रस्सी कूदते-फांदते, गुड्डे-गुडिय़ा से खेलते हुए कब बचपन ने किशोरावस्था की दहलीज पर दस्तक दे दी, मालूम ही नहीं हुआ। अहसास की सुई तब चुभी जब बड़ों के डू और डोंट्स के आदेश मिलने लगे। उनके इस अचानक बदलाव को पहचानने की न हमारी पैनी दृष्टि थी और न चाहत। हां, अल्हड़ता में टोका-टाकी से खीज अवश्य आ जाती थी। भोली-भाली मां में ग्रेट चेंज- तौबा-तौबा!
इसके पश्चात हमारी सखियों की लिस्ट तैयार हुई। कौन हमारे दिल के करीब हैं और कौन जस्ट सो सो! बहुत बातूनी और फैशनेबल लड़कियां आउट। दादी का विचार था कि इनकी सोहबत हमें शिष्टता से दूर ले जाएगी। सच मानना लिस्ट से आउट सहेलियां हमें बेहद प्रिय थीं। गप्पें मारने में ही तो मजा आता था। फैशन से इंसान कितना स्मार्ट बनता है, यह उन्हें कैसे समझाते?
शायद चुनाव के समय कैंडीडेट चुनते समय भी इतनी तत्परता न दिखाई जाती हो जितनी गुड फ्रेंड्स समझने में। इसके लिए खुशमिजाज सादगी को परमोधर्म समझने वाली सुकन्याओं से घुलने-मिलने का परमानेंट परमिट मिल गया था। अगर वे पढ़ाकू हैं तब तो एक्सीलेंट! स्टडी में हम भी अच्छे खासे थे, इज्जतदार अंक प्राप्त कर लेते थे। पर हमेशा किताबी कीड़ा बना रहना हमारे टेस्ट के खिलाफ था। कुछ इधर-उधर की चटपटी खबरें भी हमें रोचक लगती थीं।
किशोरावस्था की जब कायापलट युवावस्था में हुई तब एक नया मुद्दा उठा घर में कौन-कौन सी पत्रिकाएं आएं? अंत में वोट पड़े पारिवारिक, नैतिक पत्रिकाओं के पक्ष में। रंग-बिरंगी मैग्जीनें पृष्ठ पलटने के बाद ड्राइंगरूम की मेज पर खूब सजती थीं।
स्कूल से घर तक का बस का सफर हमारा फिल्मी ज्ञान बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। इतनी स्पीड से अगर हमने मैथ्स के फार्मूले याद किए होते तो सच में गोल्ड मैडल हमारे घर की शोभा बढ़ाता। एक दिन मां ने पूछा, घर में तो कोई फिल्मी पत्रिका आती नहीं है पर तुम्हें फिल्म जगत की बहुत जानकारी है। हम इस रहस्य को गुप्त ही रहने देना चाहते थे- इसलिए मंदमंद मुसकाने में ही खैर थी। वरना स्कूल तक हर रोज पद यात्रा का आनंद उठाने को बाध्य होना पड़ता।
अपनी मित्र के घर जाने की अनुमति दफ्तर के अवकाश की तरह जरा मुश्किल से ही मिल पाती थी। एक दो दिन पहले से मां-पापा की चमचागिरी शुरू करनी पड़ती थी। कहां जाना है, किस के घर जाना है, कब आओगी? आदि अनेक इंटरव्यू के प्रश्नों के घेरे से गुजरना पड़ता था। अनुमति मिलने की एक शर्त भी होती- अगर जाना है तो दस साल बड़े भाई को साथ ले जाना होगा। छोटा भाई लेफ्ट-राइट करता हुआ, हमारा बॉडी गार्ड बना साथ-साथ जुड़ा रहता। अगर रास्ते में कोई कुत्ता भौंकने लगता तो वह डर कर हमारा हाथ थाम लेता। ऐसा था हमारा सिक्यूरिटी गार्ड! पर घर वालों को हमारी सुरक्षा की चिंता मानो खत्म हो जाती थी।
लड़की होने के नाते हमें परिवार के स्त्री पक्ष से अक्सर सुनने को मिलता कि हमें पराए घर जाना है। इसलिए वे हमें एक आदर्श सांचे में ढालने के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देती थीं। पापा ने, भाई ने अगर हमारे प्रति नरम रुख अपनाया तो फौरन मां की आवाज सुनाई देती- इसे दूसरे के घर जाना है। अगर काम करने का सलीका नहीं आया तो नाम तो मेरा बदनाम होगा। और हम बेचारे ऐसे मौकों की नाजुकता का लाभ उठाते हुए, पापा के दल में जा मिलते।
पूरे साल हम लंबी गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार करते। अभी अवकाश शुरू भी नहीं होता कि घर में आॢडनेंस पास हो जाता- एक वक्त का भोजन पकाने की ट्रेनिंग का। सुबह एक घंटा सिलाई-कढ़ाई स्कूल भी जाना होगा। मर गए- हमने सोचा था सुबह आराम से सो कर और शाम को अपनी सखियों से गपशप-खेलकूद में वक्त गुजारेंगे।
हम शुक्रगुजार होते थे उन मेहमानों के जो गर्मियों की छुट्टियां बिताने हमारे घर पर आते थे। ऐसे में उस स्ट्रिक्ट टाइमटेबल से कुछ रियायत मिल जाती थी।
आज जब मैं एक किशोर बेटी की मां बनी, तो अचानक मुझ में अपनी मां का स्वरूप झलकने लगा- वही हिदायतें, वे ही आर्डिनेंस, नियम आदि। और अपनी बिटिया में मेरा अपना स्वरूप नजर आने लगा।
माता-पिता द्वारा कही अनकही बातें हमारे में कितने संस्कार डाल देती हैं उनका अहसास पगपग पर होता है। दो पीढिय़ों का अंतर हमेशा बना रहता है।
जी चाहता है इन संस्कारों के लिए अपने अम्मा-पापा को शुक्रिया कहूं, पर मेरी इस आवाज को सुनने के लिए वे इस दुनिया में नहीं हैं। काश यह पहले किया होता?
