Vikram or Betaal Story in Hindi : एक बार फिर राजा विक्रम पेड़ के पास पहुंचा व शव को कंधे पर लादकर चल पड़ा। तब बेताल ने एक और कहानी सुनाई।
किशन नगर के शासक, राजेंद्र अपनी पत्नी के साथ प्रसन्नता पूर्वक रहते थे। वह अपने लोगों के प्रति बड़े दयालु थे तथा बुद्धिमत्तापूर्वक शासन करते थे। विवाह के कई वर्ष बाद उनके यहां एक कन्या ने जन्म लिया। उन्होंने उसका नाम रखा ‘सूर्यमुखी’।
बड़े प्यार से राजकुमारी का पालन-पोषण किया गया। उसे बेहतर-से बेहतर शिक्षा प्रदान की गयी। सूर्यमुखी ने न केवल अच्छी शिक्षा पाई, बल्कि धनुष-बाण व तलवार चलाना भी सीखा।
बीस वर्ष की आयु में, उसके माता-पिता, उसके लिए वर तलाशने लगे, किंतु सूर्यमुखी ने शर्त लगा दी कि वह उसी से विवाह करेगी, जो धनुष-बाण व तलवारबाजी में उससे निपुण होगा और उसे द्वंद्व युद्ध में हरा देगा।
सभी पड़ोसी राज्यों व राजधानियों में मुनादी करवा दी गई। अनेक युवक खूबसूरत राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे। उन्हें लगा कि वे आसानी से उस खूबसूरत युवती को हरा देंगे। प्रतिदिन द्वंद्व युद्ध होते। सूर्यमुखी ने सबको हरा दिया और उन्हें निराश लौटना पड़ा।


उन्हीं दिनों, पड़ोसी राज्य का एक राजकुमार, वेष बदलकर प्रजा के बीच बैठता व राजकुमारों को सूर्यमुखी की चुनौती स्वीकारते देखता। उसने राजकुमारी को लड़ते देख, युद्ध के कई दांव-पेंच सीख लिए।
जल्द ही उसे भरोसा हो गया कि अब वह राजकुमारी की चुनौती ले सकता था और वह एक दिन राजकुमार के असली रूप में आया व राजकुमारी सूर्यमुखी को युद्ध को चुनौती दी। राजकुमारी ने उसे पहचान लिया, किंतु कुछ भी कहे बिना चुनौती स्वीकार कर ली। द्वंद्व युद्ध हुआ और राजकुमार ने उसे हरा दिया, किंतु राजकुमारी ने उससे विवाह करने से इंकार कर दिया। राजा-रानी, राजकुमार समेत सभी उपस्थित व्यक्ति इस निर्णय से हतप्रभ हो गए।

सूर्यमुखी ने उस राजकुमार से कहा :- “तुमने मुझे हरा तो दिया, किंतु माफ करना, मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती। तुम भी मेरे इस इंकार का कारण जानना चाहते हो?”
राजकुमार पल-भर को चुप रहा और फिर राजकुमारी के सामने सिर झुका कर बोला :- “जी, आपने ठीक कहा। मेरा आपसे विवाह करना उचित नहीं है।” कह कर, वह महल से चला गया। वहां मौजूद प्रत्येक व्यक्ति दंग रह गया सभी एक-दूसरे को आश्चर्य से देखने लगे।

बेताल ने कहानी समाप्त कर विक्रम से कहा :- “बता राजा, सूर्यमुखी ने हारने के बावजूद जयंत से विवाह करने से इंकार क्यों किया?” विक्रम ने उत्तर दिया :- “जयंत ने सूर्यमुखी को लड़ते देख कर ही, युद्ध के दांव-पेंच सीखे थे। इस तरह वह उसकी गुरु हुई। तभी जयंत उसे सम्मान देने के लिए झुका था। भारतीय परंपरा के अनुसार गुरु-शिष्य का विवाह नहीं हो सकता। जयंत को अहसास हो गया था कि सूर्यमुखी से विवाह करना नीतिसम्मत नहीं होता।”
जैसे ही विक्रम ने अपना उत्तर समाप्त किया। बेताल उस पर हंसा व शव सहित वृक्ष की तरफ उड़ चला।

