आज ऋतिक रोशन सफलता के जिस मुक़ाम पर खड़े है वह उनकी अपनी महनेत और लगन का नतीजा है । यूँ तो ऋतिक फ़िल्मी परिवार से है और उन्होने बचपन में अपने ग्रांड फ़ॉदर और फ़ादर की कई फ़िल्मों में छोटे छोटे रोल भी किये है । कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने अपने फ़ादर राकेश रौशन के प्रडक्शन हाउस में झाड़ू लगाने से लेकर स्टोरी डेवलेपमेंट, कैमरा वर्क, डायरेक्शन और एडिटिंग सब तरह का काम किया । सन 2000 में राकेश रौशन ने “कहो ना प्यार है” फ़िल्म में ऋतिक को लॉंच किया और फिर सफलता उनके क़दम चूमती गई ।
 
क़ाबिल – एक खूबसूरत लव स्टोरी
क़ाबिल एक बहुत ही ख़ूबसूरत, दमदार और रोमांटिक लव स्टोरी है जिसमें थ्रिल भी है। मैं कह सकता हूं कि मैंने अभी तक जितनी भी लव स्टोरी वाली फ़िल्में की हैं उन में यह मेरी फ़वरेट फ़िल्म होगी । इसमें एक ब्लाइंड इंसान को बदला लेते हुए दिखाया गया है । इसकी कहानी इतनी डीप है कि यह एक आर्ट फ़िल्म बन सकती थी, किंतु डायरेक्टर संजय गुप्ता ने इसमें ट्विस्ट दे दिया है । सच कहूँ तो मैंने फ़िल्म में अपना हार्ट और सोल दोनों लगाया है और मुझे उम्मीद है कि इसका रिवॉर्ड ज़रूर मिलेगा, भले ही बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म कितना भी कमाये, दर्शक ज़रूर तारीफ़ करेंगे ।
 
ब्लाइंड मैन का किरदार –
यह एक अलग तरह का रोल है। मेरे लिए ये रोल करना मुश्किल भी था क्यूँकी इस में अंधे आदमी को सिर्फ़ अंधे की ऐक्टिंग नहीं करनी थी बल्कि उसे डान्स, रोमैन्स और फ़ाइटिंग भी करनी थी । मैंने पर्सनली ब्लाइंड लोगों पर काफ़ी रीसर्च किया, उनके बारे में पढ़ा, उनसे मिला और उनकी मन:स्थिति को समझने की कोशिश की ।
 
आइ डोनेशन –
मैं हमेशा से फिज़िकली चैलेंज्ड और ख़ासकर ब्लाइंड लोगों के लिए बहुत सेन्सिटिव रहा हूं, इस फ़िल्म की करने के कारण नहीं बल्कि बहुत पहले से ही मैं आइ डोनेशन के बारे में सोचता आया हूं। जब एश्वर्या राय ने आइ डोनेशन का विज्ञापन किया था तभी से मैं इस कॉज़ से बहुत इम्प्रेस हुआ था ।
 
होम प्रोडक्शन या बाहर की फ़िल्म –
यह सही है की आप अपने होम प्रडक्शन में ज़्यादा कम्फटेबल फ़ील करते हैं, आपके आस-पास के लोग भी अपने होते है क्यूँकि किसी भी काम में टीम वर्क बहुत इम्पोर्टेंट होता है लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि होम प्रडक्शन में डिसप्लिन नहीं होता। मेरे फ़ादर तो टाइम के मामले में बहुत स्ट्रिक्ट है, ज़रा-सा लेट होने पर फ़ोन आ जाता है । दरअसल किसी भी फ़िल्म का चुनाव स्क्रिप्ट के बेसिस पर किया जाता है । मैंने ‘कहो ना प्यार है’ और ‘कृश’ के अलावा ‘जोधाअकबर’, ‘अग्नि पथ’, ‘ज़िंदगी मिलेगी ना दोबारा’, ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ जैसी बाहर के प्रडक्शन हाउस की फ़िल्मे भी की हैं ।
 
2016 -2017 पुराना साल नया साल –
2016 को मैं अपना मेमोरेबल ईअर ही मानूँगा। इस साल जितनी भी चीज़ें हुई उनसे मेरी ग्रोथ ही हुई है । ज़िंदगी के तजुरबे, अनुभव हमें सीखाते है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है ।ऐक्चुअली प्रॉब्लम्ज़ ,स्ट्रगल, नेगेटिविटी सब एक तरह से हमारे माइंड के लिए जिम का काम करते हैं जैसे कि हम अपनी स्ट्रेंथ बढ़ाने के लिए जिम जाते हैं, अपनी मसल्स बनाने के लिए वेट उठाते हैं, उसी तरह लाइफ़ में परेशानियां इंसान को जीतने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
2017  में मैं बहुत काम करना चाहता हूं। हर दिन कुछ ना कुछ काम करूँ बस यही सोच है ।

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