दशहरे की छुट्टियों में मम्मी के साथ गाँव आया विशु, तो उसे भुल्लन चाचा की बड़ी-बड़ी, लहरीली मूँछें देखकर सबसे ज्यादा मजा आया। “बाबा रे, इतनी बड़ी-बड़ी मूँछें! बल्कि मूँछें क्या, गलमुच्छे…!” कहते-कहते वह इस कदर हँसा कि हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गए। भुल्लन चाचा की मूँछें विशु ने पहले भी देखी थीं, पर अब तो वे ऐसी शानदार हो गई थीं कि चाचा जी पहचान में ही नहीं आ रहे थे। “अरे, भुल्लन चाचा, आपकी मूँछें तो बिल्कुल रावण जैसी लग रही हैं।” विशु ने चहककर कहा।
भुल्लन चाचा हँसे। बोले, “भई, गाँव में रामलीला होती है न। जानकीपुर की रामलीला शुरू होने वाली है और उसमें मैं रावण बना हूँ!” फिर भुल्लन चाचा से ही पता चली विशु को जानकीपुर की रामलीला की अजब – अनोखी कहानी…. जानकीपुर में किसी से भी पूछो, तो जवाब मिलता है कि पिछली कोई चार पीढ़ियों से होती आई है यहाँ रामलीला। और सच्ची, क्या धूम थी यहाँ की रामलीला की! तब बड़े शाहदिल राजा रज्जबलाल थे यहाँ के जमींदार, जिन्होंने यह परंपरा डाली। उनकी चार पीढ़ियों ने इसे निभाया। फिर पाँचवीं पीढ़ी में उनके परिवार के लोग गाँव छोड़कर विदेश चले गए। और होते-होते यहाँ की रामलीला भी बंद हो गई। जानकीपुर के पास ही था हिरनापुर गाँव।
वहाँ रामलीला होती, तो जानकीपुर के लोग भी देखने पहुँच जाते। लेकिन सबका मन मसोसता था, “अहा, कैसी बढ़िया रामलीला होती थी यहाँ? मन शीतल हो जाता था। और अब देखो समय का फेर कि बिल्कुल बंद ही हो गई।” एक दिन सोना दादी के मुँह से यह दुख फूटा, तो गाँव की औरतें ने भी कहा, “हाँ-हाँ दादी, बात तो सही कह रही हो तुम। हिरनापुर की रामलीला में वह बात कहाँ! फिर एक मुश्किल यह कि देखकर घर लौटते हैं, तो बड़ी देर हो जाती है।” होते-होते बात पूरे जानकीपुर में फैल गई। गाँव की बच्चा पार्टी के लीडर देबू ने कहा, “कितना मजा आएगा, अगर हमारे गाँव में भी होने लगे रामलीला!” फौरन देबू के साथ बच्चे दौड़े दौड़े गए भीखू बाबा के पास। गाँव में सबसे बड़ी उम्र के थे भीखू बाबा। इसलिए सभी उनकी इज्जत करते थे। पर भीखू बाबा को सबसे अच्छे लगते थे बच्चे। पोपले मुँह से उनके संग हँसते – ठिठोली करते वह खुद बच्चे बन जाते थे। भीखू बाबा ने उसी शाम चौपाल पर मौजूद लोगों के बीच बात चलाई। गाँव के तमाम युवक वहाँ थे। उन्होंने कहा, “हाँ-हाँ बाबा, कुछ न कुछ होना चाहिए। वरना जानकीपुर…!” सुनते ही बाबा ने टोकते हुए कहा,” शायद तुम लोगों को पता नहीं कि जानकीपुर का नाम जानकीपुर क्यों पड़ा? अरे भई, इसका भी एक किस्सा है।” कहते-कहते बाबा मुसकराए। तब भीखू बाबा ने सुनाया जानकीपुर के नाम का प्रसंग।
बोले, “यही तो वह जगह है, जहाँ जानकीजी रही थीं वनवास के दिनों में। यहीं पर से रावण उन्हें हर ले गया था। पास में गाँव हिरनापुर है न, तो सुनते हैं यहीं का था मरीचि। यही दुष्ट मरीचि सोने का हिरन बनकर गया था माता सीताजी के पास। और तब रावण उन्हें छल से हर ले गया।