भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
कॉलेज से लौटकर अभी कमरे में पाँव रखा ही था कि माँ पीछे-पीछे कमरे में आ गई।
“तुम वेश्याओं के बारे में कब से लिखने लगे हो?”
माँ ने कुछ इस अंदाज से पूछा, जैसे कह रही हो, “तुम वेश्याओं के पास कब से जाने लग पड़े हो?”
मैं हैरानी से बुदबुदाता हूँ- ‘वेश्याएँ!’
रमा दीदी के साथ कमरे में प्रवेश कर रही अंजलि मेरी बुदबुदाहट ‘वेश्याएँ’ पर चौंकते हुए एकाएक रुक जाती है, जैसे पाँव अचानक धरती में गड़ गये हों।
माँ फिर कहती है, “तुम क्या समझते हो, मैं आँखें बंद करके बैठी रहती हूँ?” और फिर एक पत्र निकालकर मुझे देते हुए कहती है, “पढ़ो इसे।”
मैं पत्र पढ़ता हूँ, संपादक का पत्र है। लिखा है- “आपने वेश्याओं के बारे में निबन्ध भेजने का वादा किया था, यदि शीघ्र भेज सकें, तो हम ये निबन्ध अगले अंक में छापना चाहते हैं। यदि कछ तस्वीरें भी साथ भेज दें तो, आभारी होंगे…..।”
मैं मुस्करा कर माँ का मूड़ ठीक करते हुए कहता हूँ, “ये तो संपादक का पत्र है, निबन्ध भेजने के लिए।”
लिखने के लिए और समस्याएँ समाप्त हो गई हैं कि वेश्याओं पर निबन्ध माँग लिए? ऐसे घटिया निबन्ध-शिबन्ध लिखना छोड़कर पढ़ाई की ओर ध्यान दो कुछ…..कॉलेज में अन्तिम वर्ष है, नम्बर कम आए तो आगे युनिवर्सिटी में प्रवेश कैसे मिलेगा?” माँ ने गुस्से के साथ कहा और रसोई की तरफ चली गई।
अंजलि तो कुछ नहीं बोली, हाँ रमा ने पूछ लिए, “क्यों भइया! वेश्याओं के बारे में आप कितनी रिसर्च कर चुके हैं?”
“बताऊँ तुम्हें? बड़ी दरोगा कहीं की!” कहते हुए मैंने उसकी चोटी पकड़ ली।
“देखो भइया, मेरी सहेली के सामने मेरी चोटी पर हाथ मत डालो।”
“अपनी सहेली के सामने तुम्हें मेरे साथ मजाक करते हुए शर्म नहीं आती?”
“अब छोड़ भी दीजिए ना, दीप जी!” अंजलि ने कहा तो मैंने रमा की चोटी छोड़ दी।
अंजलि ने मेरे पास आते हुए कहा, “आपकी रिसर्च के लिए एक बात याद आ रही है…..किसी किताब में पढ़ी थी, दुनिया का हर मर्द बिस्तर में पत्नी में से वेश्या ढूँढ़ता है।”
“ढूँढ़ता होगा, परन्तु मेरा ऐसा कोई अनुभव नहीं।” कहकर मैं कमरे से बाहर निकल आता हूँ। पीछे से अंजलि की आवाज कान में पड़ती है “अनुभव के बिना निबन्ध कैसे लिख लेंगे?”
“अनुभव!” ये शब्द बार-बार मेरे जेहन में गूंजता है। अनुभव के लिए ही तो गया था उस दिन। सोनागाछी की एक गली में घुसते ही एक लुंगी वाला दलाल मेरे साथ चलने लगा।
“आइए ना साहब! एकदम फ्रेश माल दिखाएगा, साब! आज ही आया है।”
दलालों के बारे में अपने दोस्तों से बहुत कुछ सुन रखा था, परन्तु फिर भी उसके साथ चलते हुए बड़ा अजीब लग रहा था। मैंने उससे किसी भी तरह पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा, “नहीं भाई नहीं, कोई माल-वाल नहीं चाहिए।” कहकर मैं उससे अलग होकर चलने लगा।
परन्तु उससे अलग होते ही एक दूसरा दलाल मेरे साथ हो गया, “अरे साब! बंगाली, बिहारी, गुजराती, मद्रासी, मारवाड़ी…..जो बोलेगा साब! सब मिलेगा। आप एक बार देख तो लीजिए…..पसन्द आएगा, तो बैठिएगा साब!”
