Lord Shiva: संस्कृत में शिव का व्यापक अर्थ है- कल्याणकारी और शुभकारी। ‘शि’ जो पापों का नाश करने वाला है, ‘व’ का अर्थ देने वाला अर्थात दाता है। जो लोग शिव की उपासना करते हैं। वे धन्य हैं, कृतार्थ हैं। उनका देहधारण सफल होता है तथा उनके समस्त कुल का उद्धार हो जाता है। जिनके मुख में भगवान शिव का नाम है, जो अपने मुख से सदाशिव और शिव का नाम का उच्चारण करते हैं, पाप उनको स्पर्श नहीं कर सकती। जैसे खदिर वृक्ष की लकड़ी को हवन, यज्ञ और अनुष्ठान इत्यादि में प्रयोग करने से समस्त समस्याओं का निदान हो जाता है, वैसे ही मात्र श्रीशिवाय नमस्तुभ्यम् कहने से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
शिव का नाम, विभूति तथा रूद्राक्ष ये तीनों त्रिवेणी के समान परम पुण्यमय जाने जाते हैं। जहां यह तीनों वस्तुएं सर्वदा रहती है उसके दर्शन मात्र से मनुष्य त्रिवेणी स्नान का फल पा लेता है। भगवान शिव का नाम गंगा और विभूति को यमुना तथा रूद्राक्ष को सरस्वती कहा गया है। इन तीनों की संयुक्त त्रिवेणी समस्त पापों को नाश करने वाली होती है। शिव के इस नामरूपी दावानल से महान पातकरूपी पर्वत अनायास ही भस्म हो जाते हैं। जो मनुष्य इस भूतल पर सदा भगवान शिव के नामों के जप में लगा रहता है वह वेदों का ज्ञाता और विद्वान माना जाता है। जो शिवनाम रूपी नौका पर आरूढ होकर संसाररूपी समुद्र्र को पार करते हैं, उनके जन्म मरणरूप संसार के मूलभूत वे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। जिसके मन में भगवान शिव के नाम के प्रति कभी खंडित न होने वाली असाधारण भक्ति प्रकट है उसी के लिए मोक्ष सुलभ है।
रूद्र्राक्ष शिव को बेहद प्रिय है। रूद्राक्ष के दर्शन से, स्पर्श से तथा उस पर जप करने से समस्त पापों का अपहरण हो जाता है। रूद्राक्ष की महिमा के बारे में भगवान शिव एक बार पार्वती के सामने बताने लगे कि ‘पूर्वकाल की बात है। मैं मन को संयम में रखकर हजारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या में लगा रहा। एक दिन सहसा मेरा मन क्षुब्ध हो गया। मैं समस्त लोकों का उपकार करने वाला स्वतंत्र परमेश्वर हूं। अत: उस समय मैंने लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले। खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटों से कुछ जल की बूंदे गिरी। आंसू की उन बूंदों से वहां रूद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गया। भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए वे अश्रुबिंदु स्थावरभाव को प्राप्त हो गये। वे सभी रूद्राक्ष विष्णुभक्त और चारों वर्गों के लोगों को बांट दिए। भूतल पर अपने प्रिय रूद्राक्ष को गौड़ प्रदेश में उत्पन्न किया।
शिव के अनेक अवतार हुए। पहला अवतार ‘महाकाल नाम से प्रसिद्ध हुए। जो सत्पुरुषों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। दूसरा ‘तार’ नामक अवतार हुआ, जिसकी शक्ति तारादेवी हीब। वे दोनों भुक्ति मुक्ति के प्रदाता तथा अपने सेवकों के लिए सुखदायक है। ‘बाल भुवनेश नाम से तीसरा अवतार हुआ। उसमें बाला भुवनेशी शिवा शक्ति हुई जो सज्जनों को सुख देनेवाली है। चौथा भक्तों के लिए सुखद तथा भोग मोक्षप्रदायक ‘षोडश श्रीविद्येश’ नामक अवतार हुआ और षोडशी श्रीविद्या शिवा उसकी शक्ति हुई। पांचवा अवतार ‘भैरव’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। जो सर्वदा भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है। इस अवतार की शक्ति का नाम है भैरवी गिरिजा, जो अपने उपासकों की अभिष्ट दायिनी है।
छठा अवतार शिवावतार ‘छिन्नमस्तक नाम से कहा जाता है और भक्त कामप्रदा गिरजा का नाम छिन्नमस्ता है। संपूर्ण मनोरथो के दाता शंभु का सातवां अवतार ‘धूमवान नाम से विख्यात हुआ। उस अवतार में श्रेष्ठ उपासको की लालसा पूर्ण करने वाली शिवा धूमावती हुई। शिवजी का आठवां सुखदायक अवतार ‘बगलामुख’ है। उसकी शक्ति महान आनंददायिनी बगलामुखी नाम से विख्यात हुई। नवां अवतार ‘मातंग नाम से कहा जाता है। उस समय संपूर्ण अभिलाषाओं को पूर्ण करनेवाली शर्वाणी मातंगी हुई। शंभु के भुक्ति मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले दसवें अवतार का नाम ‘कमल है, जिसमें अपने भक्तों का सर्वथा पालन करनेवाली गिरिजा कमला कहलाई। ये सभी शिव जी के अवतार हैं। जो लोग महात्मा शंकर के इन दसों अवतारों का निर्विकार भाव से सेवा करते हैं, उन्हें ये नित्य नाना प्रकार के सुख देते रहते हैं।