…” “अरे, सच्ची?” सब लोगों के मुँह से एक साथ निकला। जानकीजी और हिरनापुर की यह कथा लोग पहली बार भीखू बाबा से सुन रहे थे। “यही तो वजह है न, कोई चार पीढियों से रामजी की ऐसी बढ़िया लीला होती आई है जानकीपुर में कि देखने वाले देखते हुए थकते न थे! ऐसे सजीले राम-लक्ष्मण और इतनी सुंदर सीताजी कि भाई, क्या कहें।” भीखू बाबा बताते-बताते जैसे सपनों में खो गए। फिर बोले, “अरे भई, क्या दिन थे वे? महीनों पहले से रामलीला की तैयारियाँ शुरू हो जाती थीं। लोगों में भारी जोश था। सारे के सारे कलाकार जानकीपुर गाँव के ही होते थे। धनुष-बाण, तरकस, तलवार, ढाल, गदा, मुकुट और हर पात्र के हिसाब से बढ़िया से बढ़िया रंगारंग पोशाक। सब कुछ गाँव में ही तैयार होता। इसके लिए रेशमी कपड़े के थान के थान खास तौर से मँगाए जाते। साथ ही तमाम रंगों के ढेर सारे पन्नी कागज, बाँस, दफ्ती वगैरह। और राजा साहब, जो खुद भी शौकीन मिजाज के थे, अपने सामने एक से एक हुनरमंद दर्जी और कलाकारों को बैठाकर सारी चीजें तैयार कराते। इस सबके साथ दिन-रात संवाद याद करने की प्रैक्टिस। संवाद कविता में होते थे, जिन्हें बड़े उतार-चढ़ाव के साथ बोलना होता था। जिस दिन रामलीला शुरू हाती, दूर-दूर के गाँवों के लोग ठठ के ठठ ऐसे दौड़े आते, जैसे भीड़ का समंदर उमड़ा पड़ रहा हो। खुद राजा साहब हाथी पर बैठकर आया करते थे रामलीला देखने। और पूरे समय वे रामलीला का आनंद लेते। जिन-जिन कलाकारों का काम पसंद आता, उन्हें अपने हाथों से इनाम देते। “उस वक्त गाँव जानकीपुर में रामायण के बड़े भारी विद्वान थे, पंडित रामनारायण। पूरी रामायण उन्हें याद थी। वह रामायण मंडली में एक-एक को पास बैठाकर संवाद याद कराते, कैसे बोलना है, कैसे एक्टिंग करनी है, यह भी समझाते। “जब तक राजा साहब और पंडित रामनारायण थे, खूब धूम रही जानकीपुर की रामलीला की। फिर राजा साहब की अगली तीन पीढ़ियों तक यह सिलसिला चला। और बाद में तो सब कुछ बिखर गया। अब उसका तो कहना ही क्या!” कहते-कहते भीखू बाबा ने लंबी साँस ली। “तो अब क्यों नहीं हम फिर से शुरू कर सकते?” जानकीपुर के बच्चों ने पूछा भीखू बाबा से, तो उनकी आँखों में कुछ चमक आई। बोले, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं शुरू कर सकते भला? जरूर शुरू कर सकते हैं, करनी चाहिए।” फिर कुछ सोचकर बोले,” आओ, मेरे साथ…!” * भीखू बाबा उसी समय सब बच्चों को साथ लेकर गाँव के नए जमींदार रहमत साहब के घर पहुँचे। रहमत साहब बच्चों की टोली के साथ भीखू बाबा को आया देख, दूर से ही बोले, “आइए बाबा, आइए, कैसे तकलीफ की? आप आज्ञा देते, तो मैं खुद आ जाता।” भीखू बाबा बोले, “भई, मिलना तो था तुमसे। पर इस बार तो मैं खुद नहीं आया, बच्चे मुझे लाए हैं।” और फिर भीखू बाबा ने जानकीपुर गाँव में रामलीला शुरू करने की बात चलाई, तो रहमत साहब का चेहरा खिल उठा। बोले, “जरूर- जरूर… क्यों नहीं? बल्कि मैं खुद सोच रहा था। इधर दशहरा हमारे गाँव में बड़ा फीका-फीका सा रहता है। पहले दूर-दूर तक इतना नाम था यहाँ की रामलीला का, तो अब क्यों नहीं हो सकता? … ठीक है। राजा साहब नहीं रहे, पर मैं तो हूँ। जितना हमसे बन सकेगा, करेंगे और बढ़िया से बढ़िया करेंगे।” सुनकर भीखू बाबा ही नहीं, बच्चों की पूरी टोली उत्साहित हो उठी।