पसन्द-ना-पसन्द का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। मैं तो किसी और ही काम के लिए आया था, परन्तु जाने क्यों मैं हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। अजीब शर्म-सी आ रही थी। उस पर धुकधुकी लगी थी, अपनी जान-पहचान का कोई मिल गया तो?
उस दलाल ने एक मकान में प्रवेश करते हुए मुझे पीछे आने का इशारा किया, परन्तु मैं उसके पीछे जाने के बजाय आगे बढ़ गया।
एक और दलाल मेरे साथ चल पड़ा। वह अभी बोलने ही वाला था कि मकान में बुलाने वाला दलाल फिर से आ गया, “क्या साब! आप अन्दर नहीं आया, बाहर से ही चला आया…..अरे एक बार चलकर देख तो लीजिए, साब! एक से एक पटाखा छोकरी है, साब!”
अब मेरे लिए उस दलाल को सहना मुश्किल हो गया था, और मैं एकदम फट पड़ा, “एक बार कहा है ना भाई, नहीं देखना, पीछे क्यों पड़े हो?”
“तो आईसा बोलिए ना, साब! लेकिन वो क्या है कि एक बार देख लेता तो तब्बियत खुश हो जाती…..क्या? फिर चलता है?”
अजीब ढीठ किस्म का आदमी था, परन्तु मैं रुका नहीं, बल्कि तेज-तेज कदम उठाता हुआ एक गली की ओर मुड़ गया।
अब जहाँ तक नजर जाती थी, गली के दोनों ओर सजी-सँवरी स्त्रियों की लम्बी पंक्तियाँ नजर आ रही थीं।
मैं हिम्मत जुटाकर किसी तरह यहाँ आ तो गया था, परन्तु अब नजर उठाकर उनकी ओर देखने या कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
बीच-बीच में कानों में इक्का-दुक्का आवाज़ पड़ जाती-
“की रे मोशाऐ। बोसबी ना (क्यों श्रीमान। बैठोगे नहीं?)”
“क्यों न! हैंड-प्रैक्टिस करके आइलै क्या?”
“अरे नजर तो उठा, राजा!”
स्त्रियों की आवाज़ों में ही एक पुरुष आवाज दूर से ही गूंजी थी, “अरे हल्ला गाड़ी रे बाबा!” और इससे पहले कि मुझे कुछ समझ आता, सामने से आ रहे एक ऊँचे-लम्बे आदमी ने मेरी बाजू पकड़ ली, “आप इधर क्या कर रहे हैं, मिस्टर?”
मुझे उसके प्रश्न ने बड़ा हैरान कर दिया था। मैंने उससे ही पूछ लिए, “क्या कर रहे हैं से मतलब?”।
“अभी बताते हैं मतलब भी, आप मेरे साथ जरा गाड़ी तक चलिए, इंस्पैक्टर साहिब मतलब बता देंगे।”
उसकी इस बात से मैं समझ गया कि वह सादे कपड़ों में पुलिस का आदमी था। इसलिए थोड़ा नरम पड़ते हुए मैंने कहा, “देखो भाई, मैं गलत इरादे से यहाँ नहीं आया हूँ। दरअसल मैं एक लेखक हूँ और यह इलाका सिर्फ देखने के लिए ही आया हूँ।”
“ये रंडी बाजार है, मिस्टर! कोई ताजमहल नहीं है, जो तुम टूरिस्ट बनकर देखने आये हो। साला जो भी पकड़ा जाता है, कोई-ना-कोई बहाना बनाने लगता है!”
