाज ने उसे ड्राइविंग सीट पर बिठाकर कहा, “बैठो खुशी, गाड़ी तुम चलाओगी।” “पर… मुझे तो गाड़ी चलानी नहीं आती।” खुशी घबरा गई। “कोई बात नहीं… कोई बात नहीं खुशी। यह कार तो खुद ही सिखाती है। तुम बस, इसका कहना मानना। चलो, अब ड्राइविंग सीट पर बैठो तो सही।” सांताक्लाज ने खुशी को ड्राइविंग सीट पर बैठाते हुए कहा। खुशी ने कार में बैठते ही स्टार्ट का बटन दबाकर स्टेयरिंग व्हील को सँभाला, तो कार एकाएक तेजी से दौड़ पड़ी। इतनी तेज … इतनी तेज कि खुशी चकरा गई। हालाँकि उसे अंदर ही अंदर हँसी भी आ रही थी। आखिर पहली बार उसने ड्राइविंग की थी। इस कार को चलाना इतना मजेदार होगा, उसे अंदाजा ही नहीं था। लेकिन थोड़ी देर बाद खुशी के चेहरे पर परेशानी की रेखाएँ उभरने लगीं। कारण यह था कि सामने लहराता हुआ समंदर नजर आ रहा था।

वह नहीं समझ पा रही थी कि कार को किधर मोड़े, क्योंकि दूर-दूर तक बस समंदर का पानी ही पानी था। तो अब क्या करे वह? “मैं क्या करूँ, क्या नहीं!” सोचकर घबराते हुए उसने सांताक्लाज की ओर देखा। पर सांताक्लाज तो बिल्कुल बेफिक्र बैठा था। हँसते हुए बोला, “चिंता न करो खुशी, तुम तो बस कार की स्पीड बढ़ाओ। यह जादू वाली कार है। पानी पर भी ऐसे ही दौड़ती है जैसे जमीन पर।” “ऐं, सच्ची! हम डूबेंगे नहीं?” खुशी ने हैरान हो पूछा, “बिल्कुल सच्ची!” सांताक्लाज हँसा। और सचुमच, जैसे ही कार समुद्र के पानी पर चलने लगी, उसकी स्पीड और बढ़ गई। वह बड़े मजे से समुद्र के पानी पर ऐसे दौड़े जा रही थी, जैसे समुद्र का पानी नहीं, दूर-दूर तक कोई समतल मैदान है। समुद्र की ठंडी-ठंडी हवा खुशी के कानों में गुदगुदी कर रही थी। पानी पर जहाज की तरह तेज दौड़ती कार उसे इतनी मजेदार लग रही थी कि बार- बार उसकी हँसी छूट रही थी। कुछ देर बाद समुद्र खत्म हुआ तो खुशी ने चैन की साँस ली। पर यह क्या! यह तो सामने पहाड़ है। खूब ऊँचा और सीधी चढ़ाई वाला पहाड़। अब…? “हाय हाय, अब क्या होगा?” खुशी फिर परेशान। वह पसीने-पसीने थी और सोच रही थी कि सांताक्लाज ने उसे किस मुसीबत में डाल दिया। पर सांताक्लाज हँसते हुए बोला, “स्पीड बढ़ाओ, खुशी।… जल्दी!” और सचमुच मजा आ गया। पहाड़ पर भी कार उसी तरह झटपट – झटपट दौड़ने लगी, जैसे समतल सड़क पर दौड़ रही हो। खुशी ने घड़ी देखी। बोली, “सांताक्लाज, तुमने इस कार से केवल पंद्रह मिनट में हाथी पार्क पहुँचने के लिए कहा था। उसमें अभी दो मिनट बाकी हैं। क्या हम दो मिनट में पहुँच जाएँगे वापस?” “हो – हो – हो…!” सांताक्लाज हँसा। बोला, “क्यों नहीं, जरूर पहुँच जाएँगे। बस खुशी, तुम जरा ऊपर वाला नीला बटन तो दबाओ।” खुशी ने ऊपर उठकर नीला बटन दबाया। मगर यह क्या! नीला बटन दबाते ही कार तो उड़ने लगी। अरे सचमुच, कार उड़ी जा रही थी आसमान में! अब वह हवाई जहाज की तरह तेजी से हवा में तैर रही थी। और दो मिनट पूरे होते ही सांताक्लाज की कार पहुँच गई हाथी पार्क में। हाथी पार्क अब उनींदा सा था। खाली खाली। सर्दियों की शाम घिर आई थी। नीली वर्दीधारी दरबान ने देखा कि तेजी से चलती लाल कार पार्क के अंदर दौड़ी चली आ रही है। वह चिल्लाया, “सुनो सुनो जी, सुनो! कार अंदर नहीं आएगी। अरे लड़की, कार को बाहर ही पार्क करो!” पर वह अपनी बात पूरी करता, तब तक सांताक्लाज और उसकी लाल कार दोनों ही गायब हो चुके थे। खुशी एक गुलाब के फूल के पास खड़ी अचरज से भरकर सोच रही थी, ‘अरे, इतनी जल्दी सांताक्लाज कहाँ चला गया? और उसकी कार …! शायद फिर उसने खिलौना कार अपने लंबे चोगे की जेब में ही छिपा ली होगी।’ खुशी ने ध्यान से देखा कि गुलाब के फूल की एक पँखुड़ी पर एक बड़ी सुंदर सी पीली तितली बैठी है, जिसके बाएँ पंख पर एक काला सा धब्बा नजर आ रहा था। फिर वहाँ एक दाढ़ीदार चेहरा दिखाई दिया, हा-हा-हा हँसता हुआ! उसकी हँसी इतनी दिलखुश थी कि लग रहा था, साथ-साथ वह पीली तितली भी हँस रही है। “जरूर वही होगा सांताक्लाज।” खुशी समझ गई और ‘टा-टा’ करके हँसती हुई घर की ओर चल दी। वह मन ही मन कह रही थी, अरे वाह, सांताक्लाज के साथ कैसी अजब – अनोखी थी यह सैर! मैं घर जाकर मम्मी को बताऊँगी, तो उन्हें कितनी खुशी होगी। खुशी ने घर जाकर मम्मी को सांताक्लाज के साथ इस विचित्र सैर के बारे में बताया तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। बोलीं, “ओ री खुशी! तू क्या दिन में भी सपने देखने लगी है?” पर जब खुशी ने सांताक्लाज के साथ सैर का पूरा किस्सा सुनाया, तो उन्हें भी यकीन करना पड़ गया। नन्ही खुशी ने सोच लिया है कि इस बार आएगा सांताक्लाज तो वह उससे कहेगी कि उसके मम्मी-पापा और सब सहेलियों को भी साथ ले जाए। और इस सैर के बारे में सोचकर खुशी का मन बल्लियों उछलने लगा।