नारी को अखण्ड सुहाग देने वाला करवाचौथ का व्रत सुहागिनों का सबसे बढ़ा पर्व है। पहले यह व्रत मुख्यत: उत्तरी भारत में मनाया जाता था। लेकिन आज देश के सभी भागों में इस व्रत का जबर्दस्त आकर्षण एवं उल्लास नजर आता है।

भारतीय संस्कृति में जप, तप, व्रत का बहुत महत्त्व है। प्यार और विश्वास की अभिव्यक्ति से जुड़ा ऐसा ही एक व्रत है करवा चौथ। हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आने वाला तथा भारतीय नारी को अखण्ड सुहाग देने वाला करवाचौथ का व्रत सुहागिनों का सबसे बड़ा पर्व है। पहले यह व्रत मुख्यत: उत्तरी भारत में मनाया जाता था। लेकिन आज देश के सभी भागों में इस व्रत का जबर्दस्त आकर्षण एवं उल्लास नजर आता है। अब विदेशों में भारतीयों की संख्या में वृद्धि होने के कारण वहां भी करवाचौथ एक जाना-माना पर्व बन गया है।

 

‘करवे’ का विशेष महत्व

‘करवे’ का अर्थ है- मिट्टी का बर्तन और’चौथ’ का अर्थ है- चतुर्थी। करवाचौथ का व्रत सुहागिन स्त्रियां रखती हैं तथा अपने पति की लम्बी आयु और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। करवाचौथ पर ‘करवे’ का विशेष रूप से पूजन किया जाता है। स्त्री धर्म की मर्यादा ‘करवे’ की भांति ही होती है। जिस प्रकार ‘करवे’ की सीमाएं हैं, उसी प्रकार स्त्री धर्म की भी अपनी सीमाएं हैं।

 

 

पूजन-विधि

 

रात्रि बेला में भगवान शिव, मां पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, श्री गणेश, चंद्रदेव एवं सुहाग के सभी सामान की पूजा का विधान है। सर्वथम पट्टे पर जल से भरा लोटा रखें। मिट्टी के एक करवे में गेहूं और ढक्कन में चीनी व सामर्थ्यानुसार पैसे रखें। रोली,चावल, गुड़ आदि से गणपति जी की पूजा करें। रोली से करवे पर स्वास्तिक बनाएं और 13 बिंदियां रखें। स्वयं भी बिंदी लगाएं और गेहूं के 13 दाने दाएं हाथ में लेकर कथा सुनें। कथा सुनने के बाद अपनी सासु मां के चरण स्पर्श करें और करवा उन्हें दें।

दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इसे वर कहते हैं। चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता है। आठ पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं। चावल के आटे के घोल से चौक पूरे और उस पर गौरी माता को रख कर पूजा करें।

पानी का लौटा और गेहूं के दाने अलग-अलग रख लें। रात्रि में चंद्रदोय होने पर पानी में गेहूं के दाने डालकर उससे अर्घ्य दें और फिर भोजन करें। यदि व्रत कथा पंडिताइन से सुनी हो तो गेहूं, चीनी और पैसे उसे दे दें नहीं तो किसी कन्या को दान कर दें।

 

आगे पेज पर जानिए कैसे हुई थी इस व्रत की शुरुआत और किस मंत्र का करें जाप…  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ऐसे हुई थी व्रत की शुरुआत

विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसार करवाचौथ के व्रत का उद्गम उस समय हुआ था जब देवों और दानवों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था और युद्ध में देवता परास्त होते नजर आ रहे थे। तब देवताओं ने ब्रह्मा जी से इसका कोई उपाय करने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने देवताओं की करुण पुकार सुनकर उन्हें सलाह दी कि अगर आप सभी देवों की पत्नियां सच्चे और पवित्र हृदय से अपने पतियों के लिए प्रार्थना एवं उपवास करें तो देवता दैत्यों को परास्त करने में सफल होंगे। ब्रह्मा जी की सलाह मानकर सभी देव पत्नियों ने कार्तिक मास की चतुर्थी को व्रत किया और रात्रि के समय चंद्रोदय से पहले ही देवता युद्ध जीत गए। तब चंद्रोदय के पश्चात् दिन भर से भूखी-प्यासी देव पत्नियों ने अपना-अपना व्रत खोला। ऐसी मान्यता है कि तभी से करवाचौथ व्रत किए जाने की परंपरा शुरू हुई।

संकल्प मंत्र

 

मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्रादिसुस्थिर
श्री प्राप्त करक चतुर्थीव्रतमंह करिष्ए।।

 

 

उपरोक्त मंत्र से संकल्प लेकर व्रत का प्रारंभ करके सर्वथम गणेश जी, भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय तथा चन्द्रमा की पूजा की जाती है। इसी समय सुहागिनें कुछ नैवेद्य भी खाती हैं। इसे ‘सरगी’ कहते हैं। इसके बाद सारा दिन निर्जल व्रत रखने के बाद रात्रि को चंद्रमा के दर्शन कर, अर्घ्य देकर अपने पति के दर्शन करके ही व्रती स्त्री अन्न-जल ग्रहण करती है। कुछ लोग इस दिन महागौरी तथा महालक्ष्मी दोनों का पूजन भी करते हैं।

सोलह श्रृंगार

भारतीय स्त्री के साज-श्रृंगार को उसके सुहाग का प्रतीक माना जाता है। यह साज-श्रृंगार नारी के रूप में चार-चांद लगा देता है। सदियों से महिलाएं अपने सौन्दर्य-आकर्षण को बढ़ाने के लिए इन गहनों जैसे मांग में सिंदूर, माथे पे बिंदिया, कानों में झुमके, नाक में नथनी, गले में मंगलसूत्र, हाथों में चूडिय़ां, बाजूबंद, अंगूठियां, पैरों में बिछुए, पायल आदि का प्रयोग करती हैं। यह गहने शरीर की बाहरी सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ शरीर के प्रत्येक अंग पर कोई न कोई वैज्ञानिक भाव भी डालते हैं।

करवा बांटना

शाम के वक्त सोलह श्रृंगार से सजी सखियों, देवरानियों-जेठानियों और पड़ोस की महिलाओं के साथ थाली बांटने से पहले पंडिताइन मिट्टी की बीरो कुड़ी बनाती है। मिट्टी की इस गुडिय़ा को महिलाओं के गोल घेरे के बीच में रखा जाता है और सभी महिलाएं व्रत की कथा सुनने और थाली बांटने से पहले बीरो कुड़ी को याद करते हुए,’ले बीरो कुड़िए करवड़ा, ले सर्व सुहागन करवड़ा…..’ का उच्चारण करती हैं।

(साभार – साधनापथ) 

 

 

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