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Types of Meditation: अभीप्सा ध्यान की सर्वोत्तम विधि है
Types of Meditation

Types of Meditation: मन को एक ही श्रेणी के विचारों की श्रृंखला पर एकाग्र करना, या एक ही विषय पर विचार करना ध्यान कहलाता है। एक ही वस्तु, एक ही चित्र, एक ही बिम्ब, एक ही विचार पर मनन करना निदिध्यासन कहलाता है। ये दोनों ही ध्यान के रूप हैं। जिन्हें मानसिक एकाग्रता कहा जा सकता है। जब हम किसी कार्य को इतना एकाग्रचित्त होकर करते हैं कि जीवन के अन्य सारे व्यापार भूल जाते हैं तो ऐसी स्थिति ध्यान है।

ध्यान क्यों किया जाता है?

किसी चीज, विचार या सत्ता की गहराई में जाने और उसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए। विचार जितने ही अधिक आते हैं जीवन उतना ही अधिक बिखरता है। विचार जितने ही कम होते जाते हैं जीवन उतना ही सिमिट कर सत्ता के केन्द्र की ओर जाता है। सत्ता के केन्द्र में ही आत्मा या चैत्य पुरुष है। जब विचारों की संख्या काफी कम हो जाती हैं तो हम आत्मा के काफी नजदीक गहराई में पहुंच जाते हैं। ध्यान इस जानलेवा भौतिकवादी दौड़ से आत्मा की ओर लौटने का एक मात्र साधन है। और हम जितना ही अपनी आत्मा के नजदीक होते हैं उतना ही दूसरे लोगों के भी अधिक नजदीक होते हैं। यदि ध्यान में आनन्द आने लगे तो समझना चाहिये कि हम आत्मा के नजदीक पहुंच रहे हैं और जब हम आत्मा को स्पर्श कर लेते हैं तो परमानन्द की मस्ती में झूमने लगते हैं। इसके विपरीत विचारों की संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है हम आत्मा से दूर हटने लगते हैं और स्थूल चेतना या जड़त्व में पहुंच
जाते हैं।

ध्यान करने की विधि

ध्यान सर्वांगीण होना चाहिये अर्थात् शरीर, प्राण और मन तीनों को मिलाकर ध्यान करना चाहिये। यदि इनमें से एक या दो ध्यान में शामिल होते हैं और तीसरा शामिल नहीं होता तो ध्यान में अवश्य बाधा पड़ेगी। आपस की खींचतान से शान्ति के बजाय खिन्नता और अशान्ति बढ़ेगी। तीनों का संतुलन बना रहे इसके लिए पहले एक स्थान का चुनाव तीनों की राय से किया जाना चाहिये। जहां ध्यान किया जाना है वह सुंदर व एकान्त स्थान हो। फिर शरीर, इसे साफ सुथरा बनायें। आसन की
व्यवस्था करें। नहाये धोयें। ध्यान के लिये कोई भी आसन जो अपने लिये सबसे सहज हो चुन लेना चाहिये। ध्यान बैठकर ही किया जाये जिससे रीढ़ सीधी ऊपर को रहे। ध्यान को जप से प्रारंभ करना उत्तम होता है। प्रारंभ में ध्यान के लिये एकान्त और शान्त वातावरण होना चाहिये। सही ध्यान प्रारंभ हो जाने के बाद तो बाजार या मेले में भी ध्यान चलता रहता है। उषाकाल या सन्ध्या काल ध्यान के
लिये अधिक उपयुक्त होते हैं क्योंकि इस समय सुषुम्ना नाड़ी चलती है। जिस दिन विशेष चिन्ताजनक कोई घटना घटी हो उस दिन ध्यान में न बैठना ही अच्छा है वर्ना चिन्ता बढ़ाने के विचारों पर ध्यान होने लगेगा। ध्यान प्रतिदिन एक ही समय पर करना चाहिये क्योंकि शरीर और मन उस समय अपने आप ध्यान के अनुकूल बनने लगते हैं। ध्यान शुरू होते ही बाधायें प्रारंभ
हो जाती हैं। ऐसे में बिना निराश हुये संकल्प के साथ बाधाओं का सामना करते हुये अभ्यास जारी रखना चाहिये।

