Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “हम घर तो पहुँच जाएंगे ना सही-सलामत?” उसने कहा, जब उसने और मैंने दूसरा पेग ख़त्म किया और मैंने तीसरा बनाया।

“वह मेरी ज़िम्मेदारी है, तुम उसकी फ़िक्र मत करो।”

बहुत दिनों से हम आज की हसीन रात की प्लानिंग कर रहे थे। उसके मम्मी-पापा यूँ तो कहीं आते-जाते नहीं, पर आज बमुश्किल किसी शादी में शहर से बाहर थे। सच्चे मन से माँगी दुआएँ आख़िर कब तक क़बूल ना होतीं? आज क़िस्मत चमकी थी; घर पर वह, उसकी राज़दार बहन और परलोक गमन की तैयारियों में जुटी उसकी दादी। उसने दादी की देख-रेख के लिए बहन को कुछ रिश्वत दी और रात बारह तक मामला सम्भाल लेने को तैयार किया कि, किसी फ्रेन्ड के बर्थडे पर दारू पार्टी की प्लानिंग है।

हल्की बारिश से विधाता ने हमारी हाँ में मुहर लगायी और वह मेरी कार में थी।

“मुझे डर लग रहा है, ज़्यादा हो गई तो? कहीं कुछ कहानी ना हो जाए।” उसने दो पैग तो कई बार मेरे साथ ही पीये थे, पर ज़्यादा पीने का कभी मौका नहीं मिला था; संभलकर घर भी जाना होता था।

“कहानी क्या होगी, ज़्यादा से ज़्यादा तुम्हें उठाकर घर पहुँचाना होगा।”

“किसी ने देख लिया तो मेरे साथ-साथ तुम्हारा भी मर्डर हो जाएगा।”

“तो मत पियो और।”

उसने तुरन्त ही पाला बदला-“नहीं यार, पीना तो है ही। मैं भी तो देखूँ होश खोकर लगता कैसा है। मैं आज बिल्कुल होश में रहना ही नहीं चाहती। भाड़ में जाएँ, जिसको जो सोचना हो सोंचे।”

“अबे टेंशन मत लो। दोनों तरफ़ का क्यों सोच रही हो। लेकिन एक बात और सोच लो…” कहते-कहते मैं रुक गया और एक बड़ी घूँट पी।

“क्या बात…बोलोगे?”

“कहते हैं दारू पीने के बाद आदमी सच बकने लगता है, देख लो कहीं कुछ राज तो नहीं छिपा रखें हैं तुमने? हो सकता है सब बकने लगो।”

“क्या सच में ऐसा होता है?”

“होता तो है। बहुत बार हमारा असली चेहरा सामने आ जाता है। दरअसल, हम इन्सान एक सच्चा चेहरा लेकर इस दुनिया में तो, नहीं ही घूम सकते।”

“डरते हो क्या मेरे असली चेहरे से? डोंट वरी, मैं इतना मेकअप नहीं पोतती…हा…हा…हा…” उसने ग्लास होल्डर से ग्लास उठाया और बड़ा सा घूँट पीते हुए पूदीने की चटनी में, पनीर टिक्का और सलाद लगा हुआ फ़ोक डुबोया।

“शक्ल की नहीं डार्लिंग, सीरत की बात कर रहा हूँ।”

“मेरी सीरत पर क्या शक है तुम्हें?”

“मुझे नहीं पता, पर मैं आज तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ…” मैंने तीसरा पैग ख़त्म कर चौथा बना लिया था। उसका अभी तीसरा ही चल रहा था।

“तो बोलो ना, रोका किसने है तुम्हें।”

“अच्छा बताओ, तुम्हें लगता है कि, तुम मन का सब बोल पाती हो मुझसे?”

“बोल ही तो देती हूँ।”

“तुम क्यों इतना ड्रंक होना चाहती हो कि कोई होश बाकी ना रहे?”

“इसलिए ही तो कि, होश बाकी ना रहे।”

“किस कर लूँ?”

“नहीं।” हमारी कार सड़क के किनारे खड़ी थी और बारिश से धुन्धलाये मौसम और आधी रात की सुनसान सड़क का पूरा फ़ायदा उठाते हुए मेरा सारा बोझ उस पर था और हमारे होंठ एक-दूसरे में बहुत देर तक समाए रहे। सीट पर झुके हुए पीठ अकड़ने लगी, तब हम अलग हुए। मैंने कनखियों से देख ही लिया कि, मेरे चुम्बनों की छटा उसके चेहरे पर खिल कर आई थी।

एक मिनट के लम्बे वीराने के बाद, मैंने प्रचण्ड साँसों को कंट्रोल में लेते हुए एक घूँट भरी और कहा- “छोटी को रात भर के लिए पटा लो ना।”

“लालच में मत पड़ो दुष्ट। अभी और आगे नहीं बढ़ना मुझे।”

“मैं कहाँ आगे बढ़ने की बात कह रहा, साथ में रहेंगे। या…यूँ ही घूमते रहेंगे पूरी रात।”

“नहीं ना। दादी भी तो पूछती रहती है बार-बार। और हम साथ रहेंगे तो तुम्हारा मन भरने वाला तो है नहीं…”

“हाँ, यह भी सही है।” होश खोकर भी होश की बातें करती वह मुझे और भी प्यारी लगी और मैंने उसका माथा चूमा। उसका असली चेहरा भी उतना ही कोमल और प्यार से भरा हुआ लगा मुझे।