पुराने समय की बात है, उत्तर दिशा में बलवानपुर राज्य था। बलवानपुर का राजा था मलखान। बड़ा शक्तिशाली था मलखान, उसने आसपास के बहुत से राज्यों को जीत लिया था। पर मलखान घमंडी भी बहुत था, वह अपने सामने किसी को कुछ समझता नहीं था। जिससे नाराज हो जाए, उसे नष्ट किए बगैर उसे चैन नहीं पड़ता था।
एक बार की बात, मलखान किसी बात पर चंदापुर के राजा ताराबली से नाराज हो गया। उसी समय उसने अपनी मंत्री को बुलाकर कहा, ”मैं जैसे भी हो, अपने पड़ोसी राज्य चंदापुर को जीतना चाहता हूँ। आप अपनी सलाह दीजिए।”
मंत्री समझदार था। जानता था, चंदापुर को जीतना आसान नहीं है। पर सीधे-सीधे कहता तो राजा मलखान को बुरा लगता। कुछ सोचकर उसने कहा, ”महाराज, मेरा विचार है कि आप अपने तीन भरोसेमंद सलाहकारों को वहाँ भेजिए। वे पता करके आएँ कि चंदापुर की अंदरूनी हालत कैसी है और हम कैसे आसानी से उस पर विजय पा सकते हैं।”
बात राज मलखान को जँच गई। उसने अगले ही दिन अपने तीन सलाहकारों को चंदापुर भेजा। कहा, ”तीन दिनों के भीतर हमें सब कुछ पता करके बताओ।”
तीनों सलाहकार वेश बदलकर चंदापुर में दाखिल हुए। तीनों ने अपना-अपना काम किया और तीसरे दिन रात तक लौट आए।
अगले दिन तीनों सलाहकार दरबार में पहुँचे, तो राजा मलखान ने कहा, ”आप लोग अब झटपट चंदापुर के बारे में हमें बताइए कि उसे कैसे आसानी से जीता जा सकता है?”
सुनते ही तीनों सलाहकारों ने एक सुर में कहा, ”महाराज, चंदापुर पर हमला करने की बात रहने दें। उसे जीतना मुश्किल है।”
राजा मलखान को बड़ा गुस्सा आया। गरजकर बोला, ”आप बताइए, वहाँ ऐसा क्या है?”
इस पर पहले सलाहकार ने कहा, ”महाराज, वहाँ की प्रजा अपने राजा ताराबली को जी-जान से प्यार करती है। ताराबली खुद भले ही भूखा रह जाए, पर उसकी प्रजा में कोई भूखा नहीं रह सकता। अगर आप अपनी प्रजा को उससे ज्यादा प्यार करते हों, तभी चंदापुर पर हमला करें!”
दूसरे सलाहकार ने कहा, ”महाराज, वहाँ एक-एक सैनिक अपने देश पर मर मिटने को तैयार है। रिश्वत नाम की चीज वहाँ नहीं है। मैंने एक सैनिक को हीरे-जवाहरात देकर सेना का अंदरूनी हाल पता करना चाहा, तो उसने कहा कि लगता है, तुम बलवानपुर के हो। वहीं लौट जाओ, ऐसी रिश्वत यहाँ नहीं चलती।”
तीसरे सलाहकार ने कहा, ”वहाँ अथाह दौलत, अथाह धन-धान्य, और अस्त्र-शस्त्रों का विपुल भंडार है। पड़ोस के बहुत से शक्तिशाली राजाओं से चंदापुर के राजा ताराबली ने सैनिक संधि की हुई है। चंदापुर पर हमला किया, तो वे सभी एक साथ हमला करेंगे। अगर आपके पास चंदापुर से ज्यादा मित्र राजा हों, तभी चंदापुर पर आक्रमण करें।”
इस पर राजा मलखान कुछ सोचने लगा। मंत्री ने विनयपूर्वक कहा, ”महाराज, ऐसा नहीं कि हम चंदापुर से किसी मामले में कम हैं। एक से एक बलवान रणबाँकुरे बलवानपुर में हैं। हो सकता है, लड़ाई में जीत हमारी हो। पर इससे दोनों ओर बहुत बर्बादी होगी। इससे क्या यह अच्छा न होगा कि हम चंदापुर की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाएँ तथा एक और एक मिलकर ग्यारह हो जाएँ।”
सुनकर राजा मलखान खुश हो गया। बोला, ”दीवाली आने वाली है। अभी चंदापुर के राजा ताराबली को हमारा निमंत्रण भेजो। वे इस पर्व पर बलवानपुर के खास मेहमान होंगे। हम खुद उनके अच्छे गुणों के कारण उनका अभिनंदन करेंगे!”
राजदरबार में सभी ने तालियाँ बजाकर राजा मलखान की इस घोषणा का स्वागत किया।
कहते हैं, राजा मलखान तब से बदल गया। उसने पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करने की बजाय, अपनी प्रजा की भलाई के कार्यों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। प्रजा भी उसे जी-जान से चाहने और प्यार करने लगी। इसी कारण बलवानपुर के राजा मलखान को आज सभी याद करते हैं।