एक ही विषय से सम्बन्धित विचारों को श्रृंखलाबद्ध करना, फिर विषय से हटकर विषयवस्तु पर मन को एकाग्र करना, विषयवस्तु को छोड़कर विषय के किसी बिन्दु पर मन को एकाग्र करना। यह बिन्दु मानसिक, प्राणिक या स्थूल भी हो सकता है। इस प्रक्रिया में कुछ लोग नाम को जपते हैं और उसी नाम पर एकाग्र होते हैं, कुछ लोग गुरुमंत्र पर एकाग्र होते हैं कुछ लोग किसी मूर्ति, समाधि या तस्वीर पर ध्यान करते हुए बाद में उसके किसी एक बिन्दु पर मन को एकाग्र करते हैं; उदाहरण के
लिये मां या श्रीअरविन्द की तस्वीर या नाम पर ध्यान करते हुये उनके चरण, या दृष्टि पर मन को स्थिर करना। ऐसा करते रहने पर मन अपने आप चेतना के उच्चतर स्तर पर प्रवेश कर जाता है। चेतना की ऊंचाई या गहराई में विचारों की संख्या ऊंचाई या गहराई के अनुपात में अपने आप कम हो
जाती है और जब संख्या नगण्य हो जाती है तो आत्मा का आनन्द स्फुरित होने लगता है। अभीप्सा ध्यान की सर्वोत्तम विधि है जिसका तात्पर्य है भगवान के लिये पुकार। यह पुकार भक्ति व समर्पण से पैदा होती है। हम अपने इष्ट का चुनाव करके निरन्तर उसका ही स्मरण उसका ही जप और उसी का ध्यान करते हैं। उसी के सम्बन्ध में हमेशा विचार करते रहते हैं। उसके गुणों और कृपा पर, चाहे प्रारंभ में भले ही वे काल्पनिक हों, मन ही मन ध्यान करते हैं और उनसे प्रभावित होने का प्रयास करते
हैं। धीरे-धीरे यह अभीप्सा चरितार्थ होने लगती है। कल्पनाओं का भगवान सरस मधुर और संजीवित होने लगता है और हमारे लिये वैसा ही बनने लगता है जैसा हम चाहते हैं। यदि हम अपने गुरु को ही
भगवान मानकर उसकी उपासना करने लगते हैं तो धीरे-धीरे उनके ध्यान से हम स्वयं भी वैसा ही बनने लगते हैं। कुछ लोग हर देवी-देवता की पूजा या उपासना इस उद्देश्य से करते हैं कि उन्हें प्रत्येक से कुछ न कुछ मिल जायेगा पर ऐसे उपासकों के हाथ केवल शून्य हाथ लगता है। यह ध्यान
में रखने की बात है कि जिसकी हम आराधना या ध्यान करते हैं हम वही बनते जाते हैं। सभी का ध्यान करने से भला हम क्या बन पायेंगे?

हृदय में ध्यान करने से अभीप्सा में वृद्धि जल्दी होती है। हृदय मन या बुद्धि का स्थान न होकर विश्वास की गुहा है। इसे चैत्य की गुहा कहते हैं जिसके भीतर चैत्य पुरुष विराजता है। यह चैत्य पुरुष ही व्यक्तिगत भगवान है। हमारी सत्ता का स्वामी है। प्रत्येक साधक पहले अपनी अन्तरात्मा अर्थात् चैत्यपुरुष को ही प्राप्त करता है। उसके सिद्ध हो जाने पर ही विश्वपुरुष और शाश्वत भगवान को पाया
जाता है जो चैत्यपुरुष के ही सर्वव्यापी रूप हैं।