“मैं कोई बहाना नहीं बना रहा”, मैंने जोर देकर अपनी बात उसे समझाने की कोशिश की. परन्त वह नहीं माना।
“यह सब बातें आप वहाँ बोलिएगा, हल्ला गाड़ी के पास।” वह कहते हुए मुझे लगभग खींचता हुआ पुलिस वैन के पास ले गया।
पुलिस वैन के पीछे खुली हुई खिडकी के पास खडे इन्सपैक्टर को भी मैंने अपनी असलिएत बताई, परन्तु उसने मेरी बात अनसुनी करते हुए मुझे धकेल कर वैन में बैठा दिया। वैन में पहले से ही पन्द्रह-सोलह व्यक्ति बैठे हए थे। अँधेरे में उनके चेहरे साफ नजर नहीं आते थे।
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? मेरा कसूर क्या है? दोषी ना होते हुए भी विचित्र-सा पाप बोध हो रहा है। कलकत्ते की वेश्याओं पर निबन्ध लिखने के चक्कर में मैं इस रेड लाइट एरिया में आ गया था, परन्तु….।
दो पुलिस वाले एक और सूट-बूट वाले आदमी को पकड़कर वैन के पास ले आए थे। वह जोर-जोर से बहस कर रहा था, “परन्तु आप मुझे पकड़ क्यों रहे हो? ह्वाट’ ज माई फाल्ट? क्या जुर्म किया है मैंने?”
इन्सपैक्टर ने उसे बाजू से पकड़ कर वैन में बिठाते हुए कहा, “आप गाड़ी में तो बैठिए, जुर्म भी बता देंगे।”
“बेट…..मैं क्यों जाऊँगा थाने में? ये भी कोई बात हुई, रास्ते चलते शरीफ आदमी को पकड़ लो!”
“ज्यादा हल्ला नहीं कीजिए, चुपचाप बैठ जाइये अन्दर। इस इलाके में सब शरीफ लोग ही आते हैं।”
कहकर इन्सपैक्टर ने वैन का पिछला दरवाजा बन्द कर दिया।
वैन में बैठे एक आदमी ने डरी हुई आवाज में साथ बैठे दूसरे व्यक्ति से पूछा, “थाने में ले जाकर क्या करेंगे?”
“आमी जानी ना, आमी नूतन आछी।” (मैं नहीं जानता, मैं नया हूँ।)
एक और आवाज उभरी, “और क्या करेगा, घूस-ऊस लेकर छोड़ देगा सबको!”
इस बात पर एक और ढीठ-सी आवाज उभरी, “हम तो साला बोलेगा, हमको टेस्ट करो।” हम कोई गलत काम नहीं किया है। रास्ते से पकड़ लिए, साला।” बोलते हुए ही वह जोर से ठहाका लगाकर हँस पड़ा। और कुछ व्यक्तियों की हँसी उसकी हँसी में मिल गई।
एक और आवाज, “कहाँ ले जाएगा, रे बाप?”
दूसरी आवाज, “बड़तल्ला थाने में।”
पहली आवाज, “बड़तल्ला कहाँ?”
दूसरी आवाज, “यहीं पास में ही है।”
एक अधेड़ आवाज, “धूऽऽत साला! रंडी लोग से हफ्ता लेकर खुद ही धंधा चलाता है, और खुद ही पकड़ता है, मामा लोक! साला दोगला का जात!”
इस आवाज के साथ ही एक और आवाज ने सिलसिला जोड़ा, “रंडी लोक का घर में घुस कर क्यों नहीं पकड़ता है? साला बोलता है, इस इलाके में काहे आया है…..साला आएगा नहीं तो ये जगह किसलिए? वो उधर दलाल लोग सरेआम आसामी फाँस कर ले जाता है। साला उनको पकड़ेगा तो हफ्ता किधर से पाएगा? माँ का…..से…..?”
