अंदर की बात
आपकी कहानी काफी हद तक फिल्म सुल्तान से मिलती है? आपने सत्यव्रत को अपना जीवनसाथी चुन लिया है?
हंसते हुए। मैंने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। हम कई साल से रोहतक में एक साथ प्रैक्टिस कर रहे हैं। सत्यव्रत कादियान को मैं काफी समय से जानती हूं। सत्यव्रत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीता था।
यह लव मैरिज है या अरेंज्ड?
हमने परिवार को सबसे पहले अहमियत दी है। सत्यव्रत के पिता सत्यवान जी हमारे गुरु हैं। अखाड़े में ही हमारी मुलाकात हुई और प्यार हो गया। इसके बाद हमने शादी का फैसला किया। रियो ओलंपिक में हिस्सा लेने से पहले ही दोनों परिवारों की रजामंदी से शादी तय हो गई थी। सत्यव्रत मेरा खूब ख्याल रखते हैं और जिंदगी के हर कदम पर हौसला बढ़ाते हैं।
शादी से आपके करियर पर कितना असर पड़ेगा? घर-गृहस्थी में तो नहीं सिमट जाएंगी?
शादी का मेरे रेसलिंग करियर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मेरा होने वाला पति बहुत सपोर्टिव है, टोक्यो ओलिंपिक की तैयारियों में मदद करेगा। वह वह मेरे सपनों को अपना समझता है। शादी के बाद मुझे एक अच्छा दोस्त मिल जाएगा।
लडक़ी के लिए कुश्ती का चयन आसान नहीं, आपका रुझान कैसे?
मैं खिलाड़ी बनना चाहती थी, ताकि हवाई जहाज में बैठ सकूं। मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरा साथ दिया। जब मैंने कांस्य पदक जीतने के बाद उनसे बात की तो वे खुशी के मारे रोने लगे। मैंने कहा कि यह जश्न मनाने का समय है।
साक्षी के लिए सबसे मुश्किल दौर कौन-सा था?
रियो तो मेरे लिए किसी सपने का सच होने जैसा रहा। सबसे कठिन समय वह था जब ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतने के लिए जूझती रही। उस समय इतना दबाव था कि पदक के बिना घर लौटना मुश्किल था। रियो में मुझ पर उतना दबाव नहीं था। मैंने सोचा कि हार गए तो क्या हो जाएगा? मैंने बिना दबाव के खेला। बुल्गारिया और स्पेन के शिविर में सभी फोगाट थे और मैं अकेली मलिक लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। गीता दीदी ने ही हमें 2012 में राह दिखाई थी। उन्होंने भारत के लिए पदक जीते और मुझे उनसे प्रेरणा मिली। राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतकर लौटने पर हर कोई मेरे पीछे था, जिससे मैं सो भी नहीं सकी। जब भी सोने जाती तो मेरा भाई या मां कहते कि उठ जा, इंटरव्यू देना है। लोग इंतजार कर रहे हैं, मैंने मजा लिया। हर किसी को यह मौका नहीं मिलता।
पदक जीतने के बाद आप पर पैसों की बरसात होने लगी। इस चकाचौंध में साक्षी खुद को कैसे संभालेगी?
मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि पैसा और पदक जीतने से कोई सफल नहीं होता। अगर मैं देश के लिए कुछ अच्छा करती हूं तो यह मेरे लिए सफलता है, पैसा मिलना और पदक जीतना सफलता नहीं है। हां, इतना जरूर है कि रियो में कांस्य पदक जीतने के बाद मेरी जिंदगी काफी बदल गई। अब पूरा देश मुझे जानने लगा है, लेकिन मेरी जिम्मेदारी बढ़ी है। मैंने आगामी विश्व कुश्ती लीग की तैयारी शुरू कर दी है।
आपको मेडल मिल गया। कैसा था वह क्षण?
मुझे मेडल की अहमियत महसूस करने में काफी समय लगा। जब मैं दिल्ली हवाई अड्डे पहुंची, तो मैंने महसूस किया कि मैंने कितना अच्छा काम किया है। रियो ओलंपिक का अनुभव बहुत अच्छा रहा। मैं वहां विश्व के बड़े जिम्नास्ट और रेसलर से मिली। प्रदेश, शहर और अपने गांव पहुंचने पर जो प्यार लोगों ने दिया है, इसकी तो मुझे उम्मीद भी नहीं थीं। प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों, परिजनों और ग्रामीणों से लेकर सभी ने मुझे बहुत स्पेशल महसूस कराया है। इससे बढक़र तो कुछ और हो भी नहीं सकता है।
अब टोक्यो में अगला ओलंपिक होगा। क्या देश उम्मीद करे कि उसकी बेटी सोने का तमगा लेकर आएगी?
हर देशवासियों की दुआ हो, तो जरूर होगा। सबसे पहले मैं अपनी कमियों को दूर करूंगी। मुझे उम्मीद है कि इन कमियों को दूर करने से टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना आसान हो जाएगा। वैसे भी देश की बेटियों ने साबित कर दिया है कि अगर उन्हें मौके मिले, तो वे बेटों से बेहतर कर सकती हैं।