अभीप्सा में समर्पण और समर्पण से अभीप्सा बढ़ती है। अभीप्सा जब अपने इष्ट पर एकाग्र हो जाती है तो इसे सीधी प्रज्जवलित लौ कहा जाता है। अभीप्सा को अग्नि का नाम दिया गया है क्योंकि यह
सारे शारीरिक, प्राणिक और मानसिक प्रवृत्तियों व विकारों को जला देती है। एकनिष्ठ होकर भगवान की पुकार करते-करते हमारी अन्य सारी भूखें धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। अभीप्सा सारी वासनाओं और इच्छाओं को जलाकर खाक कर देती है। ये इच्छाऐं और मांगें ज्यों-ज्यों कम होती जाती हैं लौ और तेज होती जाती है और ऊंचाई या गहराई की ओर बढ़ती जाती है। भगवान का सामीप्य अनुभूत होने लगता है और आनन्द की मधुरता अधिकाधिक बढ़ने लगती है। जब ध्यान में
आनन्द का आना शुरू हो जाता है तो ध्यान छोड़ा नहीं जाता। तब ध्यान लगाना उतना कठिन नहीं होता जितना ध्यान को छोड़ना कठिन हो जाता है। घण्टों-घण्टों शान्त बैठे रहने और निरन्तर रिसते अमृत को पीते रहने की इच्छा होती है। यही सच्चा ध्यान है।

ध्यान के परिणाम स्वरूप सत्ता में निहित शक्तियों और ऊपरी जगत से आने वाली शक्तियों का शरीर में संचालन शुरू हो जाता है। ऐसी स्थिति में ध्यान उन शक्तियों के गति के साथ अपने आप होने लगता है। परम्परागत साधनाओं में ध्यान का उद्देश्य सांसारिक जीवन से उदासीन होकर मोक्ष प्राप्त करना होता था और नश्वर संसार में आवागमन या जन्म मरण से मुक्ति पाना होता था इसलिये ध्यान की प्रक्रिया निष्क्रिय ब्रह्मï की उपासना के अनुसार होती थी। लोग समाधि जैसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिये योग या साधना करते थे जिसमें ध्यान एक महत्त्वपूर्ण अंग होता था। पतंजलि या अष्टांग योग में यम, नियम, प्राणायाम आदि के साथ ध्यान किया जाता था। श्रीअरविन्द योग में इनकी आवश्यकता नहीं होती फिर भी एक अनुशासन की आवश्यकता तो होती ही है। ध्यान की परिसमाप्ति समाधि में होती थी पर श्रीअरविन्द योग का उद्देश्य समाधि में डूबना या मोक्ष प्राप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य भागवता चेतना को प्राप्त कर उसे नीचे जीवन की ओर उतारकर जगत और जीवन को दिव्य बनाना है। इसलिये यहां ध्यान की विधि सर्वथा भिन्न हो जाती है। आरंभ में वह भले एक जैसी हो पर ध्यान ज्यों-ज्यों घनीभूत होता जाता है और शरीर के भीतर शक्तियों का संचारण शुरु हो जाता है वहां ध्यान ऊपर से नीचे की ओर होने लगता है। परम्परागत साधनाओं में शक्ति
को हमेशा त्रिपुटी (आज्ञाचक्र) से ऊपर की ओर सहस्रार में ले जाकर ब्रह्म रंध्र से चेतना को निकालकर उसे समाधिष्ठ कर दिया जाता था। जहां संसार अस्तित्वहीनता की स्थिति में पहुंच जाता था। शरीर को नश्वर मानकर या उसे विकारों का पिटारा समझकर उससे पिण्ड छुड़ाया जाता था।
श्रीअरविन्द योग में शरीर को अधिक स्वस्थ और जीवन को दिव्य बनाने के लिये दैवी शक्ति का अवतरण कराया जाता है। ध्यान में अचेत होने का यहां प्रश्न पैदा नहीं होता। ध्यान जितना ही प्रगाढ़ और सचेतन होता है इस योग में शरीर उतना ही सुन्दर, स्वस्थ और आनन्दमय बनता है। सुप्रामेण्टल सिद्धि प्राप्त हो जाने पर बिमारियों से यहां तक कि मृत्यु से मुक्ति पाई जा सकती है। ध्यान से अर्जित शक्ति को अवचेतन में स्थित आसुरी शक्तियों को जीतने और उन्हें रूपान्तरित करने के लिये ऊपर के बजाय मूलाधार की ओर उतारा जाता है। योद्धा बनकर निम्न प्रकृति से लड़ना पड़ता है। जीवन से उदासीन होने के बजाय उसे अधिकाधिक सजीव और सचेतन बनाया जाता है।

