एक बार सरदार वल्लभभाई पटेल कांग्रेस के लिए निधि जुटाने रंगून गए। जब-जब वे चीनियों के पास चंदा लेने जाते, तब-तब चीनी लोग चंदे की सूची में अपना कोई आंकड़ा चढ़ाए बिना यथाशक्ति कुछ रकम दे दिया करते थे।
चीनियों के इस व्यवहार को देखकर सरदार ने एक चीनी सज्जन से इसका कारण पूछा.
उन चीनी सज्जन ने जवाब में कहा, हम इसे धर्म-ऋण कहते हैं। सूची में आंकड़ा चढ़ाने के बाद यदि उतनी रकम हाथ में न हुई तो उसे चुकाने में जितने दिनों की देर होती है, उतने दिन का ऋण ही हम पर चढ़ता है। धर्म-ऋण का यह पातक हम लोगों में सबसे बुरा माना जाता है। इसलिए हमें चंदे में कोई रकम देनी होती है तो तुरन्त देकर इस ऋण से मुक्त होने का अनुभव करते हैं।
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