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लहरिया साड़ी
Stories of Grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां – यूं तो मेरे पास लहरिया की एक-दो साड़ियां थीं, पर मन हुआ कि पिकनिक पर नई साड़ी ही पहन कर जाऊं। मैंने अपने पति से कहा कि वे मुझे लहरिया की एक बढ़िया सी साड़ी दिलवा दें।
वे बोले, ‘क्यूं जी, किस खुशी में?’ मुझे ख्याल आया कि दो दिन बाद ही रक्षाबंधन है और मैंने तपाक से कहा, ‘वह परसों रक्षाबंधन है ना, उस खुशी में।’ मेरे पति बोले, ‘तो तू अपने भाई से ले, मैं क्या तेरा भाई हूं, जो रक्षाबंधन पर तुझे साड़ी दिलाऊं?’
उनकी इस बात पर जब मैंने सोचा तो शर्म से लाल हो गई कि मैंने भी बिना सोचे-समझे क्या कह दिया। आज भी मुझे जब यह बात याद आती है तो बड़ी हंसी
आती है।

लहरिया साड़ी
Stories of Grihalakshmi

1- हथिनी आंटी से सामना

मेरी सहेली के पिताजी का सरनेम हाथी है। शुरू में जब मैंने उनके इस सरनेम को सुना तो सच कहूं, मेरी हंसी छूटते-छूटते बची, क्योंकि अंकल की बॉडी दुबली-पतली थी। खैर, एक रोज मैं किसी काम से अपनी सहेली से मिलने उसके घर गई। मैंने बेल बजाई तो दरवाजा एक महिला ने खोला। ‘हाथी अंकल का घर क्या यही है?’ मैंने पूछा तो उन्होंने कहा, ‘हां, किससे मिलना है?’
मैंने फिर पूछा, ‘क्या आप हथिनी आंटी हैं?’ इस सवाल पर वे बिफर गईं। डील-डौल में भारी-भरकम आंटी को शायद मेरा संबोधन अखर गया था। इतने में मेरी सहेली रितु आ गई। उसने मुझसे कहा कि मेरी मम्मी से मिलो। इस पर मुझे अपने सवाल पर बेहद शर्म आई, जो अनजाने में थोड़ी देर पहले मैंने आंटी से किया था।

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यूं तो मेरे पास लहरिया की एक-दो साड़ियां थीं, पर मन हुआ कि पिकनिक पर नई साड़ी ही पहन कर जाऊं। मैंने अपने पति से कहा कि वे मुझे लहरिया की एक बढ़िया सी साड़ी दिलवा दें।
वे बोले, ‘क्यूं जी, किस खुशी में?’ मुझे ख्याल आया कि दो दिन बाद ही रक्षाबंधन है और मैंने तपाक से कहा, ‘वह परसों रक्षाबंधन है ना, उस खुशी में।’ मेरे पति बोले, ‘तो तू अपने भाई से ले, मैं क्या तेरा भाई हूं, जो रक्षाबंधन पर तुझे साड़ी दिलाऊं?’
उनकी इस बात पर जब मैंने सोचा तो शर्म से लाल हो गई कि मैंने भी बिना सोचे-समझे क्या कह दिया। आज भी मुझे जब यह बात याद आती है तो बड़ी हंसी
आती है।
श्रीमती आशा सिंह (जयपुर)

 
2- हथिनी आंटी से सामना

मेरी सहेली के पिताजी का सरनेम हाथी है। शुरू में जब मैंने उनके इस सरनेम को सुना तो सच कहूं, मेरी हंसी छूटते-छूटते बची, क्योंकि अंकल की बॉडी दुबली-पतली थी। खैर, एक रोज मैं किसी काम से अपनी सहेली से मिलने उसके घर गई। मैंने बेल बजाई तो दरवाजा एक महिला ने खोला। ‘हाथी अंकल का घर क्या यही है?’ मैंने पूछा तो उन्होंने कहा, ‘हां, किससे मिलना है?’
मैंने फिर पूछा, ‘क्या आप हथिनी आंटी हैं?’ इस सवाल पर वे बिफर गईं। डील-डौल में भारी-भरकम आंटी को शायद मेरा संबोधन अखर गया था। इतने में मेरी सहेली रितु आ गई। उसने मुझसे कहा कि मेरी मम्मी से मिलो। इस पर मुझे अपने सवाल पर बेहद शर्म आई, जो अनजाने में थोड़ी देर पहले मैंने आंटी से किया था।
दिव्या कौशिक (बीकानेर)