एकाग्रता

ध्यान को जब एक बिन्दु के आसपास केन्द्रित कर दिया जाता है तो उसे एकाग्रता कहते हैं। ध्यान या एकाग्रता केवल भगवान को प्राप्त करने के लिये ही नहीं किया जाता। किसी भी चीज के ज्ञान की प्राप्ति के लिये एकाग्र हुआ जाता है। जब हम अपने भीतर एकाग्र होते हैं तो अपनी सत्ता के केन्द्र में पहुंच जाते हैं इसी अनुभूति को भगवान की उपलब्धि कहा जाता है। और जिस प्रकार हम अपने भीतर एकाग्र होकर इस अनुभूति को प्राप्त करते हैं उसी प्रकार हम किसी भी वस्तु के भीतर एकाग्र होकर
अन्तिम बिन्दु पर उसी अनुभूति को उस वस्तु में भी प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि प्रत्येक वस्तु का अन्तिम सत्य तो भगवान ही है। इसीलिये जब हम अपने भीतर भगवान को अनुभूत करते हैं तो संसार की प्रत्येक वस्तु में उसका अनुभव करना सहज हो जाता है। एकाग्र होकर हम किसी भी
वस्तु को प्राप्त करने में एक दिन सफल हो सकते हैं।

Types of Meditation: अभीप्सा ध्यान की सर्वोत्तम विधि है
Concentration

प्रकृति अनुसार ध्यान पद्धति

प्रत्येक व्यक्ति के लिये ध्यान की पद्धति एक जैसी नहीं होती इसलिये प्रत्येक को अपनी रुचि और प्रकृति के अनुसार ध्यान की विधि का चुनाव स्वयं करना चाहिये। ध्यान में लोग अक्सर उस ब्रह्म को ढूंढ़ते हैं जो संसार से परे है। परम्परागत साधनाओं में अधिकतर इसी बात पर जोर था। श्रीअरविन्द योग में ब्रह्म या भगवान जो संसार से परे हैं उसकी अनुभूति के साथ उस ब्रह्म की भी अनुभूति की जाती है जो सृष्टि जीवन के चप्पे-चप्पे में व्याप्त है। ध्यान में सिद्धि तब प्राप्त होती है जब हमारे भीतर सूक्ष्म शरीर में स्थित चक्र खुल जाते हैं। कुण्डलिनी योग तथा अन्य हठयोगिक क्रियाओं में इन चक्रों को प्राणायाम के द्वारा बरबस खोला जाता था जिससे खतरे की काफी संभावना रहती थी। श्रीअरविन्द योग में अभीप्सा के तीव्र होने पर ये चक्र अपने आप जागृत होने लगते हैं यहां तक कि
कुण्डलिनी भी अपने से ही समय पर जागृत हो जाती है। हमारी आन्तरिक सत्ता में ये चन्द्र हैं – (नीचे से ऊपर) मूलाधार, स्वधिष्ठान, मणिपूरक, हृदयचक्र, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। ध्यान में असली
सिद्धि तब प्राप्त होती है जब हृदय चक्र और सहस्रार के बीच एक स्वर्णिम सेतु बन जाता है। यह सेतु आन्तरिक चेतना के घनीभूत होने से बनता है। सहस्रार मन बुद्धि का द्वार है। यह चक्र चेतना के उच्चतर लोकों की ओर खुलता है। इस पर लगातार ध्यान के द्वारा हम चेतना के उच्चतर लोकों में प्रवेश करते हैं। हृदय चक्र अन्दर की ओर चैत्य पुरुष की ओर खुलता है और इस पर लगातार ध्यान करने से हम मातृशक्ति की ओर बढ़ते हैं। इस चक्र में प्रेम, भक्ति, प्रार्थना अभीप्सा का तद्ïनन्तर उद्घाटन होता है। यह प्रेम व विश्वास का द्वार है। सहस्रार मन और बुद्धि के द्वारा ऊपर के लोकों में प्रवेश करने का द्वार है। इसके लिये या तो माथे पर या सीधे सहस्रार पर ध्यान को एकाग्र करना पड़ता है। इस चक्र के जागरण के लिये दृढ़संकल्प, प्रार्थना और अभीप्सा की आवश्यकता होती है। इसके द्वारा उच्चतर शान्ति ज्ञान और शक्ति का अवतरण होता है। कुछ लोगों को यहां ज्योति के दर्शन भी होते हैं और जब शक्ति यहां से नीचे को उतरती है तो वे उसके विविध रंगों को भी अन्दर देखते हैं। शक्ति के साथ ज्ञान का भी अवतरण होने लगता है। श्रीअरविन्द योग में इसलिये इन दोनों चक्रों में ध्यान का बड़ा महत्त्व है।

