ऐतिहासिक इमारतें ऐसी होती हैं, जो पूरी दुनिया के लोगों को उस देश तक खींच कर ले आती है। मध्य प्रदेश के सांची स्तूप को इन्हीं इमारतों में से एक माना जाता है। लेकिन हां, ये अभी उन ऐतिहासिक इमारतों में शुमार है, जो ताजमहल या कुतुबमीनार की तरह पॉपुलर नहीं हैं। मगर इसकी अहमियत इन इमारतों से कुछ कम बिलकुल नहीं है। साल 1989 में युनेस्को की ओर से इसे विश्व विरासत स्थल का दर्जा मिल चुका है। सांची स्तूप एक बौद्ध स्मारक है। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में बनाए गए इस स्मारक में विदेशियों का रेला सा लगता है, वजह वो भी मानते हैं कि सांची स्तूप दुनिया की बेहतरिन ऐतिहासिक इमारतों में से एक है। इतिहास के पन्नों के हिसाब से बेहद कीमती सांची स्तूप की पूरी कहानी आइए जानें-
सम्राट अशोक की विरासत-
व्यास 36.5 मी. और ऊँचाई लगभग 21.64 मी. वाला सांची स्तूप एक तरह से सम्राट अशोक की विरासत है। क्योंकि वो बौद्ध धर्म को मान चुके थे इसलिए सांची स्तूप को बौद्ध धर्म से जोड़ कर ऐसे भी देखा जा सकता है। अशोक ने इसे तीसरी शती ई पू में सांची स्तूप को बनाया था। उन्होंने इसे बौद्ध अध्ययन और शिक्षा केंद्र के तौर पर बनवाया था। खास बात ये भी है कि सांची स्तूप में बुद्ध के अवशेष मिलते थे। 
सबसे पुरानी शैल संरचना-
सांची स्तूप यूं हीं खास नहीं है। यहां पर देश की वो संरचना है, जिसे सबसे पुरानी शैल संरचना माना जाता है। इस संरचना को महान स्तूप या स्तूप संख्या-1 कहा जाता है। स्तूप के चारों ओर बने तोरण द्वार पर बनी कलाकृतियों को भी भारत की प्राचीन और सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक माना जाता है।
भोपाल से सांची-
रायसेन जिले के छोटे गांव सांची में स्थित सांची स्तूप तक पहुंचने के लिए विदिशा से 10 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है। लेकिन राज्य की राजधानी भोपाल से यहां पहुंचने के लिए 46 किलोमीटर की दूरी पूरी करनी होती है। 
ककनादबोट क्या है-
सांची स्तूप में किसी खास जगह को ककनादबोट कहा जाता होगा, आप यही सोच रहे होंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। सांची में मिले अभिलेखों में सांची स्तूप को ककनादबोट कहा गया है। इस स्तूप को साहस, प्रेम, विश्वास और शांति का प्रतीक माना जाता है।
सांची में ही क्यों बना-
मन में ये सवाल भी उठ सकता है कि इस स्तूप को सांची में ही क्यों बनवाया गया। तो इसकी वजह सम्राट अशोक का रिश्ता था। दरअसल उनकी पत्नी भले ही विदिशा के व्यापारी की बेटी थीं। लेकिन उनका सम्बंध सांची से था। 
संग्रहालय भी बना ऐसे-
1912 से 1919 के बीच में सांची स्तूप में मरम्मत का काम भी कराया गया। सर जॉन मार्शल ने ये काम करवाया और एक संग्रहालय की स्थापना की। 
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