सात जन्मों का बंधन यानी शादी। वह सात फेरों के लिए बढ़ाए गए चंद कदमों के बाद एक लडक़ी की पूरी दुनिया बदल सी जाती है। बेटी-बहु और बहन-पत्नी जो बन जाती है। उसके अशियाने से लेकर उसके अस्तित्व तक में बदलाव की निशानियां नजर आने लग जाती हैं। शादी के शुरुआती दौर में यह बदलाव उसके लिए सहज नहीं होते। इनसे तालमेल बिठाने के लिए वह क्या कुछ नहीं करती। कभी वह रिश्तों के बीच खुद को फंसा पाती है तो कभी उसे उम्मीदों की कसौटी पर कसा जाता है। उसके पास कभी खुद को साबित करने की चुनौती होती है तो कभी अपने अस्तित्व को तलाशने की। जिसके चलते उसे तमाम उलझनों, समस्याओं से गुजरना पड़ जाता है। जिसके बारे में उसने शायद कभी सोचा भी नहीं होता है।
पति-पत्नी के बीच नहीं बैठता तालमेल
दो लोगों की सोच, शौक, पसंद एक सी नहीं होती। ऐसा ही कुछ पति-पत्नी के साथ भी मुमकिन है। और अक्सर यह अंतर ही रिश्ते में परेशानियों का कारण बन जाता है। पत्नी से उम्मीद होती है कि वह पति के मुताबिक ही चले। जो हर दफा मुमिकन हो जरूरी नहीं है। नतीजा, मन-मुटाव। कई बार छोटे-छोटे मन-मुटाव, तनाव रिश्तें में खटास ला देते हैं।
रिश्ते आ जाते हैं बीच
वो कहते हैं न कि शादी सिर्फ लडक़े या लडक़ी की नहीं होती बल्कि पूरे परिवार के साथ रिश्ता जुड़ता है। कई बार यह रिश्तें पति-पत्नी के बीच दरार का कारण बन जाता है। जैसे किसी भी परिवार के सदस्य की अतिरिक्त दखलदाजी कभी न कभी रिश्ते पर अपनी काली नजर डाल जाती है। इतने पर ही नहीं बस नहीं होता। इस रिश्ते के जुडऩे के साथ ही लडक़ा और लडक़ी पक्ष भी जुड़ते और इन पक्षों की गुटबाजी यानी यह मेरे घर वाले और ये तुम्हारे यह नजरिया भी पति-पत्नी के रिश्ते को जाने-अनजाने कसैला कर जाता है।
रिश्तें में होती उम्मीदें ज्यादा
पति और पत्नी का रिश्ता सात जन्मों के लिए बंध जाता है। एक ऐसा अटूट रिश्ता जिसे निभाने के लिए वह हर सम्भव कोशिश करते हैं। फिर भी कई बार न चाहते हुए भी उनके बीच का रिश्ता नोंक-झोंक की भंवर में फंस जाता है। चलिए जानते हैं ऐसे ही कुछ छोटे-छोटे मसलों के बारे में
आर्थिक मामले बन जाते हैं बड़े
अर्थ जिंदगी के हर पहलू पर अपना प्रभाव डालता है। शादी भी इससे अछूता नहीं है। लोन, अतिरिक्त खर्चे, अर्थ कमी, आर्थिक मसलों पर तालमेल न बैठ पाना सरीखें कई मसले हैं जो पति-पत्नी की खुशहाल शादीशुदा जिंदगी पर अपना असर डालती है।
फैमली प्लानिंग भी होती है समस्या
अधिकांश दम्पतियों के बीच फैमली प्लानिंग को लेकर एक राय नहीं बन पाती। सामाजिक दबाव के चलते अक्सर महिलाएं पहले बच्चे के बारे में सोचती हैं जबकि पति आर्थिक, मानसिक रूप से मजबूत होने के बाद इस ओर विचार करता है। नतीजा, मतभेद।
वक्त का अभाव बढ़ता है दुष्वारी
दौड़ती भागती जिंदगी में हमारे पास किसी भी चीज के लिए वक्त नहीं है। और यह वक्त की कमी पति-पत्नी के बीच आ जाती है। कभी पति पत्नी के लिए वक्त नहीं निकाल पाता और कभी पत्नी अपने जिम्मेदारियों के चलते पति को वक्त नहीं दे पाती। जिसके चलते कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।
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