ध्यान कैसे करें?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप ध्यान करना क्यों चाहते हैं। यदि उद्देश्य जीवन से मुक्ति, ‘संसारी भव सागर से मुक्ति या समाधि प्राप्त करना है तो ध्यान अलग ढंग का होगा। यदि उद्देश्य इस जीवन को ही दिव्य बनाना है, इस प्रकृति और सृष्टि को ही स्वर्ग बनाना है तो ध्यान
अलग ढंग का होगा। ध्यान उद्देश्य के अनुसार चलता है और उसकी प्रक्रिया उसी के अनुसार अपने आप बनती जाती है। इसलिये किसी बनी बनाई प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जा सकता। उद्देश्य
समान होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति उसके सत्ता की बनावट दूसरे किसी भी व्यक्ति के समान नहीं होती, कहीं न कहीं भिन्नता अवश्य होती है। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति की साधना और ध्यान की प्रक्रिया में अन्तर होना स्वाभाविक है। मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य तो भगवान को प्राप्त करना है लेकिन भगवान की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती। उसके अनन्त पक्ष हैं।

कोई परमशान्ति को परम ब्रह्म मानता है तो कोई प्रेम को, कोई परमाशक्ति को परमात्मा कहता है तो कोई निर्वाण या शून्य को। कोई मूर्ति, तस्वीर, व्यक्तित्व, शब्द या मंत्र को ईश्वर के रूप में साकार उपासना करता है तो कोई निराकार गुण को, भाव या तत्त्व की इन भिन्नताओं के कारण साधना के तरीके बदल जाते हैं। ध्यान को साधना का एक प्रमुख अंग माना जाता है या यूं कहें कि सारी साधनायें अन्त में ध्यानस्थ होकर ही अपने इष्ट के साथ तादात्म्य प्राप्त करती हैं इसीलिये ध्यान को
इतना महत्त्व दिया जाता है। साधना की सारी परम्परागत विधियों में चेतना को मन के ऊपर ले जाकर उच्चतर चेतना या निराकार आत्मा के साथ तदाकार किया जाना एक प्रकार से अनिवार्य था।
मन या उसके नीचे की चेतना प्राण या शरीर के माध्यम से होने वाली उपलब्धियां विकृतियों को जन्म देती हैं इसलिये उन्हें आध्यात्मिक उपलब्धियां नहीं माना जा सकता। चेतना को मन के ऊपर ले जाने, अर्थात ऊर्ध्वमुखी होने में मन के विचार सबसे बड़ी बाधा बनते हैं। तप, रज, सत या शरीर प्राण और मन के ऊपर चेतना का आरोहण ही त्रिगुणातीत अवस्था कही जाती है। इस अवस्था को प्राप्त करना ही ब्राह्मी स्थिति मानी जाती थी। मन के कई स्तर हैं। एक स्तर के बाद समाधि लगना शुरू हो जाती है। इस समाधि के भी कई स्तर हैं जिन्हें प्राप्त करना उच्चकोटि के साधकों का लक्ष्य होता था।