एक से बढ़कर एक ढीठ मुँहफट भरा हुआ था वैन में। एक ने पूछा, “अरे कोथाए जाबो रे बन्धु?” (कहाँ जा रहे हो मित्र?) तो दूसरा बोला, “आर कोथाए, ससुरर बाड़ी।” (और कहाँ, ससुर के घर) और फिर स्वयं ही ठहाका लगाकर हँस पड़ा।
मैं चुप बैठा सोच रहा था, यह लोग पुलिस वालों से डरते क्यों नहीं? बेशर्मों की तरह बके जा रहे हैं। ऊपर से चाहे मैं निश्चिन्तता प्रकट कर रहा था, परन्तु भीतर ही भीतर डरा हुआ भी था।
रात ग्यारह बजे के करीब हल्ला गाड़ी हमें लेकर बड़तल्ला थाने पहुंची। सभी को वैन से उतारकर एक बड़े कमरे की मेज के सामने पंक्ति में खड़ा कर दिया गया। सभी के एक-एक करके नाम और पते लिखे जाने लगे और जामा तलाशी होने लगी।
जिस पुलिस वाले ने मुझे पकड़ा था, उसने मुझे उस पंक्ति में से एक ओर बुला लिए और फिर दूसरे कमरे में एक कुर्सी पर बिठा दिया। मुझे वहीं बैठने के लिए कहकर वह बाहर चला गया।
थोड़ी देर बाद एक सब-इन्सपेक्टर भीतर आया। मैंने उसे नमस्ते की। वह मेरे सामने एक कुर्सी पर बैठ गया। फिर सिगरेट जलाते हुए उसने मेरे साथ बातचीत शुरू की, “तो आप एक लेखक हैं?”
“जी!”
“नाम क्या है आपका?”
मैंने अपना नाम बताया। उसने मेरा नाम दोहराया और फिर कहा, “मैं भी लिखता हूँ, कभी-कभी। वैसे आप किसी बंगाली लेखक को जानते हैं?”
“क्यों नहीं…..रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, शक्ति चट्टोपाध्याय…..।” मैं बंगला के नये-पुराने लेखकों के नाम ले रहा था कि उसने बीच में ही टोक कर पूछा, “आप शक्ति चट्टोपाध्याय को जानते हैं?”
“बड़ी अच्छी तरह से। खलासी टोले में बैठकर एक-दो बार तो उनके साथ बंगलू पीने का अवसर भी मिला है। बड़े क्रान्तिकारी शायर हैं।”
“यू आर राइट। ही इज ऐ रिवोल्युशनरी पोइट ऐंड वैरी रियलिस्टिक…..।”
“आफकोर्स…..बट, इट्स लिटल बिट डेन्जरस…..टू बी ऐ रियलिस्टिक राइटर…..आप तो देख ही रहे हैं। यथार्थ लिखने के चक्कर में मुझे यहाँ इस तरह आना पड़ा?”
मेरी बात पर सब-इंस्पेक्टर ठहाका लगाकर हँस पड़ा था, “यथार्थ….. यानी यथा…..अर्थ! यह यथार्थ आज के जमाने में एक ऐसी वस्तु बन चुका है कि आप आँखों से देखकर, कानों से सुनकर, और कई बार तो यथार्थ को भोगकर भी यथार्थ से अनजान ही रहते हैं, क्योंकि जिसे हम यथार्थ समझते हैं, या यथार्थ समझकर भोगते हैं, वो असल में यथार्थ होता ही नहीं। वो एक तरह से ढका हुआ सच होता है। सोनागाछी जैसी जगहों का यथार्थ जानना हो, तो आप हमारे पास आयें, हमसे पूछे, हम बतायेंगे इस जिस्मफरोशी का यथा-अर्थ।”
“आप शायद ठीक कह रहे हैं, लेकिन जो अनुभव आज मुझे हुआ है, वो सीधे आप से मिलकर नहीं हो सकता था। वैसे एक जिज्ञासा है मेरी, आपने हमें राह चलते हुए क्यों पकड़ा है? क्या जुर्म था हमारा?”
“जुर्म यह है कि सभ्य समाज के लोग होते हुए भी आप…..आईमीन पकड़े गये लोग…..एक असभ्य समाज के पोषक बनने जा रहे थे। यह पकड़-धकड़ पेटी केस के तहत की जाती है। यह भी ठीक है कि बाजार में औरतें बिकने के लिए बैठी हैं, तो लोगों का वहाँ आना-जाना तो होगा ही, लेकिन फिर भी हम बीच-बीच में लोगों को पेटी केस में पकड़कर कछ घण्टे थाने में रखते हैं, ताकि जो सधर सकते हैं. सधर जाएँ…..और जिन्हें सधरना नहीं होता। वह मामली जाने को कछ समझते ही नहीं। इसीलिए बार-बार पकड़े जाने पर भी वहाँ जाते हैं। वैसे भी रात नौ बजे के बाद सोनागाछी जैसे खतरनाक इलाके में चलने वालों को सुरक्षा की दृष्टि से पकड़ना हमारी ड्यूटी है। ऐसे ही इलाकों में गुंडागर्दी और लूटपाट की घटनायें भी तो होती हैं…..।”
सब-इन्सपेक्टर अभी बात कर ही रहा था कि एक सिपाही ने आकर कहा, “साहिब बुला रहे हैं, सर!”
