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बोझिल पलकें, भाग-34

समय सबसे बड़ा मरहम होता है। यही समय अब अंशु के रूप में अजय के सारे दुखों पर मरहम रखने जा रहा था। अजय को यकीन नहीं हो रहा कि अब जो कुछ उसके साथ हो रहा था, वह सब सपना नहीं, हकीकत है।

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बोझिल पलकें, भाग-27

चन्दानी की कैद में बंद दीवानचन्द अजय की वह दुखती हुई रग थे, जिसके चलते अजय चन्दानी के इशारों पर न सिर्फ आपराधिक कामों को करने पर मजबूर था, बल्कि उसे ये अपराध भी हंसते-मुस्कुराते करने थे। ऐसा ही मौका इस बार भी उसके सामने आ खड़ा हुआ था। अब आगे अंजाम क्या होने वाला था इन सब का?

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बोझिल पलकें, भाग-26

बदले हालात के साथ जहां चन्दानी की नजरों का घेरा अजय पर तंग होता जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ अजय और अंशु के छिपे हुए दिली जज़्बात भी बदल रहे थे। अजय समझ नहीं पा रहा था कि क्या अब भी किस्मत कहीं उस पर रहम कर रही है या खिलवाड़। क्या छिपा था अजय की जिंदगी के अगले मोड़ पर?

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बोझिल पलकें, भाग-22

एक अपराधी की जिंदगी जीने को मजबूर अजय के साथ समय हर कदम पर एक नई चुनौती रख रहा था। नाउम्मीदी से भरी इस जिंदगी में अंशु उसकी एकमात्र उम्मीद थी, लेकिन क्या आज ये उम्मीद भी कोई मोड़ लेने वाली थी?

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बोझिल पलकें, भाग-20

अगर उम्मीद ने अजय का साथ छोड़ दिया था तो अजय ने भी उम्मीद का साथ छोड़ दिया था और अपनी उसी पुरानी अपराध की दुनिया को अपना लिया था, जिससे वह हमेशा भागना चाहता था। वह मजबूर था, अपने फर्ज के हाथों, क्योंकि वह अपने पिता दीवानचन्द को चन्दानी के खूंखार चीतों का निवाला नहीं बनते देखना चाहता था।

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बोझिल पलकें, भाग-19

अंशु तो अपने जीवन की एक तयशुदा धारा में बह रही थी, लेकिन रंधीर की नीच हरकत उसकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल गई। विशाल के लिए उसका सफर तय था, पर अब अजय के सामने वह क्यों ठिठकने को मजबूर हो गई थी?

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बोझिल पलकें, भाग-18

अजय के पिता अपने बंदीघर में उसकी आंखों के ठीक सामने बेबस से खड़े थे, इतने पास कि अजय उन्हें देख सकता है, लेकिन इतने दूर कि अजय उन्हें छू तक नहीं सकता है। एक बाप और बेटे की तड़प और प्यार से भरा था ये लम्हा। दोनों ही को एक-दूसरे की जिंदगी की फिक्र खाए जा रही थी, लेकिन मजबूर दोनों ही थे।

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