लेकिन यदि भगवान स्वयं मन, प्राण और शरीर की चेतना तक नीचे उतर आये अर्थात् यदि spirit एवं matter के भीतर प्रविष्ट होने को तैयार हो जाये तो साधना का स्वरूप ही पूरा बदल जायेगा।
तब मन को पूरी तरह शान्त करने या विचारों को शून्य करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जायेगी।
इसे श्रीअरविन्द और श्रीमां की शब्दावली में descent of force यानी ‘शक्ति का अवतरण कहा जाता है। भागवत शक्ति का यह अवतरण वास्तव में मानव की अज्ञानमयी चेतना पर भगवान का हमला है। भगवतदर्शन इस अवतरण के सामने कुछ भी नहीं है। ‘भगवान के साथ तादात्म्य यह भी उस परमानन्द को सही व्यक्त नहीं करता। स्वयं ‘भगवान होना यही उस आनन्द और सत्यमयी चेतना का रूप हो सकता है। और ‘भगवान होना इसे भला कैसे समझाया जाये? यह तो होकर
ही समझा जा सकता है। यह अवतरण अनिर्वचनीय शान्ति, दुध्दर्ष शक्ति चरम-परम आनन्द, सर्वव्यापी उपस्थिति और सर्वज्ञेय का ज्ञान होता है। धीरे-धीरे अवतरण सहस्रार से नीचे उतरता है और
चक्रों के भीतर से होते हुये एक दिन मूलाधार चक्र तक और अन्त में पैर के नीचे तक पहुंच जाता है। जब शिख से नख तक चैतन्य की यह अमृतमयी धारा भागीरथी बनकर प्रवाहित होने लगती है तो
साधक के लिये स्वर्ग पृथ्वी पर उतर जाता है। यह इतनी अभूतपूर्व घटना होती है कि शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। यह कोई न मान्यता है और न ही कल्पना। यह एक स्थूल अनुभूति होती है इतनी स्थूल कि जिस प्रकार से थर्मामीटर में पारे को आप चढ़ते-उतरते देख सकते हैं उसी प्रकार इस
दिव्य चेतना को कोश-कोश में रेंगते और उतरते अनुभव कर सकते हैं। वह आज कहां तक उतरी वहां चिह्न लगा सकते हैं। यह इतनी स्थूल है कि स्नायुयों के भीतर जहां से वह रेंगती है, आनन्ददायी घर्षण होता है। यहां-वहां भटकने वाला मन इस घटना को चकित होकर उस शक्ति के साथ-साथ चलने लगता है, उसमें मिलकर उस आनन्द और शक्ति को जीने लगता है। भगवान का हमारे भीतर आना-जाना भले होता रहे, वह स्थायी रूप से निवास नहीं कर सकता। श्रीअरविन्द योग में इसीलिये प्रकृति के पूर्ण रूपान्तर पर जोर दिया जाता है।

हमें संसार में ही रहना है और प्रभु द्वारा दिये गये जीवन को पूरापूरा जीना है लेकिन मर-मर कर जीना यह जीवन पाने का उद्देश्य नहीं है। सर्वत्र भगवान की उपस्थिति का बोध-उसी में रमना, उसी में सांस लेना, उसी को जीना, जीना है।

अभीप्सा, समर्पण, विश्वास और मातृशक्ति पर पूर्ण निर्भरता यही चार चीजें हैं जो अवतरण के लिये दरवाजा खोले देती हैं।