“ठीक है, मैं आ रहा हूँ।” उसे भेज कर उसने मुझे कहा, “आप ऐसा कीजिए, फिर किसी दिन आ जाइये, खुलकर बात करेंगे। अभी रात काफी हो रही है, आपको भी जल्दी होगी।”
फिर सिपाही की ओर मुड़कर बोले, “इन्हें बाहर तक छोड़ दो।” कहते हुए उसने मेरे साथ हाथ मिलाया और कमरे से निकल गया। थाने की सामने वाली गली ये निकलकर अभी ट्राम रोड के पास पहुँचा ही था कि पीछे से वही पुलिस वैन भी आ गई। पुलिस वैन को देखते ही मेरे जेहन में सोनागाछी में सुनी आवाज गूंजी, “अरे हल्ला गाड़ी रे बाबा!”
जाने मुझे क्या हुआ, मैं एकाएक दौड़ कर एक चलती हुई ट्राम के साथ लटक गया।
…..कमाल है! इतना जबरदस्त अनुभव है मेरा और अंजलि कहती है, अनुभव के बिना कैसे लिख लोगे? वेश्याओं के बारे में किसी पुस्तक से पढ़ी हुई एक टिप्पणी क्या याद रख ली, समझती है, वेश्याओं के बारे में दुनिया का सारा ज्ञान उसके पास ही है।
अंजलि क्या जाने, कुत्तों की तरह दुम हिलाते दलाल…..पशु मेले में बिकने के लिए आई गाय-भैंसों-सी कतार बाँधे खड़ी स्त्रियाँ…..भद्र पुरुषों को पकड़-पकड़ कर हल्ला गाड़ी में ठूसते पुलिस वाले…..और पुलिस थाने को ससुर बाड़ी कहने वाली महा ढीठ किसम की महानगरीय नस्ल-!
‘क्यों मैन, हैंड-प्रैक्टिस करके आईलै क्या?’ जहन में आवाज अभी गूंज ही रही है कि रमा अंजलि को छोड़ कर लौट आई। उसके कमरे में प्रवेश करते ही मैं एकाएक काँप उठता हूँ। जैसे रमा ने मुझे रेड-लाइट एरिये में घूमते हुए देख लिए हो। कैसा अजीब एहसास है, यह सोचकर मैं स्वतः हँस पड़ता हूँ।
हर समय कहानियों की दुनिया में ही ना खोए रहा करो मनी भइया! कहीं लेखक बनते-बनते बीमार बनकर ही ना रह जाना।”
मैं सहज होने की कोशिश करता हूँ, “बीमार तो हर कोई है यहाँ, फिर यदि मैं बीमार बन भी गया तो कौन-सी नई डिस्कवरी हो जानी है?”
“डिस्कवरी? डिस्कवरी तो हो चुकी है, भाई साहिब! आप हैं कि दुनिया में?” रमा रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहती है।
“क्या मतलब?”
“वही!” वह हँस पड़ती है।
“वही क्या?” मैं फिर पूछता हूँ।
“वही…..एक था लड़का और एक थी लड़की। दोनों ग्रेजुएट बनते-बनते मरीज बन गये…..मरज ला-ईलाज है। च…..च…..च!”