लेकिन तभी भीखू बाबा के चेहरे पर चिंता की कुछ रेखाएँ नजर आने लगीं। असल में उस साल जानकीपुर के लोगों पर बड़ी मुसीबत आ पड़ी थी। कम वर्षा के कारण गाँव में अच्छी फसल नहीं हुई थी और बहुत किसानों की फसलें तो एकदम चौपट हो गई थीं। तो फिर रामलीला का चंदा लोगों से कैसे इकट्ठा करें? भीखू बाबा ने अभी यह बात छेड़ी ही थी कि रहमत साहब बोले, “बाबा, इस बारे में आपको परेशान होने की क्या जरूरत है? मैं हूँ न, मैं करूँगा सारा इंतजाम।” “आप…?” भीखू बाबा चौंके। “हाँ-हाँ, क्यों नहीं?” रहमत साहब का स्वर भीग गया था। बोले, “अरे, राम-सीता तो हमारे भी हैं भीखू बाबा। बचपन में हम भी रामलीला देख-देखकर बड़े हुए हैं। मुझे याद है, पंडित रामनारायण जी कैसे तैयारी कराते थे रामलीला की हम सब बच्चों को? एक बार तो मैं भी शामिल हुआ था रामचंद्र जी की वानर सेना में। कभी कोई फर्क नहीं किया उन्होंने? कहा करते थे, सारे बच्चे एक हैं बल्कि सारे इनसान एक हैं। सबमें एक ही दिल धड़कता है! क्या मैं भूल सकता हूँ इस बात को?” रहमत साहब का चेहरा पुरानी यादों से झिलमिल झिलमिल हो रहा था। उन्होंने कहा, “इस बार तो मुझे अपनी तरफ से सारा खर्च करने दीजिए और आप बिल्कुल बेफिक्र हो जाइए। अगले साल अगर आप कहेंगे, तो हम सब लोग मिलकर रामलीला का चंदा करने निकलेंगे। यकीन मानिए, सबसे आगे-आगे मैं चलूँगा! जानकीपुर की रामलीला की शान हम फिर से लौटाएँगे।” भीखू बाबा इतने रोमांचित थे कि उन्हें झट खड़े होकर रहमत साहब को गले से लगा लिया। दोनों के मुँह से फिर कोई बोल ही नहीं निकला। पूरे जानकीपुर में उस दिन सब लोग बस, रहमत साहब की दरियादिली और बड़प्पन की ही चर्चा कर रहे थे। * उस साल गाँव के बच्चों ने और नौजवानों ने ही रामलीला की पूरी तैयारी की। पंडित रामनारायण के पड़पोते कमलनाथ ने सूत्रधार का जिम्मा सँभाला। बाहर से कोई कलाकार नहीं बुलाया गया, पर जानकीपुर गाँव के नए – नए कलाकारों ने ही खूब समाँ बाँध दिया। उस साल लक्ष्मण-परशुराम संवाद ऐसा बढ़िया हुआ कि दूर-दूर के गाँवों से आए नौजवान, बच्चे-बूढ़े, औरतें सब टकटकी लगाए देख रहे थे। इसी तरह दशरथ-मरण का दृश्य ऐसा करुण था कि सामने बैठे बूढ़े लोगों और स्त्रियों की आँखों से टप -टप आँसू टपकने लगे। ऐसी सुंदर और भावपूर्ण रामलीला हुई कि सचमुच सभी को पुराने दिन याद आ गए। रामलीला का पहला ही दिन था कि लीला शुरू होने से पहले रहमत साहब ने थाली लेकर राम-सीता जी की आरती उतारी। सब ओर रामचंद्र जी और माता सीता की जय-जयकार होने लगी। फिर भीखू बाबा आरती की थाली लेकर दर्शकों के बीच पहुँचे, तो देखते ही देखते पाँच सौ रुपए का चंदा इकट्ठा हो गया। फिर शुरू हुई रामलीला। हर दिन राम की कथा के नए-नए दृश्य सामने आते। फिर शिवजी का धनुष टूटने के बाद राम बारात निकली, तो लोगों ने देखा कि बैलगाड़ी पर दो कुर्सियाँ रख, लाल मखमल बिछाकर रथ बनाया गया है। उस पर सुंदर मुकुट लगाए रामचंद्र जी और सीताजी बैठी हैं। सामने बच्चों की प्रसन्न टोली है। एक ओर भीखू बाबा, तो दूसरी ओर रहमत साहब मगन होकर राम-सीताजी को चँवर ढुला रहे थे। दूर-दूर से लोग जानकीपुर की सुंदर राम बारात देखने आए थे। सबका कहना था, “अहा, ऐसा आनंद पहले कभी नहीं आया।” अगले साल रामलीला हुई, तो जानकीपुर में और भी ज्यादा उत्साह था। भीखू बाबा और रहमत साहब मिलकर चंदा इकट्ठा करने निकले। कोई आठ-दस हजार रुपए इकट्ठे हो गए। इस बार रामलीला पहले से भी ज्यादा शान और धूमधाम से हुई। फिर तो सिलसिला ही चल निकला।