tum mujhe nahin pakad sakate
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Hindi Immortal Story: “इस देश की जनता ढाल बनकर मेरे आगे खड़ी है। वही मुझे अंग्रेजों के शिकंजे से बचाएगी। मैं भारत की बेटी हूँ और इस देश की सारी जनता मेरे साथ है। हर घर में मेरे लिए सुरक्षित आश्रय है। मैं अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देती हूँ कि वह मुझे पकड़कर दिखाए।”

वह बहादुर स्त्री ललकार रही थी और अंग्रेजी शासन के हाथ-पार फूले हुए थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि सन बयालीस के भारत छोड़ो आंदोलन में आँधी बनकर पूरे देश में विद्रोह की लहर पैदा कर देने वाली इस बहादुर स्त्री को कैसे जेल में डालें। सचमुच उसके पास भारत के करोड़ों लोगों की देशभक्ति की भावनाओं का बल था। वह पूरे देश में स्वाधीनता संग्राम की मशाल जलाते हुए घूम रही थी और अंग्रेज चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। इसलिए कि वह कब, कहाँ छिप जाती है, और फिर कैसे चमत्कार की तरह कहीं भी प्रकट हो जाती है, यह समझ पाना अंग्रेज शासकों के बस की बात नहीं थी।

भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली यह बहादुर स्त्री थी अरुणा आसफ अली, जिसे सारा देश प्यार करता था। और सन बयालीस के आंदोलन में तो वह देशभक्ति की भावनाओं का प्रतीक बन चुकी है। अंग्रेजों को चकमा देकर यहाँ से वहाँ निकल जाना और जगह-जगह स्वतंत्रता की मशाल को जलाना उसका ऐसा कारनामा था, जिसने पूरे देश में जागृति की लहर पैदा कर दी थी।

बंगाल के एक इज्जतदार घराने में जन्मी अरुणा बचपन से ही बड़े खुले स्वभाव की थीं जिनके मन में कुछ करने, कुछ बनने की गहरी ललक थी। बड़े होने पर उनका व्यक्तित्व और भी निखर आया। वे सुंदर और मेधावी भावप्रवण युवती थीं जिनके व्यक्तित्त्व और सरल बातों का सुनने वालों पर गहरा असर पड़ता था।

अंग्रेजों का अत्याचार देख, मन ही मन वे दुखी थीं, पर उन्हें कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था। तभी एक ऐसा संयोग बना कि उनके जीवन की धारा ही बदल गई। उन्हें अपने सामने एक बड़ा लक्ष्य दिखाई देने लगा। हुआ यह कि वे इलाहाबाद में वे अपनी बहन के यहाँ कुछ दिन रहने के लिए गईं। वहीं उनकी मुलाकात बैरिस्टर आसफ अली से हुई। आसफ अली अंग्रेजी के विद्वान तथा बड़े खुले और उदार विचारों के व्यक्ति थे। उन्हें नए विचारों और देशभक्ति की भावनाओं से छलछलाती यह युवती भा गई और अरुणा भी अपने से कई वर्ष बड़े आसफ अली के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रहीं। आखिर दोनों ने विवाह करने का निर्णय किया।

अरुणा के परिवार वालों ने इस विवाह का घोर विरोध किया। पर अरुणा के दृढ़ व्यक्तित्व पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। वे एक बार जो तय कर लेती थीं, उससे कभी पीछे नहीं हटती थीं। उन्होंने आसफ अली के व्यक्तित्व में छिपी सुंदरता को परख लिया था और उनकी उदारता और विशाल हृदयता को भी। तब भला कौन उन्हें अपने निश्चय से डिगा सकता था?

अरुणा के पति आसफ अली कांग्रेस में खासे सक्रिय थे। वे स्वयं भी अपने पति के कामों में आगे बढ़कर हाथ बँटाया करती थीं। पर नमक सत्याग्रह के दौरान जब आसफ अली को गिरफ्तार कर लिया गया, तो अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ अरुणा का गुस्सा प्रखर होकर फूट पड़ा। वे पूरे जोर-शोर से स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ीं। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और साल भर के लिए लाहौर जेल में बंद कर दिया गया।

जेल की सजा काटने के बाद अरुणा लौटीं, तो उनके भीतर देशभक्ति की आँधी और अधिक जोर से मचल रही थी। जेल में भारत की गरीब जनता की असलियत देख लेने के बाद उनकी यह भावना और अधिक दृढ़ हो गई।

पर अरुणा तो जोश की आँधी पर सवार थीं। इसलिए गाँधी जी के चरखे और कताई की बात उन्हें पसंद नहीं थीं। उनका कहना था कि अंग्रेजों के खिलाफ हमें सीधी-सीधी लड़ाई छेड़नी पड़ेगी। इसके बिना वे यहाँ से जाने वाले नहीं हैं। इसके लिए देश की सोई हुई जनता को जगाना और लोगों में सच्चा विद्रोह उत्पन्न करना जरूरी है।

अरुणा के भीतर देशभक्ति का ज्वार था, जो फूट पड़ना चाहता था। यही कारण है कि सन् 1942 में महात्मा गाँधी और अन्य बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन की बागडोर को आगे बढ़कर सँभाल लिया और जनता का सही नेतृत्व किया।

सन् 1942 के मुंबई कांग्रेस अधिवेशन में अंग्रेजी दमन के कारण नेता कांग्रेस का झंडा फहराने में संकोच कर रहे थे। पर निर्भीक अरुणा ने आगे बढ़कर कांग्रेस का झंडा लहरा दिया। इस पर अंग्रेज सैनिकों का क्रोध फट पड़ा। उन्होंने जनता को रौंदना और पीटना शुरू किया। उस झंडे को एक सारजेंट ने पैरों तले कुचल दिया। उसी समय अरुणा ने संकल्प किया कि वे तब तक चैन नहीं लेगीं, तब तक अंग्रेज इस देश को छोड़कर नहीं चले जाते।

स्वाधीनता संग्राम की आग को प्रज्ज्वलित रखने के लिए अरुणा आसफ अली ने घूम-घूमकर जनता को जागरूक किया। उन्हें पकड़ने के लिए सीआईडी का जाल बिछा दिया गया था। पर अरुणा किसी की पकड़ में न आ सकीं। वे लोगों के घरों में जाकर रुकतीं और जिसके भी घर में पहुँच जातीं, वहाँ लोग उन्हें अपने घर के सदस्य की तरह शत्रु की छाया से बचाकर रखते। फिर भला उनका बाल बाँका कैसे हो सकता था!

आखिर देश स्वतंत्र हुआ और अरुणा आसफ अली की प्रतिभा और योगदान को सभी ने खुलकर स्वीकार किया।

अरुणा आसफ अली ने साबित कर दिया कि महिलाएँ चाहें तो आँधी और भूचाल भी बन सकती हैं। जब वे देश की आजादी और विद्रोह का झंडा लेकर बढ़ती हैं, तो उनके साथ-साथ हजारों लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं हर तरफ जलजला पैदा हो जाता है।

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)