सपनों को समझने का प्रयास किया जाए तो मुख्यत: 2 बातों की जानकारी अति आवश्यक है। दैहिक एवं मानसिक। दैहिक के भी 2 पक्ष होते हैं।
 

पहला पक्ष
 
जब कोई उत्तेजना किसी को उसकी सोते समय में प्रभावित करती है, तो उस समय सपना आता है। इस पहले पक्ष के अनुसार मनुष्य का मन नींद में सक्रिय नहीं हुआ करता है। यही कारण है कि मन में साहचर्य की क्रियाएं निर्बल हो जाती हैं। मनुष्य के स्मरण, चिंतन वं प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रियाओं में भीकिसी प्रकार का समन्वय नहीं रहता है। यह वह अवस्था होती है, जब मनुष्य की तर्कशक्ति का पूर्ण अभाव रहता है। यही कारण है कि जब नींद में किसी प्रकार की उत्तेजना किसी ज्ञानेंद्रिय को प्रभावित करती है, तो, उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप, सपने दिखाई देते हैं।
 
 
जैसे एक व्यक्ति सो रहा है और उसका एक हाथ दिल पर पड़ा हुआ है या व्यक्ति उल्टा हो कर सो रहा है, जिससे उसके दिल पर दबाव पड़ रहा है, तो दिल द्वारा कार्य कर पाने में बाधा बढ़ उत्पन्न होती है। और जब यह बाधा बढ़ जाती है, तब व्यक्ति को भयानक एवं डरावने सपने दिखाई पड़ते हैं और सपने के प्रभाव से व्यक्ति डर कर चीखता है या भयभीत हो कर जाग जाता है। उस समय वह पसीने-पसीने हो रहा होता है और सांस भी तेज चल रही होती है।
 
 
इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि सोते वक्त किसी प्रकार की चेतन मानसिक प्रक्रिया के अभाव में, उत्तेजनाओं का वास्तविक ज्ञान प्राप्त न हो कर, दोषपूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। यही कारण है कि सपने प्राय: निरर्थक, असंगत एवं हास्यपद होते हैं। यह सपने विज्ञान के दैहिक नियम का पहला पक्ष हैं, जिसके अनुसार नींद में, किसी उत्तेजना का उचित ज्ञान न हो कर, तरह-तरह के सपने दिखाई देते हैं।
 
दूसरा पक्ष
 
जब किसी प्रकार की उत्तेजना मनुष्य की किसी ज्ञानेंद्रिय को प्रभावित करती है, तो उस समय अगर मन सुप्तावस्था में रहता है, फिर भी वह उस उत्तेजना की व्याख्या करता है। इसके परिणामस्वरूप सपने दिखाई देते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि सपनों का आधार कोई न कोई उत्तेजना होती है।

 
सपना किसी भी प्रकार का क्यों न हो, उससे अचेतन मन की तृप्ति होती है। इसी कारण सपनों को अभिलाषापूरक कहा जा सकता है। आजकल सिनेमा और वी.सी.डी. बहुतायत से प्रचलन में हैं और आज के दर्शक स्वयं जानते होंगे कि उन्होंने सपनों में अपने चहेते कलाकारों से साहचर्य किया या नहीं। जो पात्र अपनी असमर्थता को स्वीकार कर लेते हैं, वे सपनों के द्वारा उस सुख की पूर्ति कर लिया करते हैं। बच्चे सपने में अधिक खिलवाड़ करते हैं।सुषुप्तावस्था में जब प्यास लगती है, तब नल,नदी, तालाब आदि के सपने देखते हैं। जब भूख लगती है तब रोटी आदि के सपने दिखते हैं। 
 
सपना नहीं है नींद में बाधक
 
लोग कहते हैं कि सपनों के कारण नींद में बाधा पहुंचती है, जबकि सपनों के कारण नींद में बाधा नहीं पहुंचती, बल्कि सोने में सहायता प्राप्त होती है। यह परम सत्य है कि नींद सपने की अभिभावक होती है। प्राय: जब सोने की इच्छा को ले कर व्यक्ति बिस्तर पर जाता है और सो जाता है, तब भीतर अंतर्मन में दबी हुई अपूर्ण, असंतुष्ट अभिलाषाएं, अपनी संतुष्टि के लिए, चेतन में आने का प्रयास करती हैं। सुषुप्तावस्था में प्रतिबंध क्रिया शिथिल तो रहती है, पर अचेतन मन क्रियाशील बना रहता है। इसी कारण अभिलाषाएं, विभिन्न प्रतीकों के सहारे, पूर्णत: अपनी संतुष्टि  प्राप्त करती हैं। यही कारण है कि सपने से निद्रा में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं पहुंचती, बल्कि व्यक्ति निश्चिंत हो कर सोता है। 
 
कई बार दमित इच्छा किसी और प्रकार की होती है, जबकि सपना किसी और प्रकार का होता है। व्यक्ति की अनेक कामनाएं होती हैं, जो अंतर्मन में बैठ जाती हैं। सफलता और असफलता के झूले में झूलने वाला व्यक्ति सपने में रोएगा या हंसेगा।
 
उदाहरण – एक पुरुष किसी शव यात्रा पर गया और वहां एक स्त्री पर मोहित हो गया। पर उससे वह मिल नहीं सका, कुछ कह नहीं सका। इसका परिणाम यह हुआ कि वह सपनों में श्मशान, जलती चिताएं, कंधों पर उठी अर्थी के सपने देखने लग गया। जिस व्यक्ति को भविष्य व्यर्थ प्रतीत होता है, वह सपनों में अंधेरा, धुंआ, ऊंचाई से उतरना या गिरना देखता है।