… भुल्लन चाचा से जानकीपुर की रामलीला का यह किस्सा सुनकर विशु को इतना अच्छा लग रहा था कि फौरन भीखू बाबा से मिलने चल पड़ा। वह पूरा दिन विशु का जानकीपुर गाँव में घूम-घूमकर सबसे मिलने में ही बीत गया। भीखू बाबा से मिला, तो उन्होंने तरंग में आकर जानकीपुर की रामलीला के कुछ और भी दिलचस्प किस्से सुना दिए। रहमत साहब भी बड़े प्यार से मिले। फिर गाँव की बच्चा पार्टी और उसके लीडर देबू से मिलकर तो उसे मजा ही आ गया। * पर भुल्लन चाचा की मूँछें और रावण बनने का किस्सा…? वह तो अभी पूरा हुआ नहीं था। रात को सोते समय विशु ने आँगन में भुल्लन चाचा के साथ ही चारपाई डाल ली। बोला, “भुल्लन चाचा, आप रावण कब बने?” भुल्लन चाचा हँसे। बोले, “इसका भी एक किस्सा है, बड़ा ही मजेदार।
असल में हुआ यह कि पिछली बार बनारस की मशहूर हरगुलाल मंडली के कलाकार बुलाए गए थे। अभी रामलीला शुरू होने को ही थी कि रावण की तबीयत कुछ बिगड़ गई। उसे तेज बुखार आ गया था। इस पर मैंने कहा- अगर आप लोग ठीक समझें, तो रावण का पार्ट मैं कर सकता हूँ।” “तब मूँछें मेरी इतनी बड़ी नहीं थीं, पर फिर भी थीं तो रोबीली ही। शायद इसी कारण मुझे रावण के पार्ट के लिए चुन लिया गया। अब मुझे रावण के डायलॉग याद करके बोलने थे। मैंने कॉपी में डायलॉग लिखे, याद किए। अगले दिन भीखू बाबा और पूरी मंडली के आगे मैंने रावण की तरह अट्टहास करके दो-चार संवाद बोले, तो खूब तालियाँ बजीं। मैं एकदम पास हो गया। लोगों का कहना है कि मैं सच्ची – मुच्ची रावण ही लग रहा था। उस साल की रामलीला पिछली बार से बढ़कर हुई। उसके एक-एक कलाकार की तारीफ हो रही थी। राम के साथ-साथ रावण के पार्ट को भी लोगों ने लंबे समय तक याद रखा। खासकर बच्चे तो महीनों तक हा-हा-हा करके बोले गए मेरे डायलॉग दोहराते रहे। उसके बाद तो तय हो गया कि जानकीपुर की रामलीला में राम कोई भी बने, पर रावण भुल्लन बनेगा।… तो इस बार भी रावण का पार्ट मुझी को मिला।” “वाह, भुल्लन चाचा द ग्रेट!” विशु उत्साह से भरकर चिल्लाया। भुल्लन चाचा मुसकराए। बोले, “बस, परसों से ही शुरू होने वाली है रामलीला। तुम भी देखना।” विशु को सचमुच रामलीला देखने में खूब आनंद आया। शहर की रामलीला में भला वह आनंद कहाँ, जो गाँव जानकीपुर की रामलीला में था। घर लौटकर हर दिन की कथा वह भुल्लन चाचा से भी सुन लेता। सबसे अच्छा उसे लगा, लक्ष्मण – परशुराम संवाद। देखकर बार-बार वह उछल पड़ता, “वाह, लक्ष्मण ने क्या बढ़िया डायलॉग बोले! मन खुश हो गया।” घर लौटकर उसने भुल्लन चाचा से कहा, “चाचा जी, अगले साल मैं रामलीला में पार्ट करूँगा।” “अच्छा, क्या बनोगे तुम?” चाचा जी ने पूछा, तो विशु उछलकर बोला, “लक्ष्मण! मुझे लक्ष्मण बनना सबसे अच्छा लगता है।” विशु ने रामलीला ही नहीं, इस जानकीपुर का दशहरा और अनोखा राम-भरत मिलन भी देखा। कुछ रोज बाद वह शहर लौट रहा था, तो बार-बार लक्ष्मण-परशुराम संवाद के दृश्य उसके मन में कौंध रहे थे। वह मन ही मन लक्ष्मणजी के संवाद याद करता जा रहा था। आखिर अगले बरस उसे लक्ष्मणजी का रोल जो करना था।
