गृहलक्ष्मी फरवरी २०१६
स्त्री शक्ति
साठ के दशक में हम घर सुरक्षित पहुंचने के लिए विशेष ध्यान रखते थे। देर होने पर कई बार हमें बदमाशों का सामना करना पड़ता था। सड़कों पर इन विचरने वाले व्यक्तियों ने ही हमें सतर्क, चौकस, आत्मरक्षा और खुद की सहायता करने वाली तीव्र प्रतिक्रियाएं सिखाईं। हम बहनें और हमारे मित्र आत्मअस्तित्व के वातावरण में बड़े हुए। इसने हमें, हमारी शारीरिक दुर्बलता और ‘भूखे पुरुष की कामना को समझने के लिए तैयार किया। महिलाओं के तौर पर इन दोनों सच्चाइयों को समझने के बाद, हमारे पास दो विकल्प थे – हथियार फेंक दें और महिला के रूप में अपने विकास और गतिशीलता को सीमित कर दें अथवा इसे स्वीकार करते हुए अपने विकास और स्वतंत्रता के लिए चुनौतियों का सामना करें।

यही संदेश मैं यहां देना चाह रही हूं – महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और आत्मसुरक्षा और दूसरा, महिलाओं को सुरक्षित वातावरण देने के लिए स्थानीय पुलिस की योजना, जिसमें कोई समझौता न हो।
सर्वप्रथम मैं महिलाओं से बात करूंगी- अपने दिमाग में बैठा लें कि जिस प्रकार सड़कों, गलियों और आम स्थानों पर अपने कर्तव्य निभाते अच्छे और उत्तरदायी नागरिक हैं, उसी प्रकार ‘मानसिक और ‘शारीरिक ‘रोगी व्यक्ति भी हैं जिनके पास महिलाओं को ताकने, छेडऩे और तंग करने के अलावा कोई काम नहीं है। आप वह सब करें जिससे आप अपनी कमजोर स्थिति से बच सकें। मुसीबतों को निमंत्रण न दें और दिल से अधिक दिमाग का प्रयोग करें। जहां स्थितियां हाथ से बाहर निकलती दिखाई दें तो उनसे खुद को निकालने के लिए सतर्कता बरतें।
फुर्ती और शीघ्र सक्रियता सीखें। खेल, एनसीसी, एनएसएस और साइक्लिंग अपनाएं और आत्मसुरक्षा के प्रशिक्षण लें। स्कूल, यूनिवर्सिटी, संस्थान लड़कियों को आत्मसुरक्षा प्रशिक्षण दें।
अब मेरे प्रोफेशन यानी पुलिस की बात- यहां सभी स्तरों पर अतिगंभीर, नियमित कार्य करने की आवश्यकता है, जिसमें कमी की कोई गुंजाइश न हो। दिल और दिमाग पर प्रभाव डालने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों को जोश के साथ चलाया जाए। क्षेत्र के लोगों का ड्यूटी पर तैनात महिला व पुरुष पुलिस अफसरों द्वारा नियमित रूप से फीडबैक लिया जाए। इससे आवश्यकतानुसार तैनाती की जा सकेगी जो जमीनी सच्चाइयों, इंटेलिजेंस, क्रॉस-चैकिंग, डॉयलाग/निरीक्षण पर आधारित होगी। जैसे इन समस्याओं का फीडबैक वही महिलाएं दे सकती हैं जिन्हें रात की पारियों में काम करना पड़ता है और बसों, टैक्सियों, तिपहियों अथवा अपने स्वयं के यातायात साधनों से यात्रा करनी पड़ती है। उनसे नियमित संपर्क बनाए रखें और जानने का प्रयास करें कि उनके साथ सड़क पर क्या हुआ। मैंने एक बार ऐसा ही ‘टेस्ट चैक सरकारी अस्पताल की नर्सों के साथ किया था। उन्होंने अपनी पीड़ा और कष्टों की कई घटनाएं बताई। उन्होंने मुझे बताया कि जिस बस-स्टॉप पर वे बस की प्रतीक्षा करती हैं, वहां कई ‘कॉलगर्ल्स भी घूमती हैं। इससे सभी लोग वहां मौजूद सभी महिलाओं- लड़कियों को इसी दृष्टि से देखते हैं। कारों में गुजरते लोग उन्हें अशिष्ट ‘कमेंट करते हैं। शिकायत करने के लिए वहां कोई पुलिस वाला नहीं होता और शायद बदमाशों और ‘कॉलगल्र्स को पुलिस का कोई भय नहीं होता।
यदि इंटेलिजेंस तैनाती ढंग से हो तो सड़कों पर क्या हो रहा है, यह जानना संभव है। सादे कपड़ों में तैनाती महिला पुलिस अफसर इन बदमाशों को रंगे हाथों पकड़ सकती हैं। अगर इसे नियमित रूप से लागू किया जाए तो पकड़े जाने के भय से सड़क पर घूमने वाले बदमाशों से निजात मिल जाएगी। शाम की बसों की भी नियमित अंतराल पर रोककर जांच की जानी चाहिए, ताकि शराबियों व बदमाशों को पकड़ा जा सके। बस ड्राइवरों और कंडक्टरों को भी जांच के लिए तैयार रहना चाहिए। इससे स्पष्ट संदेश जाएगा कि सूर्य अस्त होने के बाद बसें बदमाशों के लिए ‘सुरक्षित नहीं हैं। यह उपाय नियमित रूप से किए जा सकते हैं। थानों से ‘फीडबैक के आधार पर सुधार कर सही परिणाम देने वाली नीतियां बनाई जा सकती हैं।
इससे कुछ ही सप्ताहों के भीतर स्थिति में नाटकीय ढंग से बदलाव आ सकता है। तब अखबारों के शीर्षक होंगे कि महिलाओं ने बदमाशों को चुनौती दी। बदमाशों के लिए संदेश होगा कि मनोरंजन के लिए कोई दूसरा साधन ढूंढ़ें, क्योंकि महिलाओं से बुरे व्यवहार के कारण वे कठिनाई में पड़ सकते हैं। सादे कपड़ों में महिला पुलिस भी ऐसे पुरुषों में भय पैदा कर सकती हैं। दोनों योजनाएं जटिल नहीं हैं, लेकिन वे उसी अवस्था में सरल हैं, जबकि महिलाओं के व्यक्तिगत विकास व पुलिस की कार्य संस्कृति का भाग बनाया जाए। इसके परिणाम असाधारण होंगे। सड़कें सुरक्षित होंगी जिससे शहर की महिलाओं की गतिशीलता सुरक्षित होगी, ताकि वे जीवन में संपूर्ण सफलता पा सकें।