उत्कट और तीव्र अभीप्सा- अर्थात्भ गवान के लिये हृदय की गहराई में जोर की पुकार उठनी चाहिये। बिना भगवान के जीना कठिन हो जाये। रात दिन, सोते-जागते, काम करते बस एक ही रट भगवान को जैसे भी हो प्राप्त करना है। जीवन का एक मात्र उद्देश्य भगवान हो जाये।

समर्पण- ऐसा कि बिना कुछ बचाये उसी का होकर जीना। जो भी है उसे दे देना – यह प्रारंभ है। जो कुछ किया है, उसे दे देना यह मार्ग है। जो कुछ हम हैं उसे दे देना यही संसिद्धि है।

विश्वास- भगवान की कृपा पर अटूट विश्वास और उसकी परम शक्ति के अवतरण में थोड़ा भी सन्देह न रहे। वह जब matter के भीतर ही प्रवेश कर रही है तब हमारे हृदय में भला प्रवेश क्यों न करेगी ? विश्वास के साथ प्राप्त करने का संकल्प भी जुड़ा हो। मातृशक्ति पर बिना निर्भर किये इस योग को कोई मनुष्य नहीं कर सकता। मां भागवती शक्ति है, यही सावित्री है, यही descent की शक्ति है।

अवतरण के दो प्रकार हैं – स्वत: होने वाला अवतरण और ध्यान के द्वारा प्राप्त होने वाला अवतरण। जब सत्ता की अनुकूल स्थिति बन जाती है तो अवतरण अपने आप किसी भी समय कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में अप्रत्याशित होने लगता है। इसे भगवान का हमला कहा जा सकता है। यह स्वाभाविक रूप से होता है। इसलिए दिव्य शक्ति के मूल स्रोत से होता है। थोड़ी ही देर में यह व्यक्ति को आनन्दातिरेक में डुबा देता है। नैसर्गिक अवतरण में अक्सर शान्ति, शक्ति और आनन्द तीनों एक साथ आते हैं पर कभी-कभी अलग-अलग भी आते हैं। इसका न कोई विधान है और न ही इसका पूर्वाभास होता है। प्राय: यह देखा गया है कि जब विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य अत्यन्त दुखी और व्याकुल होकर आर्तवाणी से भगवान को पुकारता है तो किसी भी समय वह एकाएक शुरू हो जाता है। यह निश्चित रूप से भगवान का यह आश्वासन होता है कि घबड़ाने की आवश्यकता नहीं है, कृपा साथ में है। और ऐसा होने पर सौ प्रतिशत संकट से छुटकारा मिलता ही है।

श्रीअरविन्द योग में इसीलिये प्राणायाम बिल्कुल ही सहायक नहीं होता क्योंकि नीचे प्राणवायु को ऊपर ठेलते रहने से एक तो अवरोहण पर रुकावट पैदा हो जाती है दूसरे शरीर की चेतना को ऊपर
ठेलते रहने से वह समाधि की ओर उन्मुख हो जाती है; जीवन निस्सार होने लगता है, सांसारिक जीवन के प्रति उदासीनता पैदा होने लगती है जिससे पलायनवाद की प्रवृत्ति आती है। श्रीअरविन्द योग जीवन को सरस, मधुर, सुन्दर और स्वर्ग जैसा आनन्दमय व दिव्य बनाना चाहता है इसलिये शरीर के भीतर आनन्दमय चेतना का नित्यप्रति अवतरण होना चाहिये न कि जो भी भीतर है उसका पलायन। योग और तप के द्वारा इन्द्रियों का दमन नहीं उन्हें रूपान्तरित कर दिव्य बनाना है जिससे वे निम्न प्रकृति की वासनाओं की ग्राहक न बनकर ऊर्ध्वमुखी हो जायें और सत्यचेतना की शक्ति और दिव्यानन्द के प्याले बन जायें। आरोहण का उद्देश्य ही है अवचेतन व प्राणिक विकारों व प्रवृत्तियों को ऊपर उठाकर सहस्रार के रास्ते से बाहर निकाल देना या उन्हें रूपान्तरित कर देना। आरोहण चेतना के मन्दिर में झाड़ू लगाकर वहां बैठने वाले पुजारियों को साफ रखने का प्रयास करता है तो अवरोहण (अवतरण) दिव्यशक्ति को ऊपर से लाकर मन्दिर में विराज देता है और अभीप्सुओं को आनन्द में नहला देता है।

