a full meal thali with varieties of dishes
Importance of Stale Food on Sheetala Saptami

Summary: चूल्हा क्यों रहता है शांत? शीतला सप्तमी के ठंडे प्रसाद का वैज्ञानिक और भावनात्मक पक्ष

शीतला सप्तमी की परंपरा में ठंडा या एक दिन पहले बना भोजन केवल आस्था नहीं, बल्कि स्वच्छता और सेहत से जुड़ी समझदारी का संदेश भी देता है। यह पर्व मां की ममता, परिवार की सुरक्षा और बदलते मौसम में संयमित जीवनशैली की सीख सिखाता है।

Sheetala Saptami: भारतीय त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, वे जीवनशैली और स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़े होते हैं। ऐसी ही एक परंपरा है शीतला सप्तमी, जब घरों में एक दिन पहले भोजन बनाकर अगले दिन ठंडा या ‘बासी’ खाना खाया जाता है। पहली नज़र में यह परंपरा अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे भावनाओं के साथ-साथ एक व्यावहारिक सोच भी छिपी है। इस साल शीतला सप्तमी मंगलवार, 10 मार्च को है।

इस दिन श्रद्धालु शीतला माता की पूजा करते हैं। मान्यता है कि वे रोगों से रक्षा करती हैं, विशेषकर चेचक जैसी बीमारियों से। पूजा में ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है और उस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। सवाल यह है कि आखिर क्यों?

पुराने समय में जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब स्वच्छता और संयम ही स्वास्थ्य की सबसे बड़ी ढाल थे। शीतला सप्तमी पर एक दिन पहले भोजन बनाकर अगले दिन खाना, दरअसल रसोई को विश्राम देने और साफ-सफाई पर ध्यान देने की परंपरा थी।

चूल्हा न जलाने का अर्थ था कि घर की महिलाएं एक दिन धुएं और गर्मी से दूर रहें। रसोई की गहरी सफाई की जाती थी, जिससे संक्रमण फैलने की आशंका कम हो। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि स्वच्छता ही स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। इसके अलावा, मौसम परिवर्तन के समय यानी सर्दी से गर्मी की ओर, शरीर को हल्के और ठंडे भोजन की आवश्यकता होती है। तले-भुने और अत्यधिक गरम भोजन से बचना पाचन के लिए भी लाभकारी माना जाता है।

women wearing traditional outfits performing pooja
sheetla pooja

शीतला सप्तमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां की ममता का प्रतीक भी है। घर की बड़ी महिलाएं पूरे प्रेम से एक दिन पहले पकवान बनाती हैं मीठे चावल, पूड़ी, बेसन की सब्जी, गुजिया या दही-बड़े। अगले दिन परिवार एक साथ बैठकर वही भोजन ग्रहण करता है। यह परंपरा परिवार को एक सूत्र में बांधती है। मां का यह प्रयास केवल पूजा नहीं, बल्कि अपनों की सेहत और सुख की कामना होती है। बच्चों को भी समझाया जाता है कि यह दिन संयम और सफाई का है।

आज के मॉडर्न किचन और फ्रिज के दौर में ‘बासी खाना’ शब्द थोड़ा असहज लग सकता है। लेकिन असल में इसका अर्थ है सुरक्षित तरीके से रखा गया भोजन। आज महिलाएं हाइजीन का पूरा ध्यान रखते हुए यह परंपरा निभाती हैं। कई लोग अब हल्का और सादा भोजन तैयार करते हैं, ताकि स्वास्थ्य बना रहे। कुछ घरों में इस दिन डिजिटल डिटॉक्स और घरेलू सफाई को भी शामिल किया जाता है, ताकि त्योहार का संदेश आधुनिक जीवन में भी सार्थक बना रहे।

शीतला सप्तमी हमें सिखाती है कि जीवन में ठहराव भी जरूरी है। रोज़ की भागदौड़ के बीच एक दिन ऐसा भी हो, जब रसोई शांत रहे, मन शांत रहे और परिवार साथ बैठे। यह त्योहार अंधविश्वास से अधिक अनुशासन और स्वच्छता का प्रतीक है। ठंडे भोग के पीछे छिपा संदेश यही है कि स्वास्थ्य, संयम और परिवार तीनों का संतुलन ही जीवन की असली समृद्धि है। आखिरकार, परंपराएं केवल रिवाज़ नहीं होतीं, वे अनुभव और समझ की विरासत होती हैं। शीतला सप्तमी इसी विरासत का एक सुंदर उदाहरण है, जहां आस्था के साथ-साथ सेहत और संवेदना भी शामिल है।

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राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...