Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

महातीर्थ – मुंशी प्रेमचंद

मुंशी इंद्रमणि की आमदनी कम थी और खर्च ज्यादा। अपने बच्चे के लिए दाई का खर्च न उठ सकते थे। लेकिन एक तो बच्चे की सेवा-शुश्रूषा की फिक्र और दूसरे अपने बराबर वालों से हेठी बनकर रहने का अपमान, इस खर्च को सहने पर मजबूर करता था। बच्चा दाई को बहुत चाहता था, हरदम उसके […]

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बैर का अन्त – मुंशी प्रेमचंद

रामेश्वर राय अपने बड़े भाई के शव को खाट से नीचे उतारते हुए छोटे भाई से बोले – तुम्हारे पास कुछ रुपये हो तो लाओ, दाह-क्रिया की फिक्र करें। मैं बिलकुल खाली हाथ हूं। छोटे भाई का नाम विश्वेश्वर राय था। वह एक जमादार के कारिंदा थे, आमदनी अच्छी थी। बोले – आधे रुपये मुझसे […]

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फातिहा – मुंशी प्रेमचंद

सरकारी अनाथालय से निकलकर मैं सीधा फौज में धरती किया गया। मेरा शरीर हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ था। साधारण मनुष्यों की अपेक्षा मेरे हाथ-पैर कहीं लंबे और स्नायुयुक्त थे। मेरी लम्बाई पूरी छह फुट नौ इंच थी। पल्टन में ‘देव’ के नाम से विख्यात था। जब से मैं फौज में भरती हुआ, तब से मेरी किस्मत […]

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ज़िहाद – मुंशी प्रेमचंद

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रवेश से भागा चला आ रहा था! मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न […]

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शंखनाद – मुंशी प्रेमचंद

भानु चौधरी अपने गांव मुखिया थे। गांव में उनका बड़ा मान था। दारोगाजी उन्हें ठाट बिना जमीन पर न बैठने न देते। मुखिया साहब की ऐसी धाक बंधी हुई थी कि उनकी मर्जी बिना गांव में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था। कोई घटना – चाहे वह सास-बहू का विवाद हो, चाहे मेंड़ या […]

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बड़े घर की बेटी – मुंशी प्रेमचंद

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं की कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं, इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और […]

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दुर्गा का मन्दिर – मुंशी प्रेमचंद

बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बेटे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नू रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली। ब्रजनाथ ने क्रुद्ध होकर भामा से कहा – तुम इन दुष्टों को यहां से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की […]

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आत्माराम – मुंशी प्रेमचंद

वेदी-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रातः से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज़ गायब हो गयी। वह […]

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बैंक का दिवाला – मुंशी प्रेमचंद

लखनऊ नेशनल बैंक के दफ्तर में लाला सांईंदास आरामकुर्सी पर लेटे हुए शेयरों का भाव देख रहे थे और सोच रहे थे कि इस बार हिस्सेदारों को मुनाफा कहां से दिया जाएगा। चाय कोयला या जूट के हिस्से खरीदने, चांदी, सोने या रुई का सट्टा करने का इरादा करते लेकिन नुकसान के भय से कुछ […]

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समर यात्रा – मुंशी प्रेमचंद

आज सवेरे ही से गांव में हलचल मची हुई थी। कच्ची झोपड़ियां हंसती हुई जान पड़ती थीं। आज सत्याग्रहियों का जत्था गांव में आएगा। कोदई चौधरी के द्वार पर चंदोवा तना हुआ है। आटा, घी, तरकारी, दूध और दही जमा किया जा रहा है। सबके चेहरों पर उमंग है, हौसला है, आनन्द है। वहीं बिंदा […]

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