ध्यान से एकाग्रता पैदा होती है और एकाग्रता से शक्तियों का जागरण शुरू हो जाता है। अनेक प्रकार के भाव या ज्ञान की बातें भी प्रत्यक्ष होने लगती हैं जो अप्रत्याशित होती हैं। प्रज्ञा और विवेक खुलने लगते हैं। कभी-कभी अदृश्य जगत की चीजें एकाएक बुद्धि के दायरे में आ जाती हैं। कुछ लोगों को कई प्रकार के बिम्ब दिखने लगते हैं कुछ को अन्तर्जगत से आवाजे सुनाई पड़ती हैं और कुछ को ज्योति भी दिखाई देती है। श्रीअरविन्द और श्रीमाता जी ने इनके प्रति काफी सावधान किया है। इन बिम्बों, आवाजों जैसी अनुभूतियों से अपने को ऊंचा साधक नहीं समझ लेना चाहिये। इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं होता। ये रास्ता चलने वाले राहगीर के बायें-दायें दिखने वाली चीजें होती हैं उपलब्धियां नहीं होती। अन्तर्जगत अच्छी और बुरी दोनों चीजों से भरा पड़ा है। इनमें से कुछ में ज्योतिर्मयता भी होती है पर वे होती दुष्ट सत्तायें हैं। कुछ प्रेतात्मायें इष्ट का रूप लेकर प्रकट होती हैं और साधक से अपनी पूजा कराना चाहती हैं। कई लोग इनके भ्रम में फंस कर जीवन बर्बाद कर
लेते हैं। कुछ प्रेतात्मायें स्वलेखन भी कराती हैं और साधक अपने को असामान्य व्यक्तित्व का धनी मानने की भूल कर बैठता है और साधना से हाथ धो बैठता है। इन सबसे बचने का एक ही उपाय है- इन्हें कोई महत्त्व न देना और श्रीमां को सारी चीजें अर्पित करते रहना। ध्यान के समय सुन्दर अन्तदर्शन भी होते हैं। ऐसे अन्तदर्शन अभीप्सा को बढ़ाते हैं, साधक को प्रोत्साहित करते हैं, शक्ति व प्रकाश भी प्रदायित करते हैं। कभी-कभी तो अपने इष्ट या गुरु स्वयं भी प्रकट होते हैं और साधना सम्बन्धी आवश्यक निर्देश व संकेत दे जाते हैं या कठिनाइयों को दूर कर जाते हैं। इनसे साधक को प्रोत्साहन, उत्साह और प्रगति के लिये सम्बल मिलता है। ध्यान सही दिशा में आये, इसके लिये चैत्य पुरुष का मार्गदर्शन आवश्यक होता है इसलिये इसे जगाने का भरसक प्रयास करना चाहिये। अनुभूति चाहे जो भी हो, उनकी चर्चा किसी से भी नहीं करनी चाहिये वर्ना उनका प्रभाव जाता रहता है। केवल अपने गुरु या मार्गदर्शक से ही उनका अर्थ समझने के लिये चर्चा की जा सकती है।

ध्यान या एकाग्रता केवल भगवान को प्राप्त करने के लिये ही नहीं किया जाता। किसी भी चीज के ज्ञान की प्राप्ति के लिये एकाग्र हुआ जाता है। जब हम अपने भीतर एकाग्र होते हैं तो अपनी सत्ता के केन्द्र में पहुंच जाते हैं इसी अनुभूति को भगवान की उपलब्धि कहा जाता है।

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