प्रतीक्षा भी दो प्रकार की होती है। एक है निराश मन से प्रतीक्षा करना और निराश होते ही जाना। दूसरी है प्रेम में प्रतीक्षा, जिसका हर क्षण उत्साह और उल्लास से भरा रहता है। ऐसी प्रतीक्षा अपने में ही एक उत्सव है, क्योंकि मिलन होते ही प्राप्ति का सुख समाप्त हो जाता है।
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वर्तमान क्षण में रहो – श्री श्री रविशंकर
संसार में जितना भी सृजनात्मक कार्य हुआ है, चाहे वह नृत्य के क्षेत्र में, संगीत में, ड्रामा या चित्रकला के क्षेत्र में, वह सब कुछ किसी अज्ञात शक्ति या केन्द्र से संचालित हुआ। बस सहज रूप से घट गया। तुम उसके कर्ता नहीं हो।
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जीवन का रस है साधना – श्री श्री रविशंकर
साधना तो जीवन का रसास्वादन है। प्रार्थना तुम्हारी जीवन शैली बन जाये। तुम्हारी हर श्वास प्रार्थना बन जाये। तुम्हारा अस्तित्व ही प्रार्थना बन जाए। तुम्हारा चलना, तुम्हारा प्रत्येक कर्म, तुम्हारी चितवन सब प्रार्थना बन जाते हैं।
