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गृहलक्ष्मी की कहानियां – घर जमाई

हरिधन जेठ की दुपहरी में ऊख में पानी देकर आया और बाहर बैठा रहा। घर में से धुआं उठता नज़र आता था। छन-छन की आवाज़ भी आ रही थी। उसके दोनों साले उसके बाद आये और घर में चले गये। दोनों सालों के लड़के भी आये और उसी तरह अंदर दाखिल हो गए, पर हरिधन अंदर न जा सका। इधर एक महीने से उसके साथ यहां जो बरताव हो रहा था और विशेषकर कल उसे जैसी फटकार सुननी पड़ी थी, वह उसके पांव में बेडिय़ां-सी डाले हुए था। कल उसकी सास ही ने तो कहा था- मेरा जी तुमसे भर गया। मैं तुम्हारी जि़ंदगी भर का ठेका लिए बैठी हूं क्या? और सबसे बढ़कर अपनी स्त्री की निष्ठुरता ने उसके हृदय के टुकड़े कर दिए थे।

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