Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: जिसकी मोहब्बत में दिन-रात खोये हुए हो और जिसके सामने अधिकतम अच्छे हो, उसके सामने ही अपने किसी घृणास्पद चेहरे का उघड़ जाना वह घटना है, जो हमें बनिस्बत आसानी से साफ़-साफ़ आइना देखने में मददगार होती है।

“क्या हुआ निधि का?” उसने मेरी बहन के रिश्ते के बारे में पूछा। अमूमन उसे मेरी और मुझसे जुड़ी ज़िंदगियों से कुछ लेना देना नहीं होता।

“पक्का ही है। कल लड़के से मीटिंग तो हो गई। बस उसने कहा है, एक बार परिवार वाले और देख लें।” मैंने स्टेयरिंग पर अपना बोझ डालते हुए अपने कुर्ते को एडजस्ट किया।

“कैसा है लड़का?”

“बहुत अच्छा है यार। बस हो जाए रिश्ता। पता है, उनकी फार्मासिटिकल्स की दो फैक्ट्रियां हैं। शानदार घर, घर में स्वीमिंग पुल भी है और ज़मीनें तो बहुत हैं; दो बड़े कॉम्पलेक्स हैं, पन्द्रह-बीस दुकानों की रेन्टल इन्कम तो है ही, चार फ्लैट्स भी हैं और बड़ा फॉर्म हाउस भी। सबसे बड़ी बात कोई भाई-वाई है नहीं, एक बहन थी उसकी भी शादी हो गई है।” मैंने ख़ुश होते हुए बताया।

उसने एक मिनट इंतज़ार किया कि शायद मैं कुछ और कहूँगा। मेरी बात पूरी समझ, उसने सलीक़े से तमाचा जड़ा- “क्या वह इतना गरीब है कि उसके पास पैसों के अलावा कुछ नहीं?”

सोच गहराई कि क्या हमने देखा और क्या उन्होनें; सब देख-ताक कर भी, जो देखा जाना था वह तो कम देखा ही रह गया था। यूँ मुझे पता भी है और मैं इस सोच का हिमायती भी हूँ कि, दुनिया की कोई भी औरत या कोई भी आदमी भीख की तरह हथेली पर फेंक दिए पैसों से ना ख़ुदराई की ज़िंदगी जी सकेगा और ना ही उसकी ज़िंदगी जीने लायक़ कही जा सकेगी। शायद इस तरह की ज़िन्दगी के लिए ‘गुनाह’ लफ्ज़ हममानी हो। यह सवाल हावी, और बहुत-बहुत हावी होने लगा कि क्या आरामपसंदगी गुलामी का बीज नहीं बन जाती?