अरे अरे समोसे का नाम लिया नहीं और आपके मुंह में पानी आ गया! आखिर क्यों ना आए मैं हूं ही इतना तीखा ,चटपटा और स्वादिष्ट! अब आप बोलेंगे कि लो भई! अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहा है। तो क्यों ना बनूं? भले ही लोग कितना हेल्थ कॉन्शियस हो जाएं, लेकिन मेरे सामने आते ही, अपनी डाइटिंग भूल जाते हैं। बहुत सी बार तो मैं लोगों को इतना ज्यादा ललचाए हुए देखता हूं कि, मन ही मन मेरी हंसी छूटने लगती है, और मैं धीरे से फुसफुसाता हूं, ‘अरे रुको; रुको! मैं बहुत ही  गर्मा गर्म हूं! मुंह में डालने से पहले सोचना जरुरी है, मेरे भाई। वरना जीभ , मुंह  जल जाएंगे।

आप मानो या ना मानो लेकिन तीन कोणों वाले मेरे आकार में स्वाद ही स्वाद है भले ही मेरे फूले हुए पेट के अंदर खूब मसालेदार आलू क्यों ही ना ठुसा हुआ हो। और जब मुझे खट्टी मीठी सोंठ और हरी धनिए की चटनी के साथ खाया जाता है तो मेरा स्वाद तो और दुगना बढ़ जाता है लोग उंगलियां चाटते हैं। आज भी चाय ऑफिस की मीटिंग हो या बच्चों की बर्थडे पार्टी या और कोई इवेंट मेरे बिना अधूरा है सैकड़ों चीजों में भी सबसे पहले लोग मुझे ही अपनी प्लेट में जगह देते हैं।

 अब मैं आपसे एक सवाल करता हूं , “क्या आप जानते हो मेरी उत्पत्ति कहां हुई? मैं कहां की पैदाइश हूं?”

अरे! अरे! नहीं भाई मैं भारतीय नहीं हूं! इस गलतफहमी में मत रहना। अब यह भी मत बोल देना कि मैं किसी पार्टी की सिखाई में आ गया हूं! कोई और देश महात्मा बुध या राम के जैसे मेरे लिए दावे नहीं कर रहा। मैं तो खुद ही आपसे कह रहा हूं कि मैं सच में भारतीय नहीं हूं। आइए मैं आपको बताता हूं अपना छोटा सा इतिहास असल में 10 वीं सदी में मध्य पूर्व एशिया में मेरा जन्म हुआ था यानी कि ईरान में और यहां मुझे सन्बुसा कहा जाता था। दसवीं से तेरहवीं सदी की अरबी पाकशास्त्र की किताबों में मुझ को नया नाम दिया गया, सम्बूशक।

आपको जानकर हैरानी होगी कि मिस्र, सीरिया और लेबनान में तो अभी तक मुझे इसी नाम से जाना जाता है। मेरा बहुत बार नामकरण हुआ। जिस जिस देश ने मुझे अपनाया वह अपना नाम देता चला गया जैसे कि  नेपाल ने सिंगोड़ा , म्यांमार ने समूसा, मध्य एशिया ने समसास, पुर्तगाल ने चूमकस, अफ़्रीका ने सम्बूसा, इज़रायल ने सम्बूसक और यहां भारत में समोसा। अब एक और चौंकाने वाली बात बताता हूं। मैं शुरू से तिकोना नहीं था। मैं अर्धचंद्राकार आकार का था जैसे कि आजकल आपकी मीठी गुजिया होती है और मेरे अंदर आलू की जगह मेवा, प्याज मांस आदि भरा जाता था। जैसा देश उसके अनुसार स्वाद। कितनी हास्य बात है ना कि मेरे आजकल के पिरामिड जैसे आकार को देखकर कुछ लोग मुझे मिस्र का मानते हैं। अब कहीं आप भी कंफ्यूज मत हो जाना की पिरामिड को देखकर समोसा बना या समोसे को देखकर पिरामिड।

फिर धीरे-धीरे मैं इधर से उधर लुढ़कता पुढ़कता भारत पहुंच गया। शुरुआत में तो मुगल शासकों के समय मेरे अंदर मेवा कीमा या कोई और मांस भरा जाता था। फिर ना जाने कैसे मेरे अंदर आलू भरा जाने लगा। अब आलू की भी अपनी कहानी है माना जाता है कि आलू की उत्पत्ति यूरोपियों ने की। और यह है सोलवीं सदी में भारत आया तो भारतीय हो गया। वैसे कुछ साहित्यकारों की माने तो भारत में आलू को सबका पसंदीदा बनाने में क्रेडिट  गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को जाता है। फिर तो मुझे अपने ऊपर  इतराना चाहिए। क्योंकि मैं भारतीय नहीं विदेशी हूं। आजकल जिसके ऊपर विदेश का ठप्पा लग जाए उसकी कीमत बढ़ जाती है। लेकिन मुझे अपने ऊपर गर्व करने का एक और कारण है, कि आज मैं पूरी तरह से भारतीय पहचान पा चुका हूं। भारतीय जब भी जिसको प्यार करते हैं दिल से प्यार करते हैं उन्होंने मुझे भी दिल से अपनाया। तभी तो आज के समय में कोई नहीं जानता कि मैं और आलू, हम दोनों ही विदेशी पैदाइश हैं। 

एक मजेदार बात बताऊं आपको मैं भारत में भी अलग-अलग आकार में मौजूद हूं जैसे कि उत्तर प्रदेश में मेरा बड़ा रूप दिखाई देगा तो पूर्वी हिस्से में मुझे लोग छोटे छोटे रूप में खाना पसंद करते हैं वहीं दूसरी ओर साउथ में बहुत ही छोटे आकार में। जिसमें आलू की जगह कीमा भरते हैं। पता है ममता दीदी के शहर में तो मेरे अंदर मावा भरा जाता है और मुझे लबंग लतिका के नाम से बुलाते हैं।

अब मुझे विदेशी कहने की गलती मत कर देना। लगभग 600 सालों से मैं भारत में रह रहा हूं तो हो गया ना भारतीय।। 

छोड़ो आप किस कहानी किस्सों में पड़ गए। आप तो बस मेरे साथ बरसात का आनंद लें। गरमा गरम चाय और हरे धनिए की चटनी के साथ मेरे स्वाद का आनंद उठाइए।।

यदि आप बहुत ही चटोरे किस्म के व्यक्ति हैं और हर चीज का स्वाद बढ़ाने के लिए उस चीज को कुछ अलग ढंग से खाना पसंद करते हैं तो आप समोसे को भी एक बर्तन में किसी चम्मच की मदद से फोड कर और उसी के अंदर चटनी मिला कर खा सकते हैं। आप चाहे तो उसमें छोले की सब्जी भी मिला सकते हैं। ऐसे खाने से आपको एक दम रेस्टोरेंट जैसी फील आएगी। लेकिन कुछ भी कहो जो स्वाद बाहर के समोसे में है वो घर के बनाए हुए समोसे में नहीं होता , जबकि हमें पता होता है कि बाहर के समोसो में बहुत गली सडी चीज़ों का प्रयोग किया जाता है और हम घर पर समोसे बनाते वक़्त सारी ताजा चीजों का प्रयोग करते हैं।

आखिर—

मेरा नाम है समोसा,

 मैं हूं बड़ा ही अनोखा।

 लोग खाते हैं मुझे,

 बड़े ही शौक से ।।

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