ढाका के लालबाग किले से लगभग 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित है 800 साल पुराना ढाकेश्वरी मंदिर। यह बांग्लादेश में हिंदू संस्कृति और आस्था का प्रमुख केंद्र है। विभाजन पूर्व यह मंदिर संपूर्ण भारत के प्रमुख मंदिरों में से एक था। लेकिन अब भी न सिर्फ बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू समाज बल्कि भारतीय हिंदुओं के लिए भी यह श्रद्धा का केंद्र है। मान्यता है कि ढाकेश्वरी देवी के नाम पर ही ढाका का नामकरण किया गया। ‘ढाकेश्वरी’ का अर्थ है ‘ढाका की देवी। ढाका की देवी को देवी दुर्गा की आदिशक्ति माना जाता है। 1996 में ढाकेश्वरी मंदिर को बांग्लादेश का राष्ट्रीय मंदिर घोषित किया गया और इसका नाम बदलकर ढाकेश्वरी जाटीय मंदिर (राष्ट्रीय मंदिर) रखा गया।

यह बांग्लादेश में हिंदू संस्कृति एवं धर्म-अध्यात्म के प्रमुख केंद्र के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता है और यह संभव हो सका बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू समाज के एक प्रमुख आंदोलन के फलस्वरूप, जो 1988 में इस्लाम को राजकीय धर्म के रूप में घोषित करने पर हिंदू रीति-रिवाज से पूजा-पाठ के लिए आधिकारिक तौर पर एक प्रमुख स्थल की मांग कर रहे थे। फलस्वरूप इस मंदिर पर राज्य का स्वामित्व है और हर सुबह प्रमुख मंदिर के बाह्य’ परिसर में बांग्लादेश का ध्वज फहराया जाता है। यह राष्ट्रीय ध्वज संहिता के नियमों का पालन भी करता है, जैसे- राष्ट्रीय शोक दिवस होने पर यह आधा झुका हुआ होता है। यह मंदिर हिंदुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र तो है ही, साथ ही यह बांग्लादेश में हिंदुओं का सबसे बड़ा मंदिर भी है।
ढाकेश्वरी का ऐतिहासिक पक्ष
800 साल पहले इस मंदिर का निर्माण सेन राजवंश के राजा बल्लाल सेन ने 12वीं सदी में करवाया था। ढाका नाम की उत्पत्ति भी इसी नाम पर हुई। किंतु यह मंदिर कई बार क्षतिग्रस्त किया जा चुका है, जिस कारण इसके कई भवन नष्ट हो चुके हैं। 1971 में बांग्लादेश-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इस मंदिर को भारी क्षति पहुंची थी और आधे से अधिक भवन नष्ट कर दिए गए थे। मुख्य पूजा हॉल को पाकिस्तानी सेना ने अपने कब्जे में लेकर गोला-बारुद के भंडारण के तौर पर प्रयोग करते थे। इसके बाद भी मुस्लिम भीड़ द्वारा 1989-92 के दौरान मंदिर फिर से क्षतिग्रस्त किया गया। मंदिर का कई बार पुनरुद्धार किया जा चुका है। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार ढाकेश्वरी मंदिर की गिनती 51 शक्तिपीठों में की जाती है। यहां देवी सती के आभूषण गिरे थे। किंतु इस तथ्य को स्थापित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य का अभाव है। देवी आराधना के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में मां दुर्गा की मूल प्रतिमा की बजाय उसकी प्रतिकृति है। मां दुर्गा की 800 साल पुरानी मूल प्रतिमा को भारत के पश्चिम बंगाल के कुमारतुली ले जाया गया था।
नवरात्र में गूंजते हैं मां के जयकारे