“यह च…..च…..च…..क्या होता है? तुम कहना क्या चाहती हो? मैं….. मेरा…..मेरा…..किसी लड़की के साथ…..और मुझे…..मुझे उसका मरज़ है….. ?” मेरी जुबान थुथला जाती है।
रमा दीदी ठहाका लगाकर हँस पड़ती है। दरअसल जब से रमा को मेरे साथ पढ़ती अंजलि ने बताया है कि वह मुझे बहुत पसन्द करती है, तब से ही वह मुझे बात-बात पर छेड़ने लग पड़ी है।
रमा के कमरे से जाते ही मैं वेश्याओं के बारे में निबन्ध लिखने के लिए बैठ जाता हूँ। अपने अनुभव को पर्याप्त मान कर निबन्ध लिखता हुआ बड़े विस्तार में लिख जाता हूँ। निबन्ध को दुबारा पढ़ते हुए महसूस होता है, सचमुच वेश्याओं के बारे में मुझे काफी ज्ञान है।
माँ शाम की चाय लेकर कमरे में आई है। मैं एकाएक निबन्ध फाईल में छुपा देता हूँ।
चाय का कप पकड़ाते हुए माँ कहती है, “चाय पीकर जरा रमा के साथ न्यू मार्केट तक हो आओ। सुबह से पीछे पड़ी है शॉपिंग के लिए। मेरे घुटनों में दर्द है।”
“कोई नहीं माँ, मैं करवा दूंगा उसकी शॉपिंग।” चाय पीने के बाद मैं स्कूटर पर रमा को लेकर न्यू मार्केट की ओर चल पड़ता हूँ। स्कूटर अभी धर्म-तल्ला मेट्रो सिनेमा हॉल के सामने से गुजर ही रहा है कि कानों में किसी फड़ी वाले की आवाज पड़ती है, “अरे दुकान उठा रे, हल्ला गाड़ी आ रही है!”
हल्ला गाड़ी का नाम सुनते ही जाने क्या होता है, मैं एकाएक स्कूटर को एक ओर करके रोक देता हूँ। मेरे सामने ही एक पुलिस वैन आकर रुकी है। पुलिस वाले भाग-भाग कर फुटपाथ पर सामान बेचने वालों को पकड़ने लगते हैं। कम सामान वाले अपना सामान लेकर छोटी-छोटी गलियों में घुस गये हैं।
मैं पुलिस की कार्यवाही देख रहा हूँ कि रमा मेरा कंधा झिंझोड़ती है। मैं रमा की ओर देखता हूँ, तो वह सहमी हुई पुलिस वैन के भीतर इशारा करती है। वैन में पकड़ी गई तीन लड़कियों में से एक अंजली है। मैं एकदम स्कूटर स्टैंड पर लगाकर वैन के पास खड़े इंस्पेक्टर के पास जाता हूँ, “इन लड़कियों को क्यों पकड़ा है, इंस्पेक्टर साहिब?”
“साली कॉल-गर्ल्स हैं! अभी रंगे हाथों होटल से पकड़ कर लाये हैं।” कहते हुए इंस्पेक्टर पकड़ कर लाये गये एक फड़ी वाले को वैन के अन्दर धकेलता है।
“साली कॉल गर्ल्स हैं!” इंस्पेक्टर की आवाज बार-बार मेरे मस्तिष्क में गूंजती है। वैन में सिर झुकाए बैठी अंजली का चेहरा मेरी आँख भर आने के कारण धुंधला हो जाता है।
अचानक वैन का दरवाजा बन्द होता है और वह धुआँ छोड़ती आगे बढ़ जाती है। रमा दीदी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा है। मैं एकदम आँखें पोंछ लेता हूँ।
“चलो भइया! आज मैंने कोई शॉपिंग नहीं करनी।”
मैं रमा दीदी को लेकर घर लौट आता हूँ।
अंजली की आवाज मस्तिष्क में गूंजती है, “अनुभव के बिना निबन्ध कैसे लिख लोगे?”
फिर इस आवाज में और आवाजें मिलने लगती हैं-
“की रे मोशाऐ! बोसबी ना?”
“अरे नजर तो उठा राजा!”
लगता है जैसे, सोनागाछी की उस गली में से गुजर रहा हूँ, जिसमें सजी-सँवरी स्त्रियों की लम्बी पंक्तियाँ लगी हैं। परन्तु हर स्त्री के चेहरे पर अंजली का चेहरा!
जाने मुझे क्या होता है, मैं फाईल में से वेश्याओं वाला निबन्ध निकालता हूँ और पुर्जा-पुर्जा करके खिड़की से बाहर फेंक देता हूँ।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
