ज्यों-ज्यों रात का अंधेरा बढ़ता गया, बाजार की रौनक कम होती गई। लोग दिन की थकावट दूर करने को अपने-अपने बसेरों से जा मिले। बस्ती पर मौन छाने लगा। इस मौन को तोड़ती हुई एक टैक्सी सराय रहमत उल्लाह के द्वार पर रुकी। संध्या टैक्सी का भाड़ा चुकाकर कल्पना में बढ़ती हुई सराय में जा […]