नवरात्र के दौरान इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। बीते जमाने में चैत्र माह में ही ढाकेश्वरी मंदिर के प्रांगण में त्योहारों का आयोजन होता था। वर्तमान परित्क्ष्य में चैत्र एवं शारदीय नवरात्र के दौरान सष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी के पवित्र अनुष्ठïनों के बाद विजयादशमी को पांच दिवसीय उत्सवों के साथ इसका समापन होता है। प्रत्येक वर्ष ढाका में दुर्गा पूजा का भव्य उत्सव ढाकेश्वरी मंदिर में आयोजित किया जाता है। कई हजार उपासक यहां माता के दर्शन को आते हैं। साथ ही बड़ी संख्या में दर्शकों का भी जमावड़ा होता है, जिसमें मुसलमान भी शामिल होते हैं। चाहें श्रद्धालु आएं या फिर दर्शक या पर्यटक, सभी को सामान्यत: चावल-दाल का प्रसाद दिया जाता है। यह मंदिर भक्तों के लिए हर दिर खुला रहता है। यहां दुर्गा पूजा पांच दिनों तक होता है। पांचवे दिन मां दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियों को नदी में विसर्जन हेतु ले जाया जाता है। दुर्गा पूजा समाप्त होने के बाद मंदिर के पास ही मैदान में ‘बिजया सम्मेलन’ नामक सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन होता है। यह ढाका का प्रमुख सांस्कृतिक आयोजन है, जिसके आकर्षण में ढाका के संगीत एवं फिल्म उद्योग के शीर्ष कलाकार भी नियमित रूप से खींचे चले आते हैं।
पूजा मंडप भी बढ़ाते हैं रौनक

ढाका में कुछ स्थानों पर कई वर्षों से नवरात्र के अवसर पर दुर्गा जी के भव्य मंडप भी बनाए जाते हैं। काला बागान, गुलशन बनानी, रामकृष्ण मिशन मठ, शाखारी बाजार आदि प्रसिद्ध मंडप हैं। कुछ पूजा-पंडालों और मंडपों में मेले भी लगते हैं। नजारा कमोबेश वैसा ही होता है जैसा भारत में। पूजा के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है। काला बागान पूजा मंडप ढाका के सबसे बड़े मंडपों में से एक है। काला बागान फील्ड ग्राउंड में यह मंडप तैयार किया जाता है, जहां मां दुर्गा की भव्य मूर्ति स्थापित की जाती है और लोक कलाकारों की उपस्थिति इसे और भी समृद्ध करती है। यहां के सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र हैं। जैसे-जैसे रात बीतती है, मंडप की रौनक भी बढ़ती जाती है और भीड़ भी। गुलशन बनानी पूजा मंडप भी इस दौरान हिंदू श्रद्धालुओं और दर्शकों से भरा रहता है। यहां भी मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाती है और कई प्रसिद्ध हस्तियां मंडप की शोभा बढ़ाते हैं।
सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों का भी केंद्र
ढाकेश्वरी मंदिर सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों का भी बड़ा केंद्र है। सिर्फ दुर्गा पूजा ही नहीं जन्माष्टïमी भी यहां धूमधाम से मनाई जाती है। जन्माष्टमी की शोभा यात्रा भी इसी मंदिर से निकलती है और फिर पुरानी ढाका की गलियों से गुजरती है। इस दिन बांग्लादेश में सरकारी अवकाश भी होता है। इस मंदिर में वर्ष भर दान-पुण्य कार्यक्रम चलते रहते हैं। प्रतिवर्ष ढाकेश्वरी मंदिर की तरफ से रक्तदान, बाढ़ राहत, टीकाकरण आदि सामाजिक कार्यों का भी संचालन होता है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मंदिर होने के कारण देश के जाने-माने एवं प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों का जन्मदिन एवं पुण्यतिथि पर विशेष पूजा-पाठ का भी यहां चलन है।
मुस्लिम बहुल देश बांग्लादेश में भी देवी आराधना के सब रंग दिखाई देते हैं। यहां विविधता भी है, दान-पुण्य भी है और हंसी-खुशी का माहौल भी। साथ ही भारतीय हिंदुओं के समान ही वही भक्ति है, वही उल्लास है और वही श्रद्धा भी।
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