‘‘मेरा शिशु एक महीने का हो गया है और मैं अब तक डिप्रेशन की स्थिति में हूँ। क्या मुझे संभल नहीं जाना चाहिए था?”
प्रसव के बाद डिप्रेशन (अवसाद) और बेबी ब्ल्यू’ इन दोनों स्थितियों में थोड़ा अंतर होता है। यदि कोई महिला पहले कभी डिप्रेशन का शिकार रही हो, उसे जटिल गर्भावस्था व डिलीवरी का सामना करना पड़ा हो तो उसके लिए अवसाद ग्रस्त होना काफी सरल हो जाता है।
अवसाद या डिप्रेशन के लक्षणों
अवसाद या डिप्रेशन के लक्षणों में रोने को जी चाहता है। नींद व खान-पान से जुड़ी समस्याएँ शुरू हो जाती हैं। उदासी व निराशा छाई रहती है। ऐसा लगता है कि आप अपनी व शिशु की देखरेख नहीं कर पाएँगी, आप समाज से कट जाती हैं। चिंता व तनाव घेरे रहते हैं। शिशु के लिए प्यार नहीं उमड़ता।अकेलापन महसूस होता है और याददाश्त घटने लगती है।
डॉक्टर से लें सलाह
आप बेबी ब्ल्यू वाले टिप्स आजमाएँ।लेकिन फिर भी आराम न आए तो डॉक्टर के पास जाने में देर न करें। वे आपका थाइरॉइड टेस्ट कर सकते हैं। कई बार थाइरॉइड हाइमोन के स्तर में अनियमितता की वजह से भी भावनात्मक अस्थिरता हो जाती है। यदि यह जांच सामान्य हो तो इसके बाद डिप्रेशन की चिकित्सा के लिए थेरेपिस्ट के पास भेजा जाता है, वे एंटडिप्रेशन दवाएँ देते हैं जो स्तनपान के दौरान भी सुरक्षित मानी जाती हैं। अगर लक्षण बहुत गहरे हैं तो ‘ब्राइट लाइट थेरेपी’ दी जाती है। आपको आँखें खोलकर एक ऐसे बॉक्स के सामने बिठा दिया जाता है, जिससे दिन का प्रकाश निकलता है। इससे आपके शरीर में एक सकारात्मक बायोकैमिकल बदलाव आता है व मस्तिष्क शांत होता है। थेरेपिस्ट अवस्था के हिसाब से कई मिले-जुले इलाज सोच सकते हैं।
अवसाद की वजह से आपको शिशु के साथ अपनापन महसूस करने या उसे प्यार देने में दिक्कत आ सकती है। आपके दूसरे पारिवारिक संबंधों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है।सेहत भी ठीक नहीं रहती। कई महिलाओं को भय के दौरे पड़ने लगते हैं। गर्म-ठंडे पसीने आने लगते हैं, छाती में दर्द रहने लगता है, सिर चकराता है और घबराहट होने लगती है। इन लक्षणों का तत्काल इलाज न होने से मामला बिगड़ सकता है।
पी.पी.ओ.सी.डी
अवसाद से ग्रस्त 30 प्रतिशत महिलाओं में पोस्ट-पार्टम ऑफ ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिऑडार (पी.पी.ओ.सी.डी.) के लक्षण भी दिखाई देते हैं। ऐसी महिलाएँ हर पंद्रह मिनट बाद यह देखती हैं कि शिशु की सांस चल रही है या नहीं, बुरी तरह से घर की साफ-सफाई पर उतर आती हैं या उनके मन में शिशु को नुकसान पहुँचाने के विचार आने लगते हैं। वे अपने शिशुआं के प्रति लापरवाही बरतने लगती हैं। ऐसे कोई भी लक्षण या विचार सामने आते ही डॉक्टर को दिखाने में देर न करें।
पोस्ट-पार्टम साइकोसिस में भ्रम की स्थिति बढ़ने लगती है। आत्महत्या या हिंसा का विचार मन में आने लगता है। अजीब-अजीब बातें दिखने व सुनने लगते हैं। साइकोसिस के लक्षण दिखते ही इमरजेंसी रूम में जाने में देर न करें। अपनी भावनाओं को सामान्य न समझे,उन्हें गंभीरता से लें। सहायता आने तक अपनी खतरनाक भावनाओं पर काबू रखें। पड़ोसी,सहेली या किसी रिश्तेदार के पास शिशु को सुरक्षित रखवा